मिशन-2022ःअखिलेश को मुलायम फार्मूले पर भरोसा

अजय कुमार

लखनऊ। समाजवादी पार्टी को बनाने और संवारने वाले मुलायम सिंह यादव और उनके भाई शिवपाल सपा की सियासत से नेपथ्य में चले गए हैं। जिस समाजवादी पाटी में कभी मुलायम-शिवपाल की तूूती बोलती थी,इन नेताओं के बिना पार्टी में पत्ता भी नहीं खड़कता था,वहां आज सपा प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का ‘रौब’ चलता है। सभी महत्वपूर्ण फैसले अखिलेश अपनी टीम के साथ मिलकर करते हैं। समाजवादी पार्टी में बदलाव की यह बयार 2012 के विधान सभा चुनाव में जीत के बाद तब दिखना शुरू हुई थी,जब मुलायम सिंह ने अपने भाई शिवपाल यादव की नाराजगी की चिंता किए बिना अपनी जगह बेटे अखिलेश को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया था। अखिलेश को सीएम की कुर्सी बाप से तोहफे में मिली थी,लेकिन इस तोहफे को अखिलेश संभाल के नहीं रख पाए। बीते दस वर्षो में समाजवादी पार्टी का जनाधार खिसकता ही जा रहा है। 2012 के पश्चात 2014 एवं 2019 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधान सभा चुनाव से लेकर उप-चुनावों, नगर निगम और इसी वर्ष हुए पंचायत चुनाव सभी जगह हार का सामना करना पड़ा। दस वर्षो से लगातार हार पर हार झेलने के चलते सपा प्रमुख अखिलेश यादव का विश्वास भी हिलोरे मारने लगा है। ऐसे में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने समाजवादी पार्टी की सत्ता में वापसी के लिए उस मुलायम फार्मूले को आत्मसात करने का फैसला लिया है जिसे सपा प्रमुख ने 2012 के बाद भुला दिया था। सब जानते हैं कि 2012 का विधान सभा चुनाव मुलायम ने अपने राजनैतिक कौशल के सहारे ‘समाजवादी जन यात्राओं’ की मैराथन के सहारे जीता था। जन यात्राओं के लिए समाजवादी पार्टी की उप इकाइयां समाजवादी छात्रसभा, युवजन सभा, लोहिया वाहिनी, मुलायम सिंह यूथ बिग्रेड, समाजवादी पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ, एससी-एसटी वर्ग प्रकोष्ठ आदि भी लगातार बैठकें और सम्मेलनों का आयोजन करके सपा के पक्ष में माहौल बनाने में लगे हैं।

खैर,देर से ही सही ,सब तब से निराश-हताश सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी अबकी बार मिशन-2022 फतह करने के लिए 2012 की तर्ज पर जन यात्राओं को फिर से हथियार बनाने में लग गए है। इस बार समाजवादी पार्टी अपने फ्रंटल संगठनों के अलावा सहयोगी दल के सहारे जन यात्राएं निकाल रहे हैं। इन यात्राओं का चुनावी असर कितना होगा यह तो भविष्य तय करेगा लेकिन लेकिन सपा ने जन-यात्राओं का एक खाका तैयार कर उस पर काम शुरू कर दिया है। साथ ही उसके सहयोगी दलों ने इस अभियान को तेज कर दिया है। इन यात्राओं का वोटरों को लुभाने में क्या रोल रहेगा, यह कहना अभी आसान तो नहीं है। लेकिन, इतना तय है कि सपा के पक्ष में इन जन-यात्राओं से एक व्यापक माहौल तैयार तो हो ही सकता है। क्योंकि सियासत में जनता से जुड़ाव की कोशिशें कभी बेकार नहीं जाया करती हैं।

गौरतलब हो, हाल ही में समाजवादी पार्टी के सहयोगी दलों जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) और महान दल ने इस तरह की यात्राएं निकालीं भी हैं। इन दोनों दलों की सक्रियता ने बीजेपी के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। क्योंकि प्रदेश में जनवादी पार्टी का मुख्य वोट बैंक चौहान यानी नोनिया या लोनिया है। प्रदेश में इनकी संख्या करीब सवा फीसदी है। वहीं महान दल की पकड़ मौर्या वर्ग के वोट बैंक पर है, जिनकी संख्या करीब 4.85 फीसदी हैं। यह अनुमानित आंकड़े हैं। आज की तारीख में चौहान और मौर्या वोटर पूरी तरह से बीजेपी के साथ है। इसके पीछे कई कारण भी हैं। बीजेपी ने चौहान वर्ग से दारा सिंह चौहान को मंत्री तो फागू सिंह चौहान को बिहार का राज्यपाल बनाया है। वहीं मौर्या तबके से केशव प्रसाद मौर्या आज की तारीख में प्रदेश में सबसे बड़ा चेहरा हैं और बीजेपी ने उनको उप-मुख्यमंत्री के साथ लोक निर्माण विभाग सहित कई महत्वपूर्ण महकमे दे रखे हैं। इसके अलावा बसपा से भाजपा में गए स्वामी प्रसाद मौर्या भी इस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर प्रमुख विपक्षी दलों को देखें तो सपा और बसपा के पास इन दोनों ही वर्गों से आने वाला कोई बड़ा चेहरा नहीं है। उसे इसके लिए अपने सहयोगी दलों का सहारा लेना पड़ रहा है। दारा सिंह चौहान और स्वामी प्रसाद मौर्या बसपा के ही नेता रहे हैं जो आज योगी सरकार में मंत्री हैं। इन दो वर्गों का प्रतिनिधित्व देखें तो पूर्वांचल की करीब 25 से 30 सीटों पर ये निर्णायक असर डालते हैं। इसके अलावा ये प्रदेश की कई सीटों पर इनका जनाधार अच्छा है। ऐसे में इन दोनों ही वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले जनवादी पार्टी और महान दल का सपा के साथ आना भविष्य के लिए अच्छा संकेत माना जा सकता है।

समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम भी ‘किसान-नौजवान-पटेल यात्रा’ पर निकले हुए हैं। उनकी इस यात्रा का मकसद पटेल यानी कुर्मी वोट बैंक को सहेजना होगा। गौरतलब है कि बाबू बेनी प्रसाद वर्मा के समय से कुर्मी वोट बैंक सबसे ज्यादा सपा के साथ रहा, लेकिन उनके जाने के बाद बीजेपी ने इस वोट बैंक को अपने पाले में खींच लिया। कुर्मी वोट बैंक यूपी में करीब 4.1 फीसदी है। अपना दल की अनुप्रिया पटेल भी इसी समाज का प्रतिनिधित्व करतीं हैं और वो फिलहाल इस समय बीजेपी के ही साथ हैं। नरेश उत्तम के सामने कठिन चुनौती जरूर है, लेकिन कुर्मियों में नाराजगी को वह भुना लें तो इसमें कोई बड़ा चमत्कार नहीं होगा।भर्तियों आदि में पिछड़ों के आरक्षण को लेकर विवाद भी लगातार होते रहे हैं।

मिशन-2022 पूरा करने के लिए समाजवादी पार्टी की नजर बसपा के दलित वोट बैंक पर भी लगी है। इसी लिए सपा ने अम्बेडकर साहब को अपना बनाने की मुहिम चला रखी है तो बसपा से सपा में गए इंद्रजीत सरोज ने दलितों को सपा के साथ जोड़ने के लिए जनादेश यात्रा शुरू कर दी है। इंद्रजीत सरोज दलित समाज से आने वाले बड़े नेता हैं।गैर जाटव-चमार जातियों में इनकी पकड़ अच्छी है। खासकर पासी समाज में। यूपी में पासी समाज की आबादी करीब 3.87 फीसदी है। यह समाज भी बड़ी संख्या में बीजेपी के साथ है। हाल ही में इस समाज से आने वाले मोहनलालगंज के सांसद कौशल किशोर को भाजपा ने केंद्रीय राज्यमंत्री भी बनाया है। इतना ही नहीं उनकी पत्नी मलिहाबाद से विधायक भी हैं। कौशल किशोर को मंत्री बनाकर बीजेपी ने सियासी संकेत दे दिए हैं। लेकिन, इंद्रजीत सरोज की जनादेश यात्रा बीजेपी की इस चुनावी रणनीति पर पानी फेर सकती है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि पिछले कुछ सालों इस समाज के कई लोगों की हत्याओं का होना,जिसमें आज तक इस समाज को न्याय नहीं मिल पाया है,जिसके कारण पासी समाज में बीजेपी के खिलाफ गुस्सा उबल रहा हैै। अब इस गुस्से को इंद्रजीत सरोज के जरिए सपा कैसे भुनाती है, वो समय बताएगा।

समाजवादी पार्टी का फ्रंटल संगठन ‘अधिवक्ता सभा’ भी ‘संविधान बचाओ-संकल्प यात्रा’ के साथ योगी सरकार के खिलाफ मुखर है। पहली सितंबर से अधिवक्ता सभा की यात्रा शुरू हो गई है। पिछले कुछ समय से अधिवक्ता अपनी मांगों को लेकर सरकार से गुहार लगाते रहे हैं। उनकी मांगों की अनदेखी बीजेपी सरकार के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है। कोरोना काल के संकट के बीच भत्तों की मांगों को लेकर अधिवक्ताओं के संगठन ने योगी सरकार से गुहार लगाई थी। लेकिन, उनकी मांगों पर सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। ऐसे में सपा के लिए अधिवक्ता सभा की यह यात्रा 2022 के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हो सकती है।

लब्बोलुआब यह है कि कोरोना काल में सोशल मीडिया के सहारे अपनी सियासत चमकाने में लगे सपा प्रमुख अखिलेश यादव को अब लगने लगा है कि समाजवादी पार्टी को यदि सत्ता में वापस लाना है तो समाजवादियों को वोटरों के करीब जाकर उनके दिलों पर दस्तक देनी होगी,वर्ना 2017 की तरह 2022 मंे भी अखिलेश खाली हाथ रह सकते हैं। संभवता पिछले दस वर्षो में अखिलेश यादव को अच्छी तरह से समझ में आ गया होगा कि बाप-बाप होता है,बेटा-बेटा ही रहता है।

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