देर आए दुरूस्त आए महानायक अमिताभ बच्चन

अमित कुमार अम्बष्ट ” आमिली “

अपने जन्म दिवस 11 अक्टूबर को महानायक अमिताभ बच्चन ने पान मसाला का विज्ञापन छोडकर अपने प्रशंसकों को एक बेहतरीन तोहफा दिया , हालांकि दीगर बात यह भी है कि सोशल मीडिया पर बेहद सक्रिय रहने वाले अमिताभ बच्चन लगातार इस विज्ञापन को लेकर ट्रोल हो रहे थे ।

फेसबुक पर उनसे एक प्रशंसक ने पूछा था कि ऐसी क्या जरूरत है कि आपको भी कमलापसंद पान मसाले का विज्ञापन करना पड़ा तो अमिताभ बच्चन का जबाब था कि ” किसी के व्यवसाय से किसी का भला हो रहा है तो यह नहीं सोचना चाहिए कि हम उसके साथ क्यों जुड़ रहें हैं, हाँ अगर व्यवसाय है तो हमें भी अपने व्यवसाय के बारे में सोचना पड़ता है , आपको लगता है कि मुझे इसे नहीं करना चाहिए लेकिन इसको करने के लिए मुझे भी धनराशि मिलती है , हमारे उधोग में बहुत से लोग काम कर रहें हैं , जो कर्मचारी हैं उनको काम मिलता है और धन भी “

अमिताभ बच्चन का अपने प्रशंसक को यह प्रत्युत्तर एक प्रोफेशनल व्यक्ति के तौर पर बिल्कुल जायज़ था किन्तु एक महानायक के रूप में जब आपके लाखों फाॅलोअर हो तब ऐसी सोच निःसंदेह गैरजिम्मेराना है।

शायद यही कारण रहा कि नेशनल ऑरगनाईजेशन फाॅर टोबैको एराडिकेशन के प्रेसिडेंट शेखर सालकर ने अमिताभ बच्चन के नाम एक खुला पत्र लिखा और उन्हें याद दिलाया कि आप पल्स पोलियो जैसे अभियान के ब्रांड एम्बेसडर भी है , इसलिए आपको ऐसे विज्ञापन नहीं करने चाहिए । स्थिति को भांपते हुए अमिताभ बच्चन ने खुद को न सिर्फ इस विज्ञापन के अनुबंध से अलग कर लिया अपितु इस विज्ञापन के सारे पैसे भी कंपनी को वापस कर दिए , लेकिन सवाल उठता है कि क्या सिर्फ अमिताभ बच्चन के इस विज्ञापन को छोड़ देने से सब कुछ ठीक हो गया है ? या इस विषय पर दूसरों की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए ? क्या हानिकारक पान मसाला ( गुटखा) जैसे उत्पाद जो कैंसर का कारण होते उन्हें किसी भी सरकार द्वारा उत्पादन की अनुमति दी जानी चाहिए ? कुछ राज्यों ने ऐसे पान मसाला ( गुटखा ) को प्रतिबंधित किया है , क्या ऐसी शुरुआत सीधे केन्द्र सरकार द्वारा ऐसे उत्पादों को प्रतिबंधित नहीं करना चाहिए ? विडम्बना यह भी है कि जिन राज्य सरकारों ने इसे प्रतिबंधित किया है वहाँ भी ऐसे उत्पाद बेहद आसानी से सार्वजनिक स्थल पर भी बिकते दिख जाते है और प्रतिबंधित बताकर मूल्य से अधिक पैसा ग्राहको से वसूला जाता हैं? यह कटु है लेकिन बिल्कुल सत्य है । एक आंकड़े के मुताबिक जिस देश में मुँह के कैसर , यानि तम्बाकू/ गुटखा आदि से होने वाले कैंसर मरीजों की संख्या कुल कैंसर मरीजों की संख्या का 27.1 प्रतिशत हो , उस देश में ऐसे उत्पाद का उत्पादन क्या जन स्वास्थ्य को हानी नहीं पहुंचा रहा है ? ऐसे उत्पाद के उत्पादन की अनुमति देना किसी भी सरकार के लिए गैरजिम्मेराना है इसमें कोई संदेह नहीं है।

जैसा अमिताभ बच्चन ने अपने प्रशंसक को प्रत्युत्तर देते इशारा किया , एक तर्क यह भी है कि ऐसे उधोग भी किसी का व्यापार है , जहाँ से उन्हें धन लाभ होता है , अनेक लोगों के रोजगार का भी यह साधन है और सरकार को टैक्स भी प्राप्त होता है , ऐसे में इसे प्रतिबंधित करना क्या उचित होगा ? , इसका उत्तर बेहद सरल है कि अगर हम युवाओं को देश का भविष्य समझते है तो ऐसे उत्पाद को खाकर अपना और अपने परिवार का जीवन तबाह कर देने वाले युवा से हम क्या उम्मीद कर सकते हैं और क्या हम ऐसे उत्पाद का उत्पादन करके खुद ही उन्हें इस दलदल में नहीं धकेल रहें हैं ? जहाँ तक रोजगार मुहैया करवाने की बात है , चुकि ऐसे उधोग को सरकारों ने उत्पादन का लाइसेंस दिया है तभी लोगों ने इसे अपने रोजगार के लिए चुना है अगर सरकार ने कोई और विकल्प दिया होता या गुटखा की जगह किसी दूसरे नवीन उधोग को प्रोत्साहित किया होता , आज गुटखा उधोग में काम करने वाले लोग दूसरी जगह काम कर रहे होते , इसलिए इस बात की जिम्मेवारी भी सरकार की ही है जिसने रोजगार हेतु ऐसे विकल्प दिए हैं।

जिस पोस्ट पर अमिताभ बच्चन को पान मसाला का विज्ञापन करने हेतु ट्रोल किया जा रहा था , वही कई प्रशंसक एक हिन्दी अखबार के प्रथम पृष्ठ की तस्वीर पोस्ट कर रहें थे जिसपर अमिताभ बच्चन और रणवीर सिंह द्वारा किया गया , पान मसाले के विज्ञापन की पूरे पेज की तस्वीर थी , अब इसमें समझने वाली बात यह है कि अखबार में विज्ञापन के प्रकाशन से अमिताभ बच्चन का कोई नाता तो है नहीं हम सब जानते और समझते हैं लेकिन मीडिया जिसे हम देश का चौथा स्तंभ कहते हैं, उसकी देश के प्रति कोई जिम्मेदारी बनती है या नहीं ? क्या उक्त अखबार को अपने प्रथम पृष्ठ पर ऐसे विज्ञापन को जगह देनी चाहिए ? यह एक बड़ा सवाल है ।

आज पान मसाला की आर में परोक्ष रूप से पान मसाला ( गुटखा) का विज्ञापन सिर्फ अमिताभ बच्चन नहीं कर रहें थे, उनके अतिरिक्त शाहरुख खान , अजय देवगन और रणवीर सिंह जेसे स्टार भी ऐसे उत्पादों का विज्ञापन कर रहें हैं या करते रहें हैं, क्या उन्हें भी अमिताभ बच्चन की तरह अपनी जिम्मेदारियों का एहसास नहीं होना चाहिए ? और उन्हें भी ऐसे विज्ञापन से किनारा नहीं कर लेना चाहिए ?
न सिर्फ सरकार , व्यपारी, विज्ञापन करने वाले नायक और मीडिया, बतौर नागरिक हमारी भी जिम्मेदारी बनती है कि अगर ऐसे उत्पाद को सरकार पूर्णतः प्रतिबंधित नहीं करती है तब भी कैंसर को जन्म देने वाले ऐसे उत्पादों का इस्तेमाल हम न करें और वैसे नायकों को भी अपना रोल माॅडल न बनाएं जो पैसों के खातिर देश के युवा को गलत दिशा में ले जाने की कोशिश कर रहें है ।

अमिताभ बच्चन ने कमला पसंद पान मसाला से अपना अनुबंध समाप्त कर यह संदेश दिया है कि उनसे निर्णय लेने में भले देर हुई हो लेकिन वो दुरूस्त लौट आए हैं ।

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