क्या भारत अब पाक रहित सार्क को करे खड़ा

आर.के. सिन्हा

हैरानी हो रही कि पाकिस्तान अब क्यों दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (सार्क) के सम्मेलन के लिए लंबे समय से लंबित शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत को दावत दे रहा है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने हाल ही में यहाँ तक कहा कि यदि भारत बैठक में व्यक्तिगत रूप से भाग नहीं लेना चाहता है तो वह वर्चुअली भी भाग ले सकता है। पाकिस्तान को भारत को सार्क सम्मेलन में भाग लेने का आमंत्रण देने से पहले यह तो याद कर ही लेना चाहिए था कि उसने 2016 में भारत के तत्कालीन केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का कितना ठंडा स्वागत किया था। राजनाथ सिंह जब पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में सार्क देशों के गृहमंत्रियों की कॉन्फ्रेंस में भाग लेने गए तो वहां पर उनका बेहद खराब ढंग से स्वागत हुआ। इतना खराब कि गोया पाकिस्तान को मेजबान धर्म का निर्वाह करने की तमीज ही न हो। पाकिस्तान ने एक के बाद एक इस तरह की हरकतें की, जिससे वह साबित कर चुका है कि उसे पड़ोसी धर्म का निर्वाह करना नहीं आता। पाकिस्तान की इन्ही करतूतों ने सार्क आंदोलन को ही पूरी तरह ही तबाह कर दिया है।

अब अचानक से उसे सार्क सम्मेलन को आयोजित करने का ख्याल आ गया है। पाकिस्तान जरा बताए तो सही कि उसने अभी तक मुंबई हमलों के गुनाहगारों को सजा क्यों नहीं दी? उन गुनाहगारों पर चल रहा केस ठंडे बस्ते में क्यों पड़ा है। भारत उससे बार-बार कहता रहा है कि मुंबई हमलों को अंजाम देने की रणनीति बनाने वाले आतंकी हाफिज सईद को तत्कालीन जेल में डाला जाए। पर पाकिस्तान ने भारत की एक नहीं सुनी। दरअसल पाकिस्तान आतंकवाद से लड़ने को कभी तैयार ही नहीं हुआ। उसकी कभी भी ऐसी नियत ही नहीं रही I दक्षिण एशियाई देशों में आतंकवाद के खात्मे के लिए उसने कभी रुचि ही नहीं दिखाई। वह तो कश्मीर से लेकर हमारे पंजाब में भारत विरोधी शक्तियों को खाद-पानी देने से भी कभी बाज ही नहीं आ रहा है। यह बात बहुत पुरानी नहीं है जब 19वां सार्क शिखर सम्मेलन नवंबर 2016 में इस्लामाबाद में होना था। लेकिन उस साल पाकिस्तानी आतंकवादियों द्वारा उरी आतंकी हमले को अंजाम दिया गया था जिसमें 17 भारतीय जवान शहीद हो गए थे। इस हमले के बाद भारत ने सार्क शिखर सम्मेलन में भाग लेने से इनकार कर दिया था। भारत का स्टैंड बिल्कुल सही था। उस देश से बात ही क्या करना जो आतंकवाद की फैक्ट्री बन चुका है।

राजनाथ सिंह को करीब से जानने वाले जानते हैं कि वे सच कहने से कभी पीछे नहीं हटते। उन्होंने इस्लामाबाद में कश्मीर में मारे गए हिज्बुल आतंकी बुरहान वानी की ओर इशारा करते हुए कहा था कि आतंकवाद का महिमामंडन बंद होना चाहिए और आतंकियों को शहीद का दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए। आतंकवाद अच्छा या बुरा नहीं होता है। राजनाथ सिंह का इशारा पाकिस्तान की तरफ ही था। राजनाथ सिंह के इस सीधे वार से पाकिस्तान जल-भून गया था। लेकिन, आप राजनाथ सिंह को सच बोलने से नहीं रको सकते।

अब शाह महमूद कुरैशी कह रहे कि सार्क एक “महत्वपूर्ण मंच” है। भारत ने इस बात से इंकार कब किया है। लेकिन, पाकिस्तान ने सार्क को महत्वपूर्ण ही कब बनने दिया। क्या यह भी कुरैशी साहब बताएंगे?

सार्क की स्थापना 8 दिसंबर, 1985 को भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, मालदीव और भूटान ने मिलकर की थी। इसके बाद अप्रैल 2007 में इसमें अफ़ग़ानिस्तान को भी आठवें सदस्य के रूप में जगह मिली। लेकिन, देखने में यह आता है कि सार्क अपने लक्ष्यों की तरफ कभी बढ़ ही नहीं सका। इससे सदस्य देशों में किसी भी तरह का आर्थिक सहयोग भी नहीं हुआ। अगर पाकिस्तान को छोड़ दिया जाए तो सार्क के सब देश मिल-जुलकर काम करना चाहते हैं। पाकिस्तान एक तरफ सार्क सम्मेलन में भारत को बुला रहा है और दूसरी तरफ वह ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक नेशंस से भारत के खिलाफ प्रस्ताव पारित करवाने की कवायद करने से भी कभी बाज नहीं आता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्कराष्ट्रों के नेताओं को आमंत्रित करके इस मृत होते जा रहे संगठन को फिर से जिंदा करने की तगड़ी पहल की थी। तब लगा था कि सार्क एक सशक्त मंच के रूप में उभर जाएगा और दक्षिण एशिया में विकास और सहयोग के नए दौर की शुरूआत होगी। लेकिन, भारत की उम्मीदों पर पाकिस्तान खरा नहीं उतरा। वहां पर इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने के बाद तो भारत विरोध और भी तेज और मुखर होता चला गया। भारत ने वैश्विक महामारी कोरोना से लड़ने में भी सार्क देशों को हर संभव सहयोग का वादा किया था। कोरोना को हराने के लिए भारत जिस तरह से लड़ा, उसे सार्क देशों के समेत सारी दुनिया ने भी देखा।

एक बात तो भारत की कूटनीति पर काम करने वाले विद्वानों और कूटनीतिज्ञों को भी अच्छी तरह समझ में आ ही गई होगी कि सार्क का कोई भविष्य नहीं रहा है। सार्क अपनी उपयोगिता को ही पूरी तरह से खो चुका है। अब यह संगठन सिर्फ कागजों पर ही रह गया है। तो भारत के सामने क्या विकल्प बचे हैं? अब भारत का रास्ता साफ है। अब भारत को सार्क में शामिल पाकिस्तान के अल्वा बचे सभी देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूती देनी होगी। उस दिशा में भारत लगातार प्रयासरत है भी। भारत के इन सभी देशों से ठोस और मधुर संबंध हैं। एक विकल्प सार्क देशों के सामने और भी है। सार्क सम्मेलन से पाकिस्तान को बाहर निकाल करके इसे नए सिरे से इस समूह को खड़ा कर सकते हैं। वे देख ही चुके हैं कि पाकिस्तान ने सार्क को किस हदतक हानि पहुंचाई है।

पाकिस्तान की भारत और बांग्लादेश से अदावत की पृष्ठभूमि से सब वाकिफ हैं। जहां पाकिस्तान खुद भारत का 1947 से पहले अंग था,वहीं बांग्लादेश 1972 से पहले पाकिस्तान ही हिस्सा था। आज पाकिस्तान की विदेश नीति का अहम अंग है भारत-बांग्लादेश लगातार विरोध। तो बताइये कि भारत या सार्क एक इस तरह के धूर्त देश के साथ कोई कैसे सहयोगपूर्ण संबंधों की उम्मीद कर सकता है। यह असंभव है। इसलिए अब कम से कम भारत को सार्क से आगे की स्थितियों के बारे में गंभीरता पूर्वक सोचना होगा।

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार और पूर्व सांसद हैं)

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