अजय कुमार
तारीख बदलने, भाषणों के सुर ऊंचे होने और विज्ञापनों में बापू की मुस्कुराती तस्वीर छप जाने से राष्ट्रपिता के सपनों का भारत नहीं बनता, क्योंकि आज के राजनीतिक परिदृश्य की कड़वी सच्चाई यह है कि गांधी अब चुनावी पंचांग का एक ऐसा कर्मकांड बन चुके हैं, जिसका इस्तेमाल हर दल अपनी सुविधा के मुताबिक साल में एक बार अपनी राजनीतिक दुकान चमकाने के लिए करता है। दो अक्टूबर 2026 को देश जब महात्मा गांधी की 157वीं जयंती मना रहा है, तब संसद से लेकर सड़क तक सियासत का जो चरित्र दिख रहा है, वह बापू के विचारों की छाती पर मूंग दलने जैसा है। 1869 में पोरबंदर की उस माटी से उठा वह फकीर, जिसने बिना किसी तामझाम के अंग्रेजों की नींव हिला दी थी, अगर आज लौटकर आ जाए तो वह मौजूदा सत्ता के गलियारों में चल रहे उस पाखंड को देखकर हैरान रह जाता, जहां हर जुबान पर गांधी का नाम है, लेकिन नस-नस में कुर्सी की हवस और नफरत का जहर भरा है।आंकड़े और चुनावी प्रबंधन आज की राजनीति का एकमात्र भगवान बन चुके हैं, जहां लोकतंत्र का मतलब केवल बूथ जीतना, जाति का गणित साधना और सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी के जरिए विरोधी को कीचड़ में घसीटना रह गया है। साल 1917 का चंपारण सत्याग्रह हो या 1930 का दांडी मार्च, गांधी ने हमेशा उस शख्स की बात की जो समाज की सबसे निचली सीढ़ी पर भूखा बैठा था, लेकिन आज के हुक्मरानों की प्राथमिकताएं देखिए कि वे विकास के कागजी आंकड़े और जीडीपी की चमकती हुई ग्रोथ तो पेश कर रहे हैं, मगर देश के गांवों और खेतों से उठने वाली सिसकियों की आवाज उनके महलों तक नहीं पहुंचती। नीति आयोग और श्रम संगठनों के आंकड़े गवाही देते हैं कि देश में अमीरी और गरीबी के बीच की खाई लगातार चौड़ी हो रही है, कॉर्पोरेट घरानों की तिजोरियां नोटों से भरी जा रही हैं और दिहाड़ी मजदूर दो जून की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है। गांधी का ‘स्वदेशी’ और ‘स्वावलंबन’ का विचार आज सिर्फ भाषणों की शोभा बढ़ाने की चीज बनकर रह गया है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि हर छोटी-छोटी जरूरत के लिए देश विदेशी और देशी पूंजीपतियों की गुलामी करने को मजबूर है।
राजनीतिक शुचिता और वैचारिक सहिष्णुता की बात करना तो आज के दौर में सबसे बड़ा गुनाह बन गया है। लोकतंत्र की खूबसूरती यह थी कि सत्ता पक्ष और विपक्ष मिलकर देश की तकदीर लिखते थे, लेकिन आज संसद से लेकर विधानसभाओं तक जिस तरह की भाषा, अमर्यादित टिप्पणियां और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ मची है, वह गांधी के अहिंसक और सहनशील भारत के मुंह पर तमाचा है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक मंचों पर नफरत भरे भाषणों और ध्रुवीकरण की भाषा में भारी उछाल आया है, और हर दल इसमें एक-दूसरे से आगे निकलने की फिराक में है। बापू ने सिखाया था कि विरोधी के प्रति भी मन में द्वेष नहीं होना चाहिए, लेकिन आज का राजनीतिक सच यह है कि जो हमारे पाले में नहीं है, उसे देश का गद्दार साबित करने की पूरी फैक्ट्री चलाई जा रही है। गांधी का नाम लेकर स्वच्छता अभियान के नाम पर झाड़ू उठाना तो सबको याद है, लेकिन विचारों के भीतर जो गंदगी भर चुकी है, उसे साफ करने की हिम्मत किसी दल में नहीं बची है।गांधीजी ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि जिस देश को आजाद कराने के लिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लाठियां खाईं और जेलों में रहे, वहां के नेता और राजनीतिक दल सत्ता की मलाई खाने के बाद लोकतंत्र को ही बंधक बना लेंगे। आज की राजनीति का सबसे डरावना सच यह है कि चुनाव आयोग के आंकड़ों से लेकर राजनीतिक दलों के चुनावी चंदे तक, हर जगह काले धन और पूंजीपतियों का खुला कब्जा हो चुका है। बापू ने ग्राम स्वराज की बात कही थी, जहां हर गांव अपनी जरूरतों के लिए आत्मनिर्भर हो, लेकिन आज हालत यह है कि गांवों के युवा रोजगार की तलाश में महानगरों की तरफ पलायन करने को मजबूर हैं और वहां जाकर दो वक्त की रोटी के लिए नारकीय जीवन जीने को अभिशप्त हैं। सरकारी फाइलों में योजनाओं के बड़े-बड़े आंकड़े दर्ज होते हैं, लेकिन जमीन पर वे योजनाएं दम तोड़ती नजर आती हैं। जब कोई गरीब या किसान अपनी जायज मांगों को लेकर सड़क पर उतरता है, तो उसे अन्नदाता कहने वाले ये हुक्मरान उसकी आवाज को कुचलने के लिए लाठी और गोली का सहारा लेते हैं। क्या यही वह रामराज्य था जिसकी कल्पना गांधी ने की थी?
आज वैचारिक दीवालियेपन का आलम यह है कि राजनीतिक दलों के पास जनता को देने के लिए कोई विजन नहीं बचा है, सिवाय इसके कि वे इतिहास के पन्नों को पलटें और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालें। कोई गोडसे का महिमामंडन करके अपनी राजनीतिक जमीन तलाशता है तो कोई गांधी के नाम का मुखौटा पहनकर अपने गुनाहों को छिपाने की कोशिश करता है। इस वैचारिक पाखंड ने देश के युवाओं को भटकाव के रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया है। आज का युवा रोजगार, शिक्षा और बेहतर भविष्य के बजाय जाति और धर्म के नाम पर बंटे हुए अखाड़ों का मोहरा बन रहा है। राजनेता मंचों पर खड़े होकर शांति और अहिंसा के बड़े-बड़े उपदेश देते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे वही लोग दंगों की आग में राजनीतिक रोटियां सेकते हैं। आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि चुनावी मौसम आते ही किस तरह से समाज में नफरत का तापमान बढ़ा दिया जाता है ताकि जनता असल मुद्दों यानी महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य से भटकी रहे।जब तक इस देश की राजनीति में बापू के नैतिक सिद्धांतों की वापसी नहीं होगी, तब तक केवल दो अक्टूबर को समाधि स्थल पर फूल मालाएं चढ़ाने से कुछ नहीं बदलेगा। आज जरूरत इस बात की है कि जनता खुद खड़ी हो और इन पाखंडी नेताओं से उनके किए गए वादों का हिसाब मांगे। लोकतंत्र का मतलब सिर्फ पांच साल में एक बार ईवीएम का बटन दबाना नहीं है, बल्कि हर दिन सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ सवाल उठाना है। यदि आज हमने अपनी आंखें नहीं खोलीं, तो यह खोखली सियासत हमारे संविधान और हमारी गंगा-जमुनी तहजीब को पूरी तरह से निगल जाएगी। बापू के विचार हमें याद दिलाते हैं कि अन्याय सहना भी उतना बड़ा अपराध है जितना अन्याय करना। इसलिए, इस जयंती पर केवल औपचारिकता निभाने के बजाय यह कसम खाने की जरूरत है कि हम इस झूठ और फरेब की राजनीति को उखाड़ फेंकेंगे और एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे जहां हर नागरिक सिर उठाकर जी सके।





