नवरात्रि में कन्या पूजन की परंपरा से लेकर सरकारी योजनाओं और चुनावी राजनीति तक, स्त्री शक्ति का सम्मान आज देश में सामाजिक परिवर्तन और सत्ता के नए समीकरणों का नया आधार बन रहा है।
प्रेम प्रकाश
नवरात्रि के दौरान ही नहीं, देश की नीति और राजनीति में भी पिछले एक-दो दशकों में कन्या पूजन की परंपरा प्रगाढ़ हो रही है। देवी के नौ रूपों की आराधना और छोटी बच्चियों के चरण पूजने की धार्मिक परंपरा अब सरकारी योजनाओं, राजनीतिक नारों और चुनावी घोषणाओं में भी अपनी जगह बना चुकी है। महिलाओं के खातों में सीधे पैसे पहुंचाने से लेकर बेटियों की शिक्षा और भविष्य सुरक्षित करने तक, सरकारों की प्राथमिकताओं में महिलाओं से जुड़ी योजनाओं का दायरा लगातार बढ़ा है। यह बदलाव दिखाता है कि महिलाएं अब महज एक बड़ा मतदाता वर्ग नहीं, बल्कि चुनावी नतीजों और सत्ता के समीकरण बदलने वाली निर्णायक राजनीतिक शक्ति बन चुकी हैं।
महिलाओं को मुख्यधारा में लाने की दरकार
इन नीतियों के जमीनी असर पर जुलाई 2026 में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के एक अध्ययन में भी महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए। महाराष्ट्र और ओडिशा की महिला नकद हस्तांतरण योजनाओं के विश्लेषण में पाया गया कि इनसे घरेलू खर्च बढ़ा और स्वास्थ्य, शिक्षा तथा जीवन स्तर पर होने वाला व्यय बेहतर हुआ। बिहार के महिला स्वयं सहायता समूह के जीविका मॉडल की सराहना तो विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान तक ने की।
इसमें कहीं दो राय नहीं कि समावेशी विकास के तकाजों के साथ महिलाओं को आर्थिक मदद देकर उन्हें मुख्यधारा में लाने वाली इस तरह की योजनाएं महज चुनावी घोषणाएं नहीं, बल्कि परिवारों की आर्थिक प्राथमिकताओं और महिलाओं की भूमिका में बदलाव लाने वाले व्यापक सामाजिक परिवर्तन का हिस्सा बन रही हैं।
सामाजिक व्यवहार में बदलाव
गौरतलब है कि केंद्र सरकार की बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना वर्ष 2015 में शुरू हुई। इसका उद्देश्य बाल लिंगानुपात में सुधार, कन्या भ्रूण हत्या पर अंकुश और बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित करना है। जागरूकता और सामाजिक व्यवहार में बदलाव की यह पहल सुकन्या समृद्धि योजना जैसी वित्तीय सुरक्षा की व्यवस्था के साथ आगे बढ़ी। लखपति दीदी पहल, स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं को आजीविका और उद्यम के माध्यम से आर्थिक रूप से सक्षम बनाने पर केंद्रित है। वहीं, समग्र शिक्षा अभियान और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय जैसी व्यवस्थाएं लड़कियों की शिक्षा, सुरक्षित वातावरण और पढ़ाई जारी रखने के अवसर बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इसी तरह, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत पात्र महिलाओं को पहले बच्चे के जन्म पर पांच हजार रुपये और दूसरी संतान लड़की होने पर निर्धारित शर्तों के अनुसार छह हजार रुपये की सहायता दी जाती है। इस तरह केंद्र की नीतियों में शिक्षा, बचत, मातृत्व सहायता और आजीविका के अलग-अलग पहलू शामिल हैं।
केंद्र के साथ राज्य सरकारों ने भी बढ़ाया कदम
राज्य सरकारों ने भी बालिकाओं की शिक्षा और आर्थिक सुरक्षा के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना, मध्य प्रदेश की लाड़ली लक्ष्मी योजना, दिल्ली की लाड़ली योजना और पश्चिम बंगाल की कन्याश्री योजना बालिकाओं के जन्म, शिक्षा और भविष्य को सुरक्षित करने पर केंद्रित हैं। बिहार की मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना भी बालिकाओं को जन्म से उच्च शिक्षा तक विभिन्न चरणों में प्रोत्साहन राशि देती है। इन योजनाओं का साझा उद्देश्य परिवारों को बेटियों की शिक्षा जारी रखने और उनके भविष्य में निवेश के लिए प्रेरित करना है।
महिला सशक्तीकरण की राजनीति
इस बात पर आज समाज औऱ विचार के तमाम हलकों में व्यापक सहमति है कि हाल के वर्षों में महिला सशक्तीकरण की राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा उन योजनाओं के रूप में सामने आया है, जिनमें महिलाओं के बैंक खातों में सीधे आर्थिक सहायता पहुंचाई जाती है। मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। यह महिलाओं को नियमित आर्थिक लाभ देने वाली राज्य सरकार की बड़ी और सफल फ्लैगशिप योजनाओं में शामिल हुई, जिसने इस मॉडल को व्यापक राजनीतिक पहचान दिलाई। इसके बाद दूसरे राज्यों में भी ऐसी योजनाओं का विस्तार हुआ। महाराष्ट्र की मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहीण, कर्नाटक की गृह लक्ष्मी, पश्चिम बंगाल की लक्ष्मी भंडार, झारखंड की मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान और बिहार की मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना इसी प्रवृत्ति के प्रमुख उदाहरण हैं। ओडिशा की सुभद्रा योजना भी महिलाओं को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता देने की इसी व्यापक पहल का हिस्सा है।
विकास का समावेशी मॉडल
बिहार ने इस पहल को नया आयाम दिया। वहां 2025 में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना शुरू हुई । इस योजना का घोषित उद्देश्य महिलाओं को केवल आर्थिक राहत देना नहीं, बल्कि उन्हें छोटे कारोबार, पशुपालन, सिलाई, हस्तशिल्प और अन्य स्वरोजगार गतिविधियों के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाना है। राज्य के हालिया विधानसभा चुनाव में इस योजना का राजनीतिक प्रभाव खास तौर पर चर्चा में रहा। इस योजना से प्रदेश में अब तक एक करोड़ 81 लाख महिलाओं के बैंक खातों में कुल 18,100 करोड़ रुपये हस्तांतरित किए जा चुके हैं। इस तरह की पहल कई अन्य सरकारी प्रयासों के साथ मिलकर सामाजिक परिवर्तन और विकास के एक समावेशी मॉडल के रूप में उभर रही है।
विरासत, परंपरा और विकास
विरासत, परंपरा और विकास के समावेशी तकाजों के साथ देश में महिला सशक्तीकरण की दिशा में आए इस बड़े बदलाव को देखने-समझने की जरूरत है। इस लिहाज से कह सकते हैं कि नवरात्रि में कन्या पूजन की परंपरा हमें स्त्री शक्ति के सम्मान का संदेश देती है। यदि एक ओर कन्या के चरण पूजे जाएं और दूसरी ओर लड़कियों की शिक्षा, सुरक्षा, स्वतंत्रता तथा समान अवसरों को लेकर उदासीनता बनी रहे, तो यह परंपरा अपने वास्तविक अर्थ से दूर रह जाएगी। लिहाजा चुनावी प्रतिस्पर्धा यदि सरकारों को महिलाओं और बालिकाओं के लिए बेहतर योजनाएं बनाने के लिए प्रेरित करती है, तो यह भारतीय लोकतंत्र का एक सकारात्मक उभार है।





