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	<title>Ravivar Delhi</title>
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	<description>National Hindi Newspaper &#38; Magazine</description>
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		<title>सहारनपुर में सपा-कांग्रेस की कलह खुली, 2027 से पहले बढ़ी वर्चस्व की जंग</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Ravivar Delhi]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 19 Aug 2026 19:34:00 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[escalating battle for supremacy ahead of 2027]]></category>
		<category><![CDATA[SP-Congress feud breaks out in Saharanpur]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अजय कुमार सहारनपुर की एक बैठक ने उत्तर प्रदेश के विपक्षी गठबंधन की उस तस्वीर को सामने ला दिया, जिसे अब तक बयानबाजी के बीच दबा हुआ माना जा रहा था। जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति यानी दिशा की बैठक में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और समाजवादी पार्टी के विधायक आशु मलिक आमने-सामने आ &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://ravivardelhi.com/%e0%a4%b8%e0%a4%b9%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a8%e0%a4%aa%e0%a5%81%e0%a4%b0-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%b8%e0%a4%aa%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a5%87/">सहारनपुर में सपा-कांग्रेस की कलह खुली, 2027 से पहले बढ़ी वर्चस्व की जंग</a> appeared first on <a href="https://ravivardelhi.com">Ravivar Delhi</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph"><strong>अजय कुमार</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">सहारनपुर की एक बैठक ने उत्तर प्रदेश के विपक्षी गठबंधन की उस तस्वीर को सामने ला दिया, जिसे अब तक बयानबाजी के बीच दबा हुआ माना जा रहा था। जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति यानी दिशा की बैठक में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और समाजवादी पार्टी के विधायक आशु मलिक आमने-सामने आ गए। मुद्दा जनता की समस्याओं का था, लेकिन बात सवाल पूछने की बारी से निकलकर राजनीतिक तेवरों तक पहुंच गई। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के सामने हुई इस नोकझोंक का वीडियो सामने आया तो सहारनपुर की सियासत में हलचल मच गई।मंगलवार को विकास भवन सभागार में हुई बैठक में आशु मलिक अपनी विधानसभा से जुड़े मुद्दे उठा रहे थे। बेहड़ा संदल गांव में सड़क और अधूरे नाले का मामला सामने आया। विधायक का कहना था कि करीब चार साल पहले बनी सड़क के साथ नाला पूरा नहीं हुआ, जिससे पानी खेतों और कब्रिस्तान की तरफ जा रहा है। अधिकारी की ओर से जवाब आया कि नाला प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत नहीं आता। मलिक इससे संतुष्ट नहीं हुए और पुराने जवाब का हवाला देते हुए सवाल जारी रखा। यहीं से बैठक का माहौल गर्म होना शुरू हुआ। मलिक का तर्क सीधा था बैठक जनता के सवालों के लिए है और जनप्रतिनिधि सवाल नहीं पूछेंगे तो फिर कौन पूछेगा। वायरल वीडियो में वह जनता के मुद्दों को प्राथमिकता देने की बात कहते दिखे। दूसरी तरफ बैठक की अध्यक्षता कर रहे इमरान मसूद का कहना था कि सभी सदस्यों को बोलने का मौका मिलना चाहिए और प्रक्रिया के तहत बात रखी जानी चाहिए। मसूद ने मलिक को चेयर की अनुमति लेने की बात कही। मलिक ने इसका जवाब देते हुए बैठक को जनता के मुद्दों से जोड़ दिया। कुछ ही क्षणों में विकास की समीक्षा वाली बैठक राजनीतिक बहस में बदल गई।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस टकराव की अहम बात यह है कि दोनों नेता एक-दूसरे के लिए नए नहीं हैं। इमरान मसूद और आशु मलिक के बीच लंबे समय से राजनीतिक खींचतान चली आ रही है। मई 2025 में यह विवाद खुलकर सामने आया था, जब मसूद ने सहारनपुर देहात सीट को लेकर कांग्रेस की सक्रियता के संकेत दिए थे। इसके बाद मलिक ने मसूद को खुली चुनौती दी थी। मसूद ने भी कांग्रेस को किसी की बैसाखी की जरूरत न होने की बात कही थी। उस समय सहारनपुर की सातों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस को मजबूत करने की बात भी सामने आई थी। यहीं से आज की तस्वीर का असली मतलब समझ आता है। विवाद केवल यह नहीं है कि दिशा बैठक में कौन पहले बोला और किसने किसे रोका। असली सवाल सहारनपुर में राजनीतिक प्रभाव का है। इमरान मसूद 2024 में सहारनपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर जीतकर संसद पहुंचे। दूसरी तरफ आशु मलिक सहारनपुर देहात से सपा के विधायक हैं। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में प्रभाव रखने वाले नेता हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुस्लिम वोट का महत्व किसी से छिपा नहीं है।यानी एक तरफ सांसद के रूप में मसूद की अपनी राजनीतिक जमीन है, तो दूसरी तरफ विधायक के रूप में मलिक की अपनी पकड़। दोनों दल गठबंधन में हैं, लेकिन स्थानीय राजनीति में दोनों नेताओं की प्राथमिकताएं हमेशा एक जैसी हों, यह जरूरी नहीं। 2027 का विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आएगा, यही स्थानीय समीकरण और ज्यादा महत्वपूर्ण होंगे। आशु मलिक की राजनीति भी साधारण नहीं रही है। वह समाजवादी पार्टी के भीतर लंबे समय से प्रभावशाली चेहरा रहे हैं और कभी शिवपाल यादव के करीबी माने जाते थे। बाद में अखिलेश यादव के साथ उनकी राजनीतिक नजदीकी बनी। 2017 में समाजवादी पार्टी के भीतर मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के बीच चले संघर्ष के दौरान भी उनका नाम प्रमुखता से सामने आया था। ऐसे नेता के लिए अपने विधानसभा क्षेत्र की राजनीतिक जमीन छोड़ना आसान नहीं होगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दूसरी तरफ इमरान मसूद की राजनीति भी कई पड़ावों से गुजरकर मौजूदा मुकाम तक पहुंची है। कांग्रेस से अलग होकर सपा और फिर बसपा में जाने के बाद वह 2023 में कांग्रेस में लौटे और 2024 में सहारनपुर से लोकसभा चुनाव जीत गए। ऐसे में सांसद बनने के बाद उनका राजनीतिक आत्मविश्वास बढ़ना स्वाभाविक है। 2024 के चुनाव में सहारनपुर में कांग्रेस को करीब 44.6 फीसदी वोट मिले और मसूद ने भाजपा उम्मीदवार को लगभग 5.25 प्रतिशत के अंतर से हराया। यह जीत उन्हें स्थानीय राजनीति में मजबूत दावेदार बनाती है।यही वजह है कि 2027 की आहट के बीच सहारनपुर की यह खींचतान मामूली नहीं मानी जा सकती। गठबंधन में सीटों का तालमेल ऊपर से तय हो सकता है, लेकिन नीचे कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल अलग कहानी कहता है। अगर दो सहयोगी दलों के प्रभावशाली नेता सार्वजनिक मंच पर एक-दूसरे की बात काटते दिखें तो उसका असर संगठन के कार्यकर्ताओं और संभावित चुनावी समीकरणों पर पड़ना तय है।हालांकि इमरान मसूद ने विवाद को बड़ा राजनीतिक टकराव मानने से इनकार किया है। उनका कहना है कि कोई झगड़ा नहीं हुआ था। बैठक की अध्यक्षता उनकी जिम्मेदारी थी और वह सिर्फ यह सुनिश्चित कर रहे थे कि सभी जनप्रतिनिधियों को बोलने का मौका मिले। उनके मुताबिक आशु मलिक ज्यादा समय ले रहे थे और वह दूसरे सदस्यों की बारी सुनिश्चित करना चाहते थे। बाद में उन्होंने संबंधित अधिकारी को मामले की पूरी जानकारी एक सप्ताह के भीतर बिंदुवार उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यानी तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि जिस मुद्दे पर दोनों नेता भिड़े, वह वास्तव में जनता से जुड़ा था। सड़क, नाला, पानी, टैक्स और स्थानीय विकास जैसे सवाल किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए राजनीतिक रूप से अहम हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब जनता के सवालों की लड़ाई नेताओं के आपसी वर्चस्व की लड़ाई जैसी दिखाई देने लगे।इस पूरे घटनाक्रम में इकरा हसन की मौजूदगी भी ध्यान खींचती है। सपा सांसद दोनों नेताओं के बीच हुई बहस के दौरान पास ही बैठी थीं। उन्होंने विवाद में हस्तक्षेप नहीं किया, लेकिन उनकी मौजूदगी ने तस्वीर को और बड़ा राजनीतिक अर्थ दे दिया। एक तरफ सपा का विधायक, दूसरी तरफ कांग्रेस का सांसद और बीच में गठबंधन की राजनीति सहारनपुर की बैठक ने विपक्षी एकता की जमीनी चुनौती दिखा दी।भाजपा को भी इस विवाद पर हमला करने का मौका मिल गया। पार्टी ने इसे सपा-कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान और वर्चस्व की लड़ाई से जोड़ते हुए गठबंधन पर सवाल उठाए।लेकिन इस कहानी का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि सहारनपुर में लड़ाई सिर्फ आज की बैठक की नहीं है। यह आने वाले चुनाव की जमीन तैयार होने का संकेत है। जब एक सांसद और विधायक विकास बैठक में सवालों की बारी को लेकर भिड़ते हैं, तो उसके पीछे स्थानीय राजनीति, संगठनात्मक पकड़ और भविष्य की चुनावी दावेदारी की परतें भी होती हैं।सपा और कांग्रेस के लिए चुनौती यही है कि ऊपर के नेताओं की दोस्ती को नीचे के नेताओं की प्रतिद्वंद्विता में बदलने से कैसे रोका जाए। क्योंकि चुनावी गठबंधन सिर्फ सीटों के जोड़ से नहीं चलता। उसके लिए जमीन पर भरोसा, कार्यकर्ताओं में तालमेल और स्थानीय नेताओं के बीच न्यूनतम समन्वय जरूरी होता है।सहारनपुर की दिशा बैठक ने फिलहाल यही सवाल खड़ा किया है अगर 2027 से पहले ही गठबंधन के दो मजबूत चेहरे आमने-सामने आ गए हैं, तो चुनावी मैदान में सीटों और नेतृत्व की बारी आने पर क्या होगा? यही वह सवाल है, जिसका जवाब आने वाले महीनों में सहारनपुर की राजनीति तय करेगी।</p>
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		<title>परीक्षा की शुचिता और नौकरी की सुरक्षाः झारखंड की चुनौती</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Ravivar Delhi]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 19 Aug 2026 19:33:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[झारखंड]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[राष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[Exam integrity and job security: Jharkhand's challenge]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>ललित गर्ग झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं को लेकर पिछले पच्चीस दिनों से चला आ रहा छात्र आंदोलन अब एक नए और अधिक जटिल चरण में पहुंच गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार ने छात्र आंदोलन के दबाव, परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और परीक्षा संचालन की विश्वसनीयता पर उठे गंभीर सवालों के बीच जेएसएससी-सीजीएल, &#8230;</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>ललित गर्ग</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं को लेकर पिछले पच्चीस दिनों से चला आ रहा छात्र आंदोलन अब एक नए और अधिक जटिल चरण में पहुंच गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार ने छात्र आंदोलन के दबाव, परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और परीक्षा संचालन की विश्वसनीयता पर उठे गंभीर सवालों के बीच जेएसएससी-सीजीएल, चैदहवीं जेपीएससी सहित टीडीपीएल से जुड़ी अनेक भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने की घोषणा की है। सरकार ने वर्ष 2014 के बाद हुई नियुक्ति परीक्षाओं की जांच कराने और व्यवस्था में सुधार के लिए भी कदम उठाने की बात कही है। इस फैसले से आंदोलनरत छात्रों को बड़ी राहत मिली है, लेकिन इसके साथ ही पहले से चयनित होकर सरकारी सेवा में कार्यरत हजारों युवाओं के सामने रोजगार और भविष्य का संकट खड़ा हो गया है। यही विरोधाभास झारखंड के वर्तमान भर्ती विवाद को केवल परीक्षा घोटाले का मामला न बनाकर न्याय, प्रशासनिक जवाबदेही और मानवीय संवेदना का गंभीर प्रश्न बना देता है। रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में 25 जुलाई 2026 से शुरू हुआ छात्रों का आंदोलन जेपीएससी और जेएसएससी की भर्ती परीक्षाओं में कथित पेपर लीक, अनियमितताओं और पारदर्शिता की कमी के विरोध में था। छात्र विभिन्न परीक्षाओं की निष्पक्ष जांच, संदिग्ध प्रक्रियाओं को निरस्त करने और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग कर रहे थे। छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो ने सोलह दिनों तक आमरण अनशन किया। सरकार की घोषणा के बाद उन्होंने अनशन समाप्त किया, हालांकि कुछ छात्र अब भी केंद्रीय जांच ब्यूरो से जांच कराने की मांग पर कायम हैं। सरकार ने आठ अलग-अलग अधिसूचनाओं के माध्यम से कुल 44 परीक्षाओं को रद्द करने की सूची जारी की है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यदि किसी परीक्षा में प्रश्नपत्र लीक हुआ हो, संगठित धांधली हुई हो या चयन प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली गंभीर अनियमितता प्रमाणित हो, तो उस प्रक्रिया की जांच और आवश्यक होने पर परीक्षा रद्द करना स्वाभाविक रूप से जरूरी है। सरकारी नौकरी के लिए प्रतियोगिता करने वाले लाखों युवाओं का विश्वास तभी कायम रह सकता है, जब उन्हें यह भरोसा हो कि उनकी मेहनत किसी दलाल, भ्रष्ट अधिकारी, परीक्षा संचालक या अनुचित साधन अपनाने वाले व्यक्ति के कारण व्यर्थ नहीं जाएगी। इसलिए छात्रों की पारदर्शी और निष्पक्ष भर्ती व्यवस्था की मांग पूरी तरह जायज है। लेकिन समस्या उस समय गंभीर हो जाती है जब किसी परीक्षा में हुई सामूहिक अनियमितता के कारण उन अभ्यर्थियों को भी नौकरी से हटाने का फैसला किया जाता है जिनके विरुद्ध व्यक्तिगत स्तर पर किसी गलत आचरण का प्रमाण नहीं है। जेएसएससी-सीजीएल के चयनित कर्मचारियों का वर्तमान विरोध इसी मूल प्रश्न को सामने रखता है। दिसंबर 2023 में परीक्षा आयोजित हुई थी। पेपर लीक के आरोपों के बाद सितंबर 2024 में परीक्षा दोबारा आयोजित की गई। मामला न्यायालय तक पहुंचा और न्यायिक प्रक्रिया के बाद परिणाम घोषित किए गए। सफल अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र भी दिए गए और अनेक लोग सरकारी सेवा में कार्यरत हो गए। अब पूरी प्रक्रिया को निरस्त किए जाने से लगभग दो हजार चयनित कर्मचारी सीधे प्रभावित हुए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार करीब 1975 लोगों की नियुक्तियां इस फैसले से प्रभावित हुई हैं। इन कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार परीक्षा दी, सफलता प्राप्त की, नियुक्ति पत्र पाया और सेवा में योगदान किया। यदि किसी स्तर पर भ्रष्टाचार हुआ है तो उसकी जांच हो, लेकिन सभी चयनित अभ्यर्थियों को दोषी मानकर नौकरी से हटाना न्यायसंगत नहीं है।<br>सरकारी नौकरी मिलने के बाद अनेक युवाओं ने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए ऋण लिया, मकान या अन्य आवश्यकताओं के लिए वित्तीय जिम्मेदारियां उठाईं और अपनी दूसरी नौकरियां छोड़ दीं। उनके जीवन की योजनाएं नियमित वेतन और सरकारी सेवा की स्थिरता पर आधारित हो गईं। हटाए गए कर्मचारियों की पीड़ा और नाराजगी को भी उसी गंभीरता से सुना जाना चाहिए, जिस गंभीरता से छात्रों की शिकायतें सुनी गईं। यहां मूल सवाल यह है कि परीक्षा में अनियमितता और अभ्यर्थी की व्यक्तिगत संलिप्तता के बीच अंतर कैसे किया जाए। यदि किसी अभ्यर्थी ने पेपर खरीदा, नकल की, अनुचित साधन अपनाया या किसी दलाल के माध्यम से लाभ प्राप्त किया, तो उसके विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन जिसने बिना किसी सिद्ध कदाचार के परीक्षा दी, परिणाम में सफल हुआ और नियुक्त होकर सेवा कर रहा है, उसके मामले में केवल परीक्षा प्रक्रिया की खामी को आधार बनाकर सामूहिक दंड देना न्याय के सिद्धांतों पर प्रश्न खड़े करता है। दोषी को बचाना अन्याय है, लेकिन निर्दोष को दंडित करना भी उतना ही बड़ा अन्याय है। सरकार को इसी संतुलन की कसौटी पर अपने निर्णय को परखना होगा। राज्य सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे आंदोलनरत छात्रों के विश्वास को बनाए रखना है और दूसरी ओर हटाए गए कर्मचारियों के अधिकारों तथा आजीविका की रक्षा का रास्ता तलाशना है। केवल परीक्षा रद्द कर देने से समस्या समाप्त नहीं होगी। सरकार को स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच करानी होगी, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि अनियमितता किस स्तर पर हुई, कौन लोग इसके लिए जिम्मेदार थे और किन अभ्यर्थियों ने अनुचित लाभ उठाया। जांच की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिस पर छात्र भी विश्वास कर सकें और चयनित कर्मचारी भी। यदि जांच निष्पक्ष होगी तो दोषियों पर कार्रवाई के साथ निर्दोषों को राहत देने का रास्ता भी निकलेगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सरकार को अपने निर्णय के कानूनी आधार को स्पष्ट करना होगा और प्रभावित कर्मचारियों को अपनी बात रखने का उचित अवसर देना होगा। किसी भी प्रशासनिक निर्णय की मजबूती केवल उसकी मंशा से नहीं, बल्कि उसकी विधिक प्रक्रिया और न्यायसंगतता से तय होती है। यदि कर्मचारियों ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का निर्णय लिया है तो उन्हें कानून के माध्यम से अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है। सरकार को भी न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करते हुए पारदर्शी ढंग से सभी दस्तावेज और जांच के तथ्य सामने रखने चाहिए। झारखंड का यह संकट केवल एक राज्य की भर्ती व्यवस्था की समस्या नहीं है। यह देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता से जुड़े बड़े सवाल की ओर संकेत करता है। एक पेपर लीक या भर्ती में धांधली उनकी मेहनत, समय और मानसिक ऊर्जा को प्रभावित करती है। इसलिए प्रश्नपत्र की सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, डिजिटल व्यवस्था, मूल्यांकन की पारदर्शिता और परिणामों की विश्वसनीयता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। निजी परीक्षा एजेंसियों को जिम्मेदारी सौंपने की स्थिति में भी उनकी जवाबदेही, निगरानी और दंड की स्पष्ट व्यवस्था जरूरी है। किसी एजेंसी की गलती के कारण पूरी पीढ़ी का भविष्य अनिश्चित नहीं होना चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सरकार को अब ऐसा स्थायी तंत्र विकसित करना चाहिए जिसमें परीक्षा प्रक्रिया के प्रत्येक चरण की जवाबदेही तय हो। शिकायतों के निवारण की समयबद्ध व्यवस्था भी होनी चाहिए, ताकि छात्रों को आंदोलन या लंबी कानूनी लड़ाई का सहारा लेने की आवश्यकता कम हो। साथ ही, यदि किसी परीक्षा में गंभीर गड़बड़ी प्रमाणित होती है तो दोषियों पर त्वरित कार्रवाई और प्रभावित अभ्यर्थियों के लिए न्यायपूर्ण वैकल्पिक व्यवस्था की जानी चाहिए। झारखंड में वर्तमान परिस्थिति से सबसे बड़ी सीख यही है कि सरकार को छात्रों और कर्मचारियों में से किसी एक को चुनने के बजाय न्याय का रास्ता चुनना होगा। छात्रों की मेहनत और भविष्य की रक्षा जरूरी है, लेकिन निर्दोष चयनित कर्मचारियों की आजीविका की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। परीक्षा रद्द करना अंतिम समाधान नहीं, बल्कि एक कठिन प्रक्रिया की शुरुआत है। वास्तविक सफलता तब होगी जब दोषी पहचाने जाएं, भ्रष्ट तंत्र पर कठोर प्रहार हो, निर्दोषों को राहत मिले और भविष्य की भर्ती व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी बने। सरकार यदि निष्पक्ष जांच, कानूनी प्रक्रिया, मानवीय संवेदना और संस्थागत सुधार के आधार पर आगे बढ़ती है तो आज का संकट झारखंड की भर्ती व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय बनाने का अवसर बन सकता है। अन्यथा एक आंदोलन समाप्त होकर दूसरा आंदोलन शुरू होता रहेगा और सबसे बड़ी कीमत वही युवा पीढ़ी चुकाएगी, जो मेहनत के बल पर अपने भविष्य का निर्माण करना चाहती है।</p>
<p><a class="a2a_button_whatsapp" href="https://www.addtoany.com/add_to/whatsapp?linkurl=https%3A%2F%2Fravivardelhi.com%2F%25e0%25a4%25aa%25e0%25a4%25b0%25e0%25a5%2580%25e0%25a4%2595%25e0%25a5%258d%25e0%25a4%25b7%25e0%25a4%25be-%25e0%25a4%2595%25e0%25a5%2580-%25e0%25a4%25b6%25e0%25a5%2581%25e0%25a4%259a%25e0%25a4%25bf%25e0%25a4%25a4%25e0%25a4%25be-%25e0%25a4%2594%25e0%25a4%25b0-%25e0%25a4%25a8%25e0%25a5%258c%25e0%25a4%2595%25e0%25a4%25b0%2F&amp;linkname=%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE%20%E0%A4%95%E0%A5%80%20%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE%20%E0%A4%94%E0%A4%B0%20%E0%A4%A8%E0%A5%8C%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A5%80%20%E0%A4%95%E0%A5%80%20%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%BE%E0%A4%83%20%E0%A4%9D%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%96%E0%A4%82%E0%A4%A1%20%E0%A4%95%E0%A5%80%20%E0%A4%9A%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A5%80" title="WhatsApp" rel="nofollow noopener" target="_blank"></a><a class="a2a_button_facebook" 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		<title>मायावती भी चुनावी मूड में, भतीजे को कमान, सतीश मिश्रा को नई जिम्मेदारी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Ravivar Delhi]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 19 Aug 2026 19:31:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[आलेख]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीति]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य]]></category>
		<category><![CDATA[Mayawati also in election mood]]></category>
		<category><![CDATA[nephew takes charge]]></category>
		<category><![CDATA[Satish Mishra gets new responsibility]]></category>
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<p>The post <a href="https://ravivardelhi.com/%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a4%a4%e0%a5%80-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%b5%e0%a5%80-%e0%a4%ae%e0%a5%82%e0%a4%a1-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82/">मायावती भी चुनावी मूड में, भतीजे को कमान, सतीश मिश्रा को नई जिम्मेदारी</a> appeared first on <a href="https://ravivardelhi.com">Ravivar Delhi</a>.</p>
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<p class="wp-block-paragraph"><strong>संजय सक्सेना</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में अब छह माह का समय बचा है, इसको देखते हुए बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सुप्रीमो मायावती ने अभी से जमीन तैयार करनी शुरू कर दी है। पार्टी के भीतर बीते कुछ हफ्तों में जो संगठनात्मक फेरबदल हुए हैं, उनसे साफ संकेत मिलता है कि बसपा इस बार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। एक तरफ मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को संगठन और चुनाव प्रचार की अगुवाई सौंपी है, तो दूसरी तरफ पार्टी के भरोसेमंद ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्रा का कद और बढ़ा दिया गया है। यह दोहरी रणनीति बसपा के सामाजिक समीकरण और पारिवारिक उत्तराधिकार, दोनों मोर्चों को साधने की कोशिश मानी जा रही है।बसपा में उत्तराधिकार को लेकर पिछले कुछ वर्षों में उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। एक समय मायावती ने आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था, फिर विवादों के चलते उन्हें पार्टी पदों से हटाया भी गया। लेकिन विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही पार्टी ने उन्हें फिर से सक्रिय भूमिका में ला खड़ा किया है। अब आकाश आनंद राष्ट्रीय संयोजक के तौर पर सक्रिय हैं और उन्हें प्रत्याशियों के चयन की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है। उनकी अगुवाई में होने वाले कार्यकर्ता सम्मेलनों में संभावित उम्मीदवारों के नामों पर मुहर लगाई जाएगी। इस नई भूमिका के तहत आकाश आनंद ने 10 अगस्त को हाथरस के सादाबाद से अपने अभियान की शुरुआत की। इसके बाद 25 अगस्त को गौतमबुद्ध नगर के जेवर में भी उनकी अध्यक्षता में कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित होना तय है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, लखनऊ में हुई तीन दिवसीय बैठक के बाद यह फैसला लिया गया कि आकाश आनंद को अब यूपी और उत्तराखंड की राजनीति में सक्रिय भूमिका दी जाए, जबकि पहले उन्हें इन राज्यों की राजनीति से जानबूझकर दूर रखा गया था। पार्टी पदाधिकारियों का मानना है कि प्रचार अभियान की कमान संभालने से आकाश आनंद का सियासी कद और मजबूत होगा।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हालांकि मायावती ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि टिकट बंटवारे का अंतिम और सर्वोच्च फैसला सिर्फ वही लेंगी। इसमें आकाश आनंद की कोई निर्णायक भूमिका नहीं होगी। राजनीतिक हलकों में इस बयान को शक्ति-संतुलन बनाए रखने की एक सोची-समझी कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। मतलब साफ है कि प्रचार और संगठन की जिम्मेदारी भतीजे को, लेकिन असली सत्ता की डोर अभी भी मायावती के हाथ में ही रहेगी। इसी बीच बसपा ने एक और अहम संगठनात्मक फैसला लिया है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा की जिम्मेदारियां और बढ़ा दी गई हैं। अब वे कानूनी और मीडिया से जुड़े कामकाज के साथ-साथ चुनाव आयोग से संबंधित महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी संभालेंगे। मायावती ने खुद सोशल मीडिया पर लिखा कि यूपी विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के तहत पार्टी का जनाधार सभी वर्गों में मजबूत किया जा रहा है, साथ ही प्रत्याशियों के चयन और उनकी घोषणा की प्रक्रिया भी विधानसभा-स्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलनों के जरिए चल रही है। उन्होंने दावा किया कि बसपा की इन तैयारियों से विरोधी दलों में बेचैनी बढ़ गई है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सतीश चंद्र मिश्रा को दी गई यह नई जिम्मेदारी अचानक नहीं आई है। बसपा के लिए ब्राह्मण वोट बैंक हमेशा से एक अहम सामाजिक समीकरण रहा है, और मिश्रा दशकों से इस समीकरण के केंद्र में रहे हैं। लेकिन हाल के वर्षों में पार्टी के कई कद्दावर ब्राह्मण नेता एक-एक कर साथ छोड़ते गए हैं। पूर्व मंत्री नकुल दुबे 2022 में कांग्रेस में चले गए, पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय, रंगनाथ मिश्रा और विनय शंकर तिवारी जैसे नेता भी पार्टी से दूर हो चुके हैं। हाल ही में बसपा के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा को भी पार्टी-विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित किया गया। दिलचस्प बात यह है कि अंटू मिश्रा को सतीश चंद्र मिश्रा का करीबी माना जाता रहा है, और चर्चा यह भी थी कि वे चुनाव से पहले किसी दूसरे दल का रुख कर सकते हैं। इन घटनाक्रमों के बीच बसपा की सियासी नर्सरी से ब्राह्मण नेताओं का लगातार खिसकना पार्टी के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। ऐसे में मायावती का सतीश मिश्रा पर भरोसा जताना और उनकी जिम्मेदारियां बढ़ाना, इस बिखराव को थामने और बचे-खुचे ब्राह्मण जनाधार को एकजुट रखने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी अब पूरी तरह से मिश्रा के चेहरे और उनके संगठनात्मक अनुभव पर दांव लगाना चाहती है, ताकि सर्व समाज के जनाधार वाली अपनी पुरानी छवि को दोबारा मजबूत किया जा सके।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>दोहरी रणनीति के मायने</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">मायावती की यह दोहरी रणनीति एक तरफ पारिवारिक उत्तराधिकार को संस्थागत रूप देना, दूसरी तरफ सामाजिक समीकरणों को संभालने के लिए अनुभवी चेहरों को आगे रखना और बसपा के भविष्य की दिशा तय करने वाली मानी जा रही है। आकाश आनंद के जरिए पार्टी युवा और सक्रिय नेतृत्व का संदेश देना चाहती है, जबकि सतीश मिश्रा के जरिए पार्टी अपने परंपरागत सामाजिक आधार और अनुभव को बरकरार रखने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा के लिए 2027 का चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि पार्टी के अस्तित्व से जुड़ा सवाल भी है। बीते कुछ चुनावों में लगातार कमजोर होते प्रदर्शन के बाद पार्टी को अपने कोर वोट बैंक के साथ-साथ नए सामाजिक समीकरण बनाने की जरूरत है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि आकाश आनंद की सक्रियता और सतीश चंद्र मिश्रा की नई भूमिका मिलकर बसपा के जनाधार को कितना विस्तार दे पाती है, और क्या पार्टी विरोधी दलों की उस बेचैनी को हकीकत में बदल पाती है, जिसका दावा मायावती खुद कर रही हैं।</p>
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