अशोक भाटिया
भारत जैसे विशाल और विविधता से भरे लोकतांत्रिक देश में जब नीतिगत सुधारों की ढोल-नगाड़ों के साथ घोषणा की जाती है, तो अक्सर ‘एक देश, एक विधान’ या ‘एक देश, एक राशन कार्ड’ जैसे नारे राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ जाते हैं। निश्चित रूप से, ‘एक देश, एक राशन कार्ड’ योजना ने देश के करोड़ों प्रवासी मजदूरों को यह सुरक्षा दी है कि वे देश के किसी भी कोने में रहकर अपने हिस्से का अनाज सम्मानपूर्वक पा सकें। यह एक सराहनीय कदम था, जिसने प्रशासनिक सीमाओं को तोड़कर एक गरीब नागरिक को उसकी पहचान और बुनियादी हक दिया। लेकिन ठीक इसी समय एक और बुनियादी, मानवीय और बेहद संवेदनशील सवाल देश की सामूहिक चेतना और नीति निर्माताओं के सामने मुंह बाए खड़ा है कि यदि इस देश का श्रमिक किसी भी राज्य में जाकर राशन पा सकता है, तो वह उसी देश में एक राज्य से दूसरे राज्य के बीच सुरक्षित, सुगम और सम्मानजनक सफर क्यों नहीं कर सकता? ‘एक देश, सुरक्षित सफर’ की अवधारणा आजादी के आठवें दशक में भी एक दूर की कौड़ी क्यों बनी हुई है? यह सवाल किसी एक राज्य, एक शहर या किसी एक विशिष्ट रूट का नहीं है, बल्कि यह एक गहरा और विकराल राष्ट्रीय संकट बन चुका है। हर साल जब देश अक्टूबर और नवंबर के महीनों में कदम रखता है, जब त्योहारों की एक लंबी श्रृंखला—दुर्गा पूजा, दिवाली, छठ महापर्व और इसके ठीक बाद शुरू होने वाला शादियों का राष्ट्रीय सीजन —पूरे देश को उल्लास से सराबोर कर रहा होता है, तब देश के सभी बड़े महानगर किसी उत्सव के केंद्र नहीं, बल्कि एक मानवीय त्रासदी और प्रशासनिक विफलता के युद्ध क्षेत्र में तब्दील हो जाते हैं। यह केवल मुंबई से उत्तर प्रदेश या बिहार जाने वाले श्रमिकों की पीड़ा नहीं है। यह उतनी ही बड़ी और कड़वी हकीकत दिल्ली के आनंद विहार, बेंगलुरु के यशवंतपुर, चेन्नई के सेंट्रल स्टेशन, सूरत के उधना और हैदराबाद के सिकंदराबाद स्टेशनों की भी है, जहां से लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर अपने पैतृक घरों यानी बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, झारखंड , राजस्थान और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए निकलते हैं। इन स्टेशनों पर लगने वाली कतारें, भीड़, और प्लेटफॉर्मों पर मची अफरा-तफरी किसी आधुनिक और आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर अग्रसर भारत की तस्वीर नहीं, बल्कि तंत्र की घोर संवेदनहीनता और नीतिगत दिवालिएपन का सबसे जीवंत और डरावना दस्तावेज प्रस्तुत करती हैं।
इस राष्ट्रीय संकट की भयावहता को समझने के लिए हमें उस आर्थिक रीढ़ को देखना होगा जिसे हम ‘प्रवासी श्रमशक्ति’ कहते हैं। देश के बड़े मेट्रो शहर—चाहे वह दक्षिण का बेंगलुरु और चेन्नई हो, पश्चिम का मुंबई और सूरत हो, या उत्तर की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली हो—इन सब का बुनियादी ढांचा, इनका निर्माण क्षेत्र, इनकी फैक्ट्रियां, इनकी लॉजिस्टिक्स और डिलीवरी सेवाएं पूरी तरह से इन्हीं प्रवासियों के पसीने पर टिकी हैं। ये वही श्रमिक हैं जिन्होंने कोविड-19 महामारी के दौरान पैदल चलकर हाईवे पर अपनी बेबसी दर्ज कराई थी, और आज 2026 में भी, स्थिति में कोई गुणात्मक सुधार नहीं आया है। जब देश की जीडीपी में इनका योगदान सर्वोपरि है, तो राष्ट्रीय स्तर पर उनके ‘सुरक्षित और सम्मानजनक आवागमन’ के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय प्रवासन पारगमन नीति का अभाव क्यों है? हर साल रेलवे प्रशासन यह दावा करता है कि उसने सैकड़ों या हजारों ‘फेस्टिवल स्पेशल’ ट्रेनें चलाई हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ये विशेष ट्रेनें मांग की तुलना में समुद्र में एक बूंद के समान साबित होती हैं। जब नई दिल्ली या सूरत के उधना स्टेशन पर एक अनारक्षित (जनरल) ट्रेन आती है, तो उसमें चढ़ने के लिए होने वाली जद्दोजहद किसी जीवन-मरण के संघर्ष जैसी होती है। खिड़कियों से बच्चों को अंदर फेंकना, दरवाजों पर लटकना, और पुलिस की लाठियां खाना इन श्रमिकों की नियति बन चुकी है। ट्रेन के भीतर सामान्य क्षमता से चार से पांच गुना अधिक लोग ठुंसे होते हैं, जहां शौचालय के फर्श से लेकर सामान रखने वाले रैक तक पर इंसानी जिस्म लदे होते हैं। कई बार इस अत्यधिक भीड़ के कारण दम घुटने से या प्लेटफॉर्म पर मची भगदड़ में लोग अपनी जान तक गंवा बैठते हैं। क्या एक लोकतांत्रिक देश में अपने परिवार के साथ त्योहार मनाने या किसी सामाजिक विवाह कार्य में शामिल होने की इच्छा रखने वाले नागरिक को यह न्यूनतम सुरक्षा भी नहीं मिलनी चाहिए कि वह बिना अपनी जान जोखिम में डाले सफर कर सके?
विडंबना का सबसे तीखा पहलू यह है कि एक तरफ हमारा रेल इंफ्रास्ट्रक्चर ‘वंदे भारत’, ‘अमृत भारत’ और ‘बुलेट ट्रेन’ जैसी प्रीमियम, अत्याधुनिक और हाई-स्पीड ट्रेनों का जाल बिछाने पर अरबों रुपये खर्च कर रहा है, जो निश्चित रूप से देश के एक खास वर्ग और प्रगति के लिए आवश्यक है, लेकिन दूसरी तरफ उसी इंफ्रास्ट्रक्चर के भीतर सामान्य जनरल डिब्बों की संख्या लगातार कम होती जा रही है या वे जस की तस बनी हुई हैं। रेलवे के आधुनिकीकरण के इस दौर में सबसे निचला पायदान यानी आम भारतीय नागरिक पूरी तरह से उपेक्षित छोड़ दिया गया है। जब तत्काल और नियमित आरक्षण खिड़कियां खुलती हैं, तो आईआरसीटीसी के डिजिटल सर्वर पर कुछ ही सेकंड के भीतर सीटें ‘नो रूम’ या सैकड़ों की वेटिंग लिस्ट में बदल जाती हैं। इस डिजिटल दीवार को पार करना एक अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे मजदूर के लिए असंभव होता है, जिसका सीधा फायदा टिकटों की कालाबाजारी करने वाले दलालों का एक संगठित राष्ट्रीय सिंडिकेट उठाता है। जो मजदूर दिन में चार सौ या पांच सौ रुपये कमाता है, उसे एक कन्फर्म टिकट के लिए अपनी महीनों की कमाई दलालों के हवाले करनी पड़ती है। और जब रेलवे से भी बात नहीं बनती, तो निजी परिवहन माफिया के रूप में एक और शोषण का चक्रव्यूह तैयार मिलता है। दिल्ली से पटना, सूरत से गोरखपुर, या बेंगलुरु से भुवनेश्वर के रूटों पर चलने वाली निजी बसों के किराए त्योहारों के सीजन में चार से पांच गुना तक बढ़ा दिए जाते हैं। दो हजार का टिकट दस हजार तक बिकता है, और राज्य परिवहन विभाग मूकदर्शक बने केवल कागजी चेतावनियां जारी करते रहते हैं। यह एक तरह की खुली और संगठित डकैती है जो हर साल देश के सबसे गरीब तबके की जेब पर डाली जाती है।
यह संकट सिर्फ प्रशासनिक विफलता का नहीं, बल्कि गहरी राजनीतिक बेरुखी का भी है। देश के जिन राज्यों से बड़े पैमाने पर पलायन होता है, जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश या ओडिशा, वहां की सरकारें अपने नागरिकों को रोजगार देने में विफल रहने के बाद उन्हें दूसरे राज्यों में भेज तो देती हैं, लेकिन जब उनके इन्हीं नागरिकों पर संकट आता है, तो वे केंद्र या दूसरे राज्यों पर जिम्मेदारी डालकर पल्ला झाड़ लेती हैं। वहीं दूसरी तरफ, जिन राज्यों में ये प्रवासी जाकर काम करते हैं, वहां के क्षेत्रीय राजनीतिक दल चुनाव के समय तो इनके तुष्टिकरण के लिए ‘प्रवासी प्रकोष्ठ’ बनाते हैं, लेकिन संकट के समय इन्हें बाहरी या दोयम दर्जे का नागरिक मानकर छोड़ दिया जाता है। इस राष्ट्रीय विरोधाभास का अंत होना बेहद जरूरी है। यदि हम सचमुच ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का दावा करते हैं, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि देश के किसी भी नागरिक की गतिशीलता और उसका सुरक्षित सफर उसके मौलिक अधिकारों का हिस्सा है। केंद्र सरकार को एक ऐसी पारदर्शी और गतिशील राष्ट्रीय यात्री प्रबंधन प्रणाली विकसित करनी होगी, जो त्योहारों और शादियों के सीजन के डेटा का अग्रिम विश्लेषण करके, मांग के अनुपात में ट्रेनों के फेरे और जनरल कोचों की संख्या को वास्तविक रूप से बढ़ा सके। तत्काल टिकट प्रणाली को दलालों से मुक्त करने के लिए सुरक्षा ऑडिट और कड़े कानूनी कदम उठाने होंगे। साथ ही, विभिन्न राज्यों के परिवहन निगमों को मिलकर अंतर-राज्यीय रूटों पर सस्ती और सुरक्षित बस सेवाएं चलानी होंगी ताकि निजी ऑपरेटरों की लूट पर पूर्ण विराम लगाया जा सके। जब तक हम अपने देश के श्रमिकों को भेड़-बकरियों की तरह सफर करने पर मजबूर करते रहेंगे, तब तक हमारे चमकते हुए स्टेशनों, आधुनिक ट्रेनों और डिजिटल इंडिया के बड़े-बड़े दावे पूरी तरह से खोखले, बेमानी और एक क्रूर उपहास प्रतीत होते रहेंगे। भारत की आत्मा इन प्रवासियों के सुरक्षित सफर और उनकी गरिमा में बसती है, और तंत्र को अब अपनी आंखें खोलनी ही होंगी।





