आस्था की भव्यता अब प्रकृति को बोझ बनाती जा रही है

The grandeur of faith is now turning into a burden on nature

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

उत्सव कभी केवल मनुष्य के आयोजन नहीं थे; वे प्रकृति के साथ हमारी मौन आत्मीयता के प्रतीक थे। हमारी सांस्कृतिक परंपरा ने सिखाया कि आनंद तभी पूर्ण है, जब उसमें धरती, जल, वायु और समस्त जीवन के प्रति सम्मान हो। पर आज उत्सव जितने भव्य हुए हैं, उनका पर्यावरणीय बोझ भी उतना ही बढ़ा है। रोशनी, रंग और उल्लास के बीच प्लास्टिक की थैलियां, डिस्पोजेबल बर्तन और कृत्रिम सजावट हर पर्व का सामान्य हिस्सा बन चुके हैं। उत्सव समाप्त होते ही यही कचरा सड़कों, नालों, नदियों और सार्वजनिक स्थलों पर बिखर जाता है। सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि प्लास्टिक बढ़ रहा है, बल्कि यह है कि जिस प्रकृति ने उत्सव को संभव बनाया, वही सबसे अधिक उपेक्षित रह जाती है। प्रश्न केवल प्लास्टिक का नहीं, उस सांस्कृतिक चेतना का है, जिसमें कभी उत्सव और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक थे।

सभ्यताएँ त्योहार बदलने से नहीं, उनके स्वभाव बदलने से बदलती हैं। कभी पर्वों की तैयारी मिट्टी, पत्तों, बांस, कपास और प्राकृतिक रेशों से होती थी। पूजा, प्रसाद और सजावट—सब कुछ प्रकृति से आता था और अपना उद्देश्य पूरा कर उसी में सहज विलीन हो जाता था। आज सुविधा, चमक और क्षणिक आकर्षण ने उस स्वाभाविक संतुलन को विस्थापित कर दिया है। परिणामस्वरूप, त्योहारों के दौरान शहरों में सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। यही कचरा नदियों में बहकर, मिट्टी में दबकर और वातावरण में फैलकर सूक्ष्म प्लास्टिक कणों में बदल जाता है। यह प्रदूषण दिखाई नहीं देता, पर धीरे-धीरे जल, भूमि, वायु और पूरे जीवन चक्र को विषाक्त करता रहता है। सुविधा ने जीवन सरल अवश्य किया है, पर उसके पर्यावरणीय मूल्य का लेखा-जोखा आज भी अधूरा है।

समाधान भविष्य की प्रयोगशालाओं में नहीं, हमारी सांस्कृतिक स्मृति में है। भारतीय परंपरा ने प्रकृति को कभी संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का सहचर माना। इसलिए प्राकृतिक बर्तन, सजावट और पैकेजिंग केवल उपयोग की वस्तुएँ नहीं थीं, बल्कि ऐसी जीवन-दृष्टि का हिस्सा थीं, जिसमें उपभोग और संरक्षण साथ चलते थे। आज जब कुछ समुदाय सूती बैनरों, बागास की प्लेटों, प्राकृतिक रेशों और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों को अपना रहे हैं, तो वे केवल पुराने साधन नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक विवेक को पुनर्जीवित कर रहे हैं, जिसने सदियों तक प्रकृति और समाज का संतुलन बनाए रखा। यह परिवर्तन सिद्ध करता है कि उत्सव की भव्यता और पर्यावरण संरक्षण विरोधी नहीं, पूरक हैं। आधुनिकता तभी सार्थक है, जब वह परंपरा की आत्मा को सुरक्षित रखते हुए नए साधनों का विवेकपूर्ण चयन करे।

आस्था की सबसे बड़ी पहचान उसकी भव्यता नहीं, बल्कि उसके बाद बचने वाली स्वच्छता है। प्रत्येक धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव पवित्रता, स्वच्छता और सामूहिक अनुशासन का संदेश देता है। इसलिए यदि उत्सव स्थल प्लास्टिक मुक्त हों, प्रसाद वितरण में प्राकृतिक विकल्प अपनाए जाएँ और आयोजन के बाद सफाई को केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संस्कार माना जाए, तो पर्वों का उद्देश्य और अधिक सार्थक हो जाएगा। अनेक समुदाय इस दिशा में प्रेरक उदाहरण बन चुके हैं। उन्होंने सिद्ध किया है कि आधुनिक सुविधाओं के साथ भी पर्यावरण के प्रति संवेदनशील रहा जा सकता है। जब श्रद्धा के साथ पर्यावरण-बोध जुड़ता है, तब उत्सव केवल परंपरा का निर्वाह नहीं करते, बल्कि समाज के लिए आदर्श आचरण भी गढ़ते हैं।

प्लास्टिक ने केवल पर्यावरण को ही नहीं, हमारे कारीगरों की आजीविका को भी गहरी चोट पहुंचाई है। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले, बांस के शिल्पकार तथा सूत और प्राकृतिक रंगों से जुड़े कारीगर कभी त्योहारों की पहचान थे। प्लास्टिक आधारित वस्तुओं की बढ़ती निर्भरता ने उनकी उपयोगिता और रोजगार, दोनों को सीमित कर दिया। यदि प्राकृतिक सामग्रियों से बने उत्पादों को फिर प्राथमिकता मिले, तो स्थानीय उद्योगों को नई ऊर्जा, रोजगार को विस्तार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। साथ ही प्लास्टिक कचरा घटने से नगर निकायों और अपशिष्ट प्रबंधन कर्मियों पर पड़ने वाला दबाव भी कम होगा। यदि कचरे का पृथक्करण स्रोत पर ही सुनिश्चित हो, तो अपशिष्ट प्रबंधन अधिक प्रभावी और कम खर्चीला बन सकता है। यह बदलाव पर्यावरण संरक्षण के साथ आर्थिक आत्मनिर्भरता का भी सशक्त आधार बन सकता है।

हर पीढ़ी केवल अपने त्योहारों का स्वरूप नहीं चुनती, वह आने वाली पीढ़ियों की विरासत भी गढ़ती है। आज के छोटे-छोटे निर्णय ही कल की पर्यावरणीय धरोहर बनते हैं। यदि सुविधा की क्षणभंगुर चमक ही उत्सवों की पहचान बन गई, तो आने वाली पीढ़ियाँ प्रदूषित जल, क्षीण होती मिट्टी और विषाक्त वातावरण की कीमत चुकाएँगी। किंतु यदि परंपरा का हाथ फिर पर्यावरणीय चेतना से जुड़ गया, तो यही पर्व प्रकृति और समाज के बीच विश्वास, संतुलन और सहअस्तित्व का नया सेतु बनेंगे। एक प्राकृतिक थैली, मिट्टी का बर्तन, पर्यावरण-अनुकूल सजावट और कचरे का पृथक्करण—ये साधारण प्रतीत होने वाले कदम ही असाधारण परिवर्तन की आधारशिला बनते हैं। विरासत केवल स्मारकों और ग्रंथों में नहीं बसती; वह हमारे व्यवहार, प्राथमिकताओं और सामूहिक जीवन-मूल्यों में भी जीवित रहती है।

त्योहारों की सफलता का आकलन अब केवल रोशनी और भीड़ से नहीं, बल्कि उनके पर्यावरणीय पदचिह्नों से भी होना चाहिए। संस्कृति तभी जीवित रहती है, जब वह अपने मूल्यों को समयानुकूल अभिव्यक्ति देती रहे। पर्यावरण और धार्मिक परंपराओं में कोई टकराव नहीं; टकराव केवल उस सुविधा-प्रधान सोच से है, जिसने प्रकृति को उत्सव का सहभागी नहीं, उपभोग का साधन बना दिया। जिस दिन समाज यह स्वीकार कर लेगा कि पर्यावरण की रक्षा भी परंपराओं के निर्वाह जितनी ही पवित्र है, उसी दिन उत्सव अपने वास्तविक अर्थ में फिर जीवन का उत्सव बन जाएंगे। तब हमारे पर्व केवल हृदयों को नहीं जोड़ेंगे, बल्कि धरती को भी राहत देंगे; केवल परंपराओं का संरक्षण नहीं करेंगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ जल, उर्वर मिट्टी और संतुलित प्रकृति की अमूल्य विरासत भी छोड़ जाएंगे।