कश्मीर में राष्ट्रपति शासन 6 महीने बढ़ाने का प्रस्ताव पास, सीमा पर रहने वालों को भी आरक्षण मिलेगा

जम्मू-कश्मीर की समस्या के लिए अमित शाह ने देश के पहले पीएम जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया। ​उन्होंने कहा कि पटेल ने जूनागढ़ और हैदराबाद की समस्या का निपटारा किया और देश में सफल विलय कराया, लेकिन नेहरू ने कश्मीर की समस्या को बढ़ा दिया।

गृह मंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन को 6 महीने और बढ़ाने का प्रस्ताव लोकसभा में पेश किया। इस प्रस्ताव का कांग्रेस ने विरोध किया और कहा कि सूबे में चुनी हुई सरकार होती तो यह ज्यादा अच्छा होता। यही नहीं कांग्रेस ने बीजेपी पर सत्ता का दुरुपयोग करने और जबरन राष्ट्रपति शासन लगाने का आरोप लगाया। इसके जवाब में गृह मंत्री अमित शाह ने नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार तक की नीतियों पर सवाल उठाए। शाह के इस बयान पर कांग्रेस के सदस्यों ने सदन में खूब हंगामा किया। शाह ने कहा कि कांग्रेस को याद रखना चाहिए कि धारा 356 का इस्तेमाल कर सबसे ज्यादा सरकारों को उन्होंने ही गिराया। अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस ने अपने राजनीतिक लाभ के लिए चुनी हुई सरकारों को गिराने का काम किया।

शाह ने कहा, ”जब भाजपा ने पीडीपी सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो जून 2018 में जम्मू-कश्मीर की कोई पार्टी बहुमत के साथ सरकार बनाने को आगे नहीं आई। इसके बाद राज्य में छह महीने के लिए राज्यपाल शासन लगाया गया। पीडीपी ने कांग्रेस और धुर विरोधी नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ सरकार बनाने का दावा पेश किया, लेकिन विधायकों की खरीद-फरोख्त रोकने के लिए 21 नवंबर को राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने विधानसभा भंग कर दी। 20 दिसंबर से राष्ट्रपति शासन लागू है। इसे 3 जनवरी 2019 को 6 महीने के लिए सदन से मंजूरी मिली थी। अब 2 जुलाई को राष्ट्रपति शासन खत्म हो रहा है।’’

‘कश्मीर में जीरो टॉलरेंस नीति अपनाई’

गृह मंत्री ने कहा, ‘‘जम्मू-कश्मीर में यह पहली बार नहीं है कि यहां राज्यपाल या राष्ट्रपति शासन लगाया जाए। कई बार ऐसी स्थिति बनी है कि कानून में संशोधन किया गया। राज्य में पहली बार आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई गई है। सरकार ने आतंकवाद को खत्म करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी है। एक साल के अंदर वहां पंचायत चुनाव कराए गए। 40 हजार पंच और सरपंच बने, जो आज काम कर रहे हैं। हम 3 हजार करोड़ रुपए पंचायतों को देने के लिए तैयार हैं।’’

‘सरकार ने जम्मू और लद्दाख के क्षेत्र को बराबर अधिकार दिया’
शाह ने कहा, ‘‘राज्य में कई बार रक्तरंजित चुनाव देखे गए, लेकिन लोकसभा चुनाव में एक भी व्यक्ति की जान नहीं गई। मोदी सरकार ने जम्मू और लद्दाख के क्षेत्र को बराबर अधिकार दिया। 2018 में सालों से लंबित मामलों को निपटाने का काम किया गया। राष्ट्रपति शासन के एक साल में राज्य में शरणार्थियों के मसले, बंकर तैयार करने का काम हुआ। 15 हजार में से करीब 3 हजार बंकर बन चुके हैं। हमारे लिए सीमा पर रहने वाले हर नागरिक की जान कीमती है।’’

सीमा पर रहने वाले लोगों के लिए आरक्षण का प्रावधान
शाह ने कहा, ‘‘हमने जम्मू-कश्मीर के लिए आरक्षण कानून संशोधन विधेयक, 2019 के तहत राज्य के कमजोर, पिछड़ा वर्ग और अंतराष्ट्रीय सीमा के करीब रहने वाले लोगों के लिए नए सिरे से आरक्षण का प्रावधान किया है। नियंत्रण रेखा (एलओसी) और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर रहने वाले लोगों को शेल्टर होम में रहना पढ़ता है। कई दिनों तक बच्चों को यहां रहना पड़ता है। स्कूल बंद रहते हैं। उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है। इसलिए उन्हें आरक्षण दिया जा रहा है। इससे जम्मू-कश्मीर के साढ़े तीन लाख लोगों को फायदा होगा। यह आरक्षण कानून में संशोधन का प्रस्ताव किसी को खुश करने के लिए नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर के आसपास रहने वाले लोगों के हितों के लिए है।’’

आरक्षण संशोधन बिल लोकसभा में पेश हुआ था
पिछले दिनों केंद्रीय राज्य गृहमंत्री जी किशन रेड्डी ने लोकसभा में जम्मू-कश्मीर आरक्षण संशोधन विधेयक पेश किया था। इसके जरिए आरक्षण अधिनियम 2004 में संशोधन किया जाएगा। बिल पास होने से अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास रहने वाले लोगों को भी आरक्षण का लाभ मिल सकेगा। संशोधन के मुताबिक, एलओसी और अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास रहने वाले व्यक्ति अगर सुरक्षा कारणों से वहां से चले गए हों, तो उन्हें भी आरक्षण का फायदा मिल सकेगा।

कांग्रेस ने राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाने का विरोध किया
जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन बढ़ाने के प्रस्ताव का कांग्रेस ने विरोध किया। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा, ‘‘हमें आरक्षण पर आपत्ति नहीं है, लेकिन यह जिस तरीके से दिया जा रहा है, इस पर आपत्ति है। मैं भी सीमा क्षेत्र से ही आता हूं, इसलिए इसे अच्छे से समझ सकता हूं। आज जम्मू-कश्मीर में हर 6 महीने में राष्ट्रपति शासन बढ़ाने के हालात हैं तो इसकी जड़ें भाजपा-पीडीपी गठबंधन में थीं। आरक्षण सिर्फ चुनावी फायदे के लिए दिया जा रहा है। आतंकवाद के खिलाफ जंग में हम आपके (सरकार) के साथ हैं। यह भी ध्यान रखना होगा कि आप आतंकवाद से तभी लड़ पाएंगे, जब कश्मीर के लोग आपके साथ होंगे।’’

अनुच्छेद 370 की प्रकृति अस्थाई है: गृह मंत्री

शाह ने आगे कहा, ”सरकार ने राज्य में सुरक्षा व्यवस्थाएं बढ़ाने के लिए 2307 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। राज्य के 919 लोगों की सुरक्षा हटाई है। वहां उन्हें कोई खतरा नहीं है। जम्मू-कश्मीर में लोग भारत के खिलाफ बोलकर सुरक्षा हासिल कर लेते थे। जबकि असल खतरा तो उन्हें है, जो देश की एकता और अखंडता के लिए आवाज उठाते हैं। अब तक जमात-ए-इस्लामी और जेकेएलएफ पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगा था? यह भाजपा सरकार थी, जिसने इन दोनों संगठनों पर कार्रवाई की। जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाला संविधान का अनुच्छेद 370 की प्रकृति अस्थाई है।”

दो दिन के कश्मीर दौरे पर गए थे शाह
अमित शाह बुधवार को जम्मू-कश्मीर के दो दिन के दौरे पर पहुंचे थे। गुरुवार को उन्होंने शहीद एसएचओ (थाना प्रभारी) अरशद खान के परिवार से मुलाकात की। खान 12 जून को अनंतनाग में हुए फिदायीन हमले में शहीद हुए थे। शाह ने कहा कि अरशद खान की वीरता और साहस पर पूरे देश को गर्व है। दौरे में शाह ने राज्य में ओवरऑल सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की। अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा की भी चर्चा की गई। यात्रा 1 जुलाई की शुरू हो रही है।

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