दुष्कर्म से कलंकित होता समाज

नृपेन्द्र अभिषेक नृप

राजस्थान के अलवर में मानसिक रूप से कमजोर नाबालिग के साथ सामूहिक दुष्कर्म और बर्बरता का का मामला सामने आने के बाद महिला सुरक्षा के नाम पर सरकार फिर से बेनकाब हो गई है। अलवर की मूक बधिर बेटी के साथ गैंगरेप और ‘निर्भया’ जैसी दरिंदगी के चलते लोगों में आक्रोश व्याप्त है। यहाँ मूक-बधिर नाबालिग से गैंगरेप के बाद आरोपियों ने निर्भया की तरह लहूलुहान हालत में सड़क पर फेंक कर भाग गए थे। पीड़िता की हालत गंभीर होने पर उसे जयपुर रेफर कर दिया गया जहाँ कई डॉक्टरों की टीम ने पीड़िता का ऑपरेशन किया है जिसके बाद स्थिति कुछ स्थिर बताई जा रही है। हमारे देश मे यह कोई पहली और आखिरी घटना नहीं हैं। लगातार ऐसी घटनाएं हमें देखने को मिलती आ रही है। हमेशा से महिला सुरक्षा का सरकार वादा तो करती है लेकिन कभी प्रभावी कदम नहीं उठा पाती है जिससे कि इसका समाधान हो सके। हम एक ऐसे देश मे जीवन यापन कर रहे हैं जहाँ आजादी के 75 साल होने को है लेकिन हम महिलाओं को अब भी सुरक्षित नहीं कर पाएं है। अब भी वो आजादी से बाहर घूम नहीं पाती है और जो घूमने निकलती है उसके साथ दुष्कर्म और छेड़छाड़ जैसे घटना को अंजाम दिया जाता है। सवाल यह है कि आखिर कब तक?

अपनी ममता और आंसुओ से देश का बचपन सँवारने वाली औरत , मां , बेटी ,बहन या पत्नी बनकर पुरुषों का जीवन संवारने वाली औरत आज भी जुल्मो-सितम की सलीब पर टंगी है। दर्द तो यह है कि यह सितम उस पर उसी पुरूष द्वारा डाल जाता है जिसको उसने अपनी ममता की शीतल छांव में ढक कर रखा है। दया और ममता की देवी पर इतने बड़े सामाजिक अत्याचार क्यों हो रहे हैं ? कब तक उसका बलात्कार करेगा यह समाज? कब तक उसे जिंदा जलना होगा? कब तक उसे नंगा घूमना होगा? आज जब वह ज्ञान की रोशनी पा कर तमाम पर्दों को चीरती हुई आसमां को छूने के लिए निकल पड़ी है तो फिर उस पर बलात्कार जैसे धारदार हथियार से सिर्फ हमला ही नही किया जा रहा बल्कि उसे जिंदा जला दिया जा रहा है। कैसा है हमारा समाज और कानून जहां ऐसा कोई दिन नहीं होता जब किसी लड़की, बच्ची के साथ कोई जघन्य बलात्कार और हत्या ना होता हो। महिलाओं के सशक्तिकरण में उनके खिलाफ हो रहे हिंसा उनके सामने रुकावट का पत्थर बन कर खड़ा है।

महिलाओं पर हो रहे अत्याचार आखिर रुक क्यों नहीं रहे हैं, यह सबसे बड़ा सवाल है। आए दिन उनके साथ हो रहे बलात्कार की घटनाओं को भी याद किया जा सकता है। एन सी आर बी के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले 10 वर्षों में महिलाओं के बलात्कार का खतरा 44 फीसदी तक बढ़ गया है। आंकड़ों के मुताबिक, 2010 से 2019 के बीच पूरे भारत में कुल 3,13,289 बलात्कार के मामले दर्ज हुए हैं। इन आकड़ो से आजाद भारत में महिलाओं की वर्तमान स्थिति को देखा जा सकता है। यहां हर 16 मिनट में एक महिला का बलात्कार होता रहा है।

हाल-फिलहाल की रेप की घटनाओं पर गौर करे तो एक बात नई दिख रही है। वो यह कि अभी जो भी रेप की घटनाएं हो रहीं है उसमें अत्यधिक में साक्ष्य मिटाने के लिए लड़की को जलाया जा रहा है या उसे मारा – पीटा जा रहा है जो कि अपराध को और जघन्य बना रहा है और यह सब निर्भया कांड के बाद से ही ज्यादातर दिख रहा है। इसका कारण कानून में हुए बदलाव को कहा जा सकता है , क्योंकि यह रेपिस्ट खुद को बचाने और सबूत मिटाने के लिए कर रहे हैं। तो क्या कठोर कानून मात्र से रेप रोकने में भी समस्या है क्योंकि रेप के बाद हत्या भी होने लगी है। बड़ा प्रश्न यह है कि फिर रेप का समाधान क्या हो सकता है?

निर्भया कांड , प्रियंका रेड्डी , हाथरस कांड और अब अलवर जैसी घटनाओं ने मानव जाति को शर्मसार करने का ही काम किया है। दिल्ली के निर्भया कांड के समय में भी देखा गया था कि किस तरह संपूर्ण देश में लोगों में गुस्सा उफान पर आ गया था। सरकार और व्यवस्था की “कुर्सी” हिलने लगी थी और तब जाकर शासन ने कठोर कानून बनाने की पहल की थी, लेकिन उस कानून का हस्र जो हुआ वह आपके सामने है। आज स्थिति यह है कि बलात्कार के संदर्भ में कठोरतम कानून होने के बावजूद इस तरह के प्रकरणों में कमी नहीं आ रही है । फिर समस्या कहाँ है ? क्या कठोर कानून में कमी है? क्या समाज में कमी है? अनगिनत प्रश्न समाज के समक्ष मुँह बाए खड़ा है।

रेप होने के कारणों में कुछ कारण भारतीय सिनेमा , वेब सीरीज और यहां तक कि भारत मे कुछ टीवी सीरियल में भी अश्लीलता आसानी से दिखा देने को माना जाता है। लेकिन रेप के लिए सिनेमा रूपी माध्यम को या समाज के किसी खास वर्ग को कोसना या उसका नकारात्मक चित्रण करना उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि आज हम उस दौर से बहुत आगे बढ़ चुके हैं। इंटरनेट क्रांति और स्मार्टफोन की सर्व-सुलभता ने पोर्न या वीभत्स यौन-चित्रण को सबके पास आसानी से पहुंचा दिया है। अभी तो इंटरनेट पर एड के नाम पर भी अश्लीलता परोसी जाने लगी है । इन सब कंपनियों को इन बातों से कोई मतलब नही है कि इंटरनेट पर छोटे बच्चे पढ़ रहे है और उसी बीच में एड भी आ जाता है। इंटरनेट भी अब सहज उपलब्ध है। कल तक इसका उपभोक्ता केवल समाज का उच्च मध्य-वर्ग या मध्य-वर्ग ही होता था, लेकिन आज यह समाज के हर वर्ग के लिए सुलभ हो चुका है। सबके हाथ में है और लगभग फ्री है। कीवर्ड लिखने तक की जरूरत नहीं, आप मुंह से बोलकर गूगल को आदेश दे सकते हैं। इसलिए इस परिघटना पर विचार करना किसी खास वर्ग या क्षेत्र के लोगों के बजाय हम सबकी आदिम प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास है। तकनीकें और माध्यम बदलते रहते हैं, लेकिन हमारी प्रवृत्तियां कायम रहती हैं या स्वयं को नए माध्यमों के अनुरूप ढाल लेती हैं।

आधुनिक युग में मनोवैज्ञानिकों ने भी अपने अध्ययन में पाया है कि हमारे दिमाग की बनावट इस तरह की है कि बार-बार पढ़े, देखे, सुने या किए जाने वाले कार्यों और बातों का असर हमारी चिंतनधारा पर होता ही है और यह हमारे निर्णयों और कार्यों का स्वरूप भी तय करता है। इसलिए पोर्न या सिनेमा और अन्य डिजिटल माध्यमों से परोसे जाने वाले सॉफ्ट पोर्न का असर हमारे दिमाग पर होता ही है और यह हमें यौन-हिंसा के लिए मानसिक रूप से तैयार और प्रेरित करता है। इसलिए अभिव्यक्ति या रचनात्मकता की नैसर्गिक स्वतंत्रता की आड़ में पंजाबी पॉप गानों से लेकर फिल्मी ‘आइटम सॉन्ग’ और भोजपुरी सहित तमाम भारतीय भाषाओं में परोसे जा रहे स्त्री-विरोधी, यौन-हिंसा को उकसाने वाले और महिलाओं का वस्तुकरण करने वाले गानों की वकालत करने से पहले हमें थोड़ा सोचना होगा।

रेप जैसे कुकर्मो से मुक्ति के लिए कानून और समाज दोनों को ही अपनी जिम्मेदारी लेनी होगी। अदालतों में केस का अंबार लगा है। इसमें हजारों बलात्कार के मामले दबे पड़े हैं। देश में न्याय की प्रक्रिया इतनी जटिल हो गई है कि पीड़ित हताश होने लगे हैं। न्याय की प्रक्रिया को आसान करना होगा, तभी हर व्यक्ति को समय से न्याय मिल पाएगा। आज बलात्कार के मामलों को जल्द-से-जल्द निपटाने की जरूरत है। मामलों में सजा सुनाई जाने लगी, तो फिर अपराधियों में कानून का एक खौफ हो जाएगा। वह गुनाह करने से पहले सौ बार सोचेगा। आज बलात्कार पीडिता को मेडिकल चेकअप कराने के लिए भी समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है। फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट तो बना है लेकिन उसकी प्रकिया पूरी होते होते भी काफी लंबा वक्त लग रहा है, तब तक बलात्कारी शोषित परिवार को धमका कर ही केस खत्म करवा दी रहे हैं। ऐसे में कानून का डर ही नहीं दिख रहा है। जिस तरह से दिल्ली में पुलिस का बर्ताव हुआ वैसे कई जगह के बलात्कार के केस में देखने को मिला है। ऐसे में जरूरी है कि पुलिस भी अपनी जिम्मेदारी सही- तरीके से निभाये । उन्हें कॉलेजों के बाहर अपनी गतिविधियां बढ़ानी होंगी और राह चलते लड़कियों पर फब्तियां कसने वालों पर कड़ाई से कार्रवाई करनी होगी। ऎसा होने लगा, तो इस तरह की घटनाओं में कमी जरूर आएगी। अगर बात कानून की हो तो बलात्कार की घटनाओं को रोकने के लिए कानून तो बना दिया गया, लेकिन हमें देखना होगा कि इस बीच महिलाओं के प्रति लोगों में संवेदना कितनी बढ़ी है? सरकार ने कानून तो बना दिया, लेकिन उसे क्रियान्वित नहीं कर पाई है।

आज के दौर में सामाजिक ताने-बाने को बदलने की जरूरत है, इसमें ही महिलाओं का हित है। हमारे देश में बलात्कार की घटनाएं यौन आकर्षण की वजह से नहीं होती हैं, इसके पीछे पुरूषों का महिलाओं पर अधिकार समझ लेना भी है। आज घर मे ही परिवार के सदस्यों द्वारा भी इस घटना को अंजाम दे दिया जाता है। ऐसे में जरूरी है कि समाज को भी नैतिक ज्ञान हो जिससे कि ऐसे कुकर्म करने के पहले उनका ज़मीर जाग सके। इसके लिए स्कूलों के पाठ्यक्रम में भी नैतिक शिक्षा को शामिल किया जा सकता है ताकि महिलाओं के प्रति इज्ज़त का भाव का उनमें बचपन से ही विद्यमान हो। सही शिक्षा और स्वस्थ माहौल तैयार करके ही हम उन्हें आने वाले भविष्य के लिए एक बेहतर नागरिक के तौर पर तैयार कर सकते हैं।

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