सीता राम शर्मा ” चेतन “
मल तो मल ही होता है उसे किसी भी रूप में आहार नहीं बनाया जा सकता । विष विष ही होता है उसे किसी भी रूप में अमृत नहीं बनाया जा सकता । ठीक इसी तरह आतंकवाद किसी भी स्थिति-परिस्थिति में वैश्विक मानवता के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता, यह सत्य बिना किसी स्वार्थ, लोभ और तर्क-वितर्क के संपूर्ण विश्व को त्वरित जान और मान लेना चाहिए । यह घोर आश्चर्य और चिंतन का विषय है कि इक्कीसवीं सदी का विश्व, जो खुद को बौद्धिक, भौतिक और आर्थिक रूप से सर्व समर्थ मानने लगा है इस सरल सत्य से इस तरह अनजान बना हुआ है मानों उसने अपनी तमाम मानवीय, बौद्धिक, धार्मिक, सामाजिक क्षमताओं, मान्यताओं, उपलब्धियों को दरकिनार कर आत्मघाती हो अपने मानवीय, धार्मिक और सामाजिक दायित्व बोध का पतन कर लिया हो ! फलस्वरूप संपूर्ण विश्व और वैश्विक मानवता के लिए आज आतंकवाद सबसे बड़ी और घातक समस्या बन गई है और दुर्भाग्य से इस पर आवश्यक समुचित विचार भी नहीं किया जा रहा है । अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और विकट स्थिति यह है कि आतंकवाद जैसी घोर अमानवीय, निंदनीय और अक्षम्य अव्यवस्था और उनके जनक तथा पालकों के लिए विश्व के जिन सर्वाधिक समर्थ, सशक्त और जिम्मेवार राष्ट्रों एंव संस्थाओं को आतंकवाद सहांरक का दायित्व निर्वहन करना चाहिए वे ही प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से इसके प्रायोजक, संरक्षक या फिर मूकदर्शक बन गए हैं ! कारण चाहे जो हो अंततोगत्वा यह स्थिति है उनके लिए भी घातक ही, समय रहते यह सत्य उन्हें समझने-समझाने की जरूरत है । नापाक पाकिस्तान से इसका प्रारंभ किया जा सकता है ।
आतंकवाद को लेकर चर्चा भारत में हो या विश्व के किसी भी कोने में निर्विवादित रूप से पाकिस्तान का नाम आना लगभग तय है । पाकिस्तान वैश्विक आतंकवाद का जन्म, शरण और संरक्षण स्थली बना हुआ है, यह सर्वविदित है । बावजूद इसके वह निरंकुश हुआ पूरी बेशर्मी के साथ इसे जारी रखा हुआ है तो क्यों ? यह वैश्विक चिंतन, विमर्श और आतंक रोधी क्रियाओं का केंद्र होना चाहिए । दुर्भाग्य से पाकिस्तानी आतंकवाद से सबसे ज्यादा पीड़ित देश भारत अब तक उसके विरुद्ध वैसी कार्रवाई नहीं कर पाया है, जिसका वह हकदार है । पिछले एक दशक में मोदी सरकार ने कुछ प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई अवश्य की है पर पूर्णरूपेण न्यायोचित कार्रवाई अब तक नहीं हुई है, यह कटु सत्य है । सच्चाई तो यही है कि दशकों से भारत के विरुद्ध आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने वाले कई खुंखार आतंकवादी और उनके सहयोगी संरक्षक आज भी पाकिस्तान की नापाक धरती पर पूरी आजादी और ऐशो-आराम के साथ अपना वजूद बनाए-बढ़ाए हुए हैं और वह बेखौफ होकर आतंकवाद को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है । निःसंदेह इसका मुख्य कारण आतंकवाद और आतंकवादियों के विरुद्ध वैश्विक एकजुटता का अभाव और कुछ महत्वपूर्ण शक्ति संपन्न राष्ट्रों का अपने हित और स्वार्थ के लिए चुप रहने के साथ उसे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन, संरक्षण देना रहा है । गौरतलब है कि क्यों खुद को वैश्विक महाशक्ति समझने बताने वाला अमेरिका 11 सितंबर 2001 को आतंकवाद का सबसे भयावह शिकार होने के बावजूद आज उसी नापाक पाकिस्तान को गोद में बिठाया हुआ है जिसने उसके सबसे बड़े गुनाहगार, उसके हजारों निर्दोष नागरिकों की निर्ममता और क्रूरतापूर्ण तरीके से हत्या करने वाले दुर्दांत आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को वर्षों तक अपने सैन्य क्षेत्र में छिपाकर संरक्षण देने का अत्यंत घिनौना और अक्षम्य अपराध किया था । वर्तमान अमेरिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को यह सोचने समझने की जरूरत है कि उनके देश के सबसे बड़े दुश्मन, उनके हजारों निर्दोष नागरिकों के हत्यारे उस खुंखार आतंकवादी, जिसे अमेरिका वर्षों तक पूरी दुनिया में खोज रहा था, अंततोगत्वा उसी पाकिस्तान में मिला था, जिसे अपने पहले कार्यकाल में खुद वे एक गद्दार और आतंकवादी राष्ट्र मानते थे फिर आज ऐसी कौन सी विवशता है, कौन सा ऐसा स्वार्थ या भय है, जिसके अधीन हो वे उसी आतंकी गद्दार राष्ट्र और उसके एक अधिकारी के तलवे सहला रहे हैं ? क्या वे यह जान गए हैं कि भविष्य में वह गद्दार फिर गद्दारी नहीं करेगा ? यदि ऐसी गलतफहमी है तो भी मानवता और वैश्विक भलाई की बात करने वाला, खुद को मानवाधिकार का वैश्विक ठेकेदार और ज्ञानी समझने बताने वाला अमेरिका क्या इस प्रश्न का जवाब दे सकता है कि पाकिस्तान के कई आतंकवादी और आतंकवादी संगठनों को प्रतिबंधित करने वाला अमेरिका आखिर क्यों उससे उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की, उनके खात्मे की बात नहीं करता ? क्यों उसके लिए उसे सैन्य सहयोग देने की या खुद उन्हें पाकिस्तान में ही खत्म करने की बात नहीं करता ? स्पष्ट है कि वह जानता है और पाकिस्तानी शासक भी कई बार यह स्पष्ट कर चुके हैं कि उसके यहां आतंकवाद को पनपाने बढ़ाने में अमेरिका का बड़ा स्वार्थ और योगदान रहा है । आज भी अमेरिका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से वही कर रहा है ।
अब बात आतंकवाद को लेकर भारत की, तो यह सर्वविदित है कि पाक प्रायोजित आतंकवाद का सबसे ज्यादा नुकसान भारत को ही उठाना पड़ा है । संतोष की बात यह है कि वर्तमान मोदी सरकार ने पाकिस्तानी आतंकवाद का ना सिर्फ डटकर मुकाबला किया है बल्कि बहुत हद तक उसे उसकी नापाक करतूतों का दंड भी दिया है । फिलहाल चर्चा और चिंतन इस बात पर भी कि पिछले कुछ दिनों से भारत के भीतर से पाकिस्तान को लेकर जो नरमी की बात या फिर उसके साथ संवाद की वकालत की जा रही है वह क्यों ? कोई इसमें अमेरिकन राष्ट्रपति ट्रंप की रणनीति देख रहे हैं तो कोई इसमें कुछ राष्ट्रविरोधी तत्वों की साजिश का अनुमान लगा रहे हैं । यह संतोष का विषय है कि भारत सरकार का रूख इन व्यर्थ के प्रलाप और विचारों पर स्पष्ट है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के विरुद्ध ठोस और कठोर कार्रवाई नहीं करता, अंकुश नहीं लगाता उससे कोई बात नहीं होगी और ना ही उसके प्रति अपनी वर्तमान नीति में कोई बदलाव होगा । अब जब दोनों देश के बीच संवाद को लेकर आम जनता और मीडिया में संदेह और उहापोह की स्थिति है भारत सरकार को चाहिए कि वह एक कदम और आगे बढ़कर अब वैश्विक मंच पर पाकिस्तान को लेकर अपनी नीति और बात बिल्कुल स्पष्ट कर दे कि वह पाकिस्तान से कोई भी बात या संबध को तभी आगे बढ़ाएगा जब वह भारत के गुनाहगार और दुश्मन आतंकवादियों को उसके हवाले करेगा या फिर अपने यहां उनके और उनके आतंकी संगठनों के खात्मे के लिए भारत के साथ मिलकर कठोर सैन्य कार्रवाई करने पर सहमत होगा और यदि ऐसा नहीं हुआ तो विवश होकर अंततोगत्वा अपने जनमानस और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए वह स्वंय ऐसा अवश्य करेगा । यूं भी आज नहीं तो कल कभी ना कभी अत्यंत विवशतापूर्ण स्थिति में ही सही भारत को यह करना ही होगा । रही बात पाकिस्तान से वार्ता के पक्षधर अपने यहां के पैरोकारों की तो सरकार को इस दिशा में अपने खुफिया तंत्र को त्वरित ज्यादा सजग और क्रियाशील करने की जरूरत है ।
भारत को अब आतंकवाद को लेकर बहुत गंभीरतापूर्वक विचार कर इस राष्ट्रीय और वैश्विक समस्या से मुक्ति के अपने प्रयासों, कानूनों में व्यापक सुधार, संशोधन करने और कुछ अत्यंत कठोर कानून बनाने की जरूरत है । इसके लिए जिम्मेवार वैश्विक संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय कानूनों में भी तत्काल बदलाव करने-कराने की वकालत उसे आतंकवाद से त्रस्त देशों के साथ मिलकर हर स्तर पर करनी चाहिए । भारत अपने यहां आतंकवाद को लेकर ऐसे कठोर नियम कानून बनाए जो ना सिर्फ भारत के लिए अत्यंत सार्थक परिणाम देने वाले सिद्ध हों बल्कि आतंकवाद से त्रस्त हर देश के साथ संपूर्ण विश्व के लिए भी अनुकरणीय हों । जैसे – आतंकवाद और आतंकवादी के लिए किसी भी स्थिति में मानवाधिकार की कोई बात या मानवाधिकार का कोई नियम कानून मान्य और विचारणीय भी नहीं होगा । किसी भी आतंकवादी के लिए किसी भी स्तर पर रहम के लिए कोई स्थान या कानून नहीं होगा और जो भी आतंकवादी पकड़ में आएगा, मारा जाएगा या फिर साक्ष्य के साथ चिन्हित होगा उसके परिवारिक, व्यक्तिगत और परिचित-अपरिचित संबधी, सहयोगी के विरुद्ध भी कठोर कार्रवाई होगी और यदि उसके आतंकवादी गतिविधियों की जानकारी होने के बावजूद उसने सरकार को सूचना नहीं दी होगी तो उसके विरुद्ध भी दोष के स्तर पर आतंकवादी की भांति ही ज्यादा कठोर कार्रवाई होगी । आतंकवाद से मुक्ति के लिए सरकार को आम जनता के लिए भी बड़े इनाम, लाभ और पुरस्कार ( सार्वजनिक और गुप्त रूप से ) की घोषणा करनी चाहिए । यह इनाम देशी और विदेशी नागरिकों के लिए समान रुप से लागू हो । आतंकवाद को लेकर भारत सरकार को अपनी विशेष विदेश नीति भी बनानी चाहिए । जैसे – जो देश भारत के शत्रु आतंकवादियों, आतंकवादी संगठनों को अपना शत्रु मान कर उनसे मुक्ति के लिए भारत का सहयोग, समर्थन करेगा भारत उसे अमुक-अमुक क्षेत्र में इस तरह ज्यादा सहयोग या लाभ देगा और जो भी देश किसी भी आतंकवादी या आतंकी संगठन के साथ सहयोग करेगा, नरमी बरतेगा या उसके विरुद्ध किसी भी राष्ट्रीय-अतंरराष्ट्रीय कार्रवाई में बाधा उत्पन्न करेगा उसके
साथ अमुक-अमुक क्षेत्र में वह कोई विचार, व्यवहार और व्यापार नहीं करेगा । कुल मिलाकर सार यही कि भारत सरकार को अब आतंकवाद को लेकर नियम कानून से लेकर संबध और संवाद तक में ज्यादा सजग और सक्रिय होने की जरूरत है । आतंकवाद को लेकर अंतिम स्पष्ट नीति यह कि यदि भारत के किसी शत्रु आतंकवादी या आतंकवादी संगठन को कोई देश आश्रय या सहयोग देता है तो उसे भी आतंकवादी मानकर ही वह अपने स्तर से दंडित करेगा और शत्रु आतंकवादी तथा उसके संगठन के खात्मे के लिए उस तक पहुंच कर कठोर कार्रवाई करेगा । आशा है आतंकवाद को लेकर वर्तमान भारत सरकार कुछ ऐसे काम करेगी जो वैश्विक मानव जगत और राष्ट्रों के लिए भी अनुकरणीय सिद्ध होंगे । आतंकवाद मुक्त भारत और विश्व, कैसे ? यह आज का ज्वलंत वैश्विक प्रश्न है जिसका उत्तर और समुचित निदान पाने के लिए भारत को सैद्धांतिक, वैचारिक, व्यवहारिक और संवैधानिक क्षेत्र में व्यापक बदलाव लाने की और वैश्विक मुहिम चलाने की जरूरत है ।





