कोरोना : चारों तरफ हाहाकार, मौन हो चुकी सरकार

अजीत सिंह

जब पिछले वर्ष केरल में कोरोना का प्रवेश हुआ तो सभी को याद है। पूरे भारत में एलर्ट हो गया। लखनऊ के पश्चिम में पहला केस आने के बाद तो हर एक को देखकर ऐसा लगता था कि वह कोरोना का ही प्रतिरूप में है। यह डर हर एक जागरूक व्यक्ति के मन में घर कर गया था। हमें याद है प्रयागराज की धरती पर अभी कोरोना का प्रवेश भी नहीं हुआ था कि सब लोग एलर्ट हो गये थे, जो एलर्ट नहीं होना चाहते थे, उसे पुलिस ने कर दिया लेकिन इस बार तो सब उल्टा सा दिख रहा है। न तो सरकार को मौत के प्रति कोई चिंता दिखती है और न ही आम जन में शुरूआती जागरूकता दिखी। हां, दूसरा वेब जब पिकअप पर पहुंच चुका है तो लोग सरकार को कोसते हुए गांव तक जागरूक जरूर हुए हैं। मास्क गांवों में भी दिखने लगा है। इसका कारण सरकार नहीं, अपनों की लाशें हैं। सरकार चाहे कुछ भी आंकड़ा बताए लेकिन हकीकत यही है कि कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसने किसी अपने एक खास को गवां नहीं दिया है। गवांना भी कई तरह का होता है। इसमें कुछ इस तरह का गवांना पड़ रहा है कि अपने भी बेगाने की तरह व्यवहार करने लग रहे हैं। अस्पतालों में समुचित इलाज तो दूर, सामान्य इलाज भी लोग नहीं करा पा रहे हैं।
स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि अर्थ व्यवस्था को पहले से गवां चुकी सरकार अब अमेरिका के टंप की तुगलकी नीति को अपना लिया है, जिसमें उन्होंने अर्थ को तवज्जो दिया, आमजन को मरने के लिए छोड़ दिया। नतीजा रहा कि न अर्थ बचा, न जन।
पहले वेब पर विचार करें तो देश कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से पहली लड़ाई लगभग लड़कर जीत चुका था। हमारे देश के चिकित्सकों ने कोविड-19 वैक्सिन का भी सफलतापूर्वक ट्रायल कर लिया था तथा लगभग सभी शहरों में 45 वर्ष से ऊपर के आयु वर्ग के लोगों को लगना भी प्रारम्भ हो चुका है। इसी बीच अचानक कोरोना की दूसरी लहर देश में सुनाई पड़ी 10 से 20 की संख्या से शुरू होकर 07 दिनों के अंदर लखनऊ जो उ0प्र0 की राजधानी है प्रतिदिन 6 हजार के ऊपर केस आने लगे। कमोवेश यही स्थिति हर बड़े शहरों की बनी रही। देखते-देखते अस्पतालों की स्थिति बद से बदतर हो रही है। कहीं मरीज के तीमारदारों के साथ मारपीट तो तो कहीं आक्सीजन की कमी, पूरे देश में अफरा-तफरी का महौल बना है। इसी बीच उत्तर प्रदेश में पंचायती चुनाव होने को आ गया। तमाम अनुरोध एवं पीआईएल के बावजूद न तो सरकार न ही मा0 न्यायालय चुनाव को टालने पर राजी हुये। स्थिति भयावह होती चली गयी। तमाम शिक्षक एवं कर्मचारी चुनाव ड्यूटी से वापस आने के बाद बीमार पड़े हैं। कई लोगों ने जान गंवा दिया जिसकी किसी को खबर नहीं है। ये सभी आंकड़े शहरों से लिये जा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्थिति भयावह होती जा रही है।
उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी संक्रमित हो चुके हैं। कई मंत्री, दर्जनों प्रशासनिक अधिकारी भी संक्रमित हैं। प्रदेश के तमाम सांसद विधायक, मंत्री अपने मोबाइल बंद करके घरों में हैं। प्रदेश/देश की जनता को उनको अपने भरोसे पर छोड़ दिये हैं। प्रदेश की राजधानी लखनऊ में दाह संस्कार के लिये आठ घंटे की वेटिंग है। इससे स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस बीच कई पत्रकार भी अपनी जान गंवा चुके हैं। कई दर्जन संक्रमित हैं। पूरा देश एक बार फिर से जब कोविड 19 की चपेट में है। देश के प्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री के साथ पूरी सरकार बंगाल को फतेह करने में लगी है। इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है केन्द्र सरकार के मंत्री जनरल वीके सिंह अपने भाई को अस्पताल में एडमिट करने के लिए असहाय हैं तथा ट्वीटर के जरिए अनुरोध कर रहे हैं। उ0प्र0 सरकार के कानून मंत्री श्री बृजेश पाठक अपनी ही सरकार से मदद की गुहार लगा रह हैं बावजूद इसके सरकार और प्रशासन युद्ध स्तर पर कोई ठोस कदम न उठाते हुए पंचायत चुनाव और बंगाल में व्यस्त हैं। पक्ष और विपक्ष आरोप और प्रत्यारोप में ही लगे हैं। सभी पार्टियों के पास अपने अपने फंड होते हैं। देश हित, प्रदेश हित में उसको भी लगाना चाहिए। शायद जनता को अपने ऊपर छोड़कर यह अहसास दिलाने का कार्य किया जा रहा है कि यही है राजनीति। आज पूरा मानव जीवन संकट में है। इस आपदा में राजनीति नहीं होनी चाहिए। माननीय लोगों को यह बात जरूर ध्यान में रखना चाहिए कि चुनाव तो कभी भी हो सकते हैं लेकिन किसी का बेटा, किसी का पति, किसी का भाई चला गया तो वापस नहीं आयेगा। मानव जीवन को बचाना जरूरी है। इसलिए सभी पक्ष-विपक्ष को मिलकर इस संकट से देश को बाहर निकालना होगा। आपदा में राजनीति बंद होनी चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *