विद्यालयों में बढ़ता मानसिक दबाव, शिक्षकों का शोषण और जवाबदेही से परे होता प्रबंधन—एक राष्ट्रीय चिंता
सत्य भूषण शर्मा
“यदि किसी राष्ट्र का भविष्य देखना हो तो उसके विद्यालयों में जाइए, और यदि विद्यालयों का भविष्य जानना हो तो वहाँ के शिक्षकों के चेहरे पढ़िए।”
आज यह कथन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है। बाहर से भव्य भवन, वातानुकूलित कक्षाएँ, स्मार्ट बोर्ड, अंतरराष्ट्रीय स्तर के परिणाम और आकर्षक विज्ञापन—इन सबके पीछे एक ऐसा वर्ग खड़ा है, जिसकी थकान दिखाई नहीं देती, जिसका तनाव सुनाई नहीं देता और जिसकी पीड़ा अक्सर उपलब्धियों के शोर में दब जाती है। यह वर्ग है—शिक्षकों का।
भारत की नई शिक्षा नीति, राष्ट्रीय विकास के लक्ष्य और “विकसित भारत 2047” का सपना तभी साकार होगा, जब शिक्षक सम्मान, सुरक्षा और आत्मविश्वास के साथ कार्य कर सके। किंतु दुखद वास्तविकता यह है कि अनेक निजी विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों का एक बड़ा वर्ग आज मानसिक तनाव, प्रशासनिक दबाव, कार्य-असंतुलन, असुरक्षित सेवा-शर्तों और कभी-कभी अनुचित व्यवहार जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। यह केवल श्रम का प्रश्न नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, नैतिकता और भविष्य का प्रश्न है।
शिक्षक या बहुउद्देशीय कर्मचारी?
एक समय था जब शिक्षक का मुख्य कार्य विद्यार्थियों को पढ़ाना, मार्गदर्शन देना और उनके व्यक्तित्व का निर्माण करना था। आज कई स्थानों पर उसकी भूमिका अनगिनत गैर-शैक्षणिक जिम्मेदारियों से भर गई है। प्रवेश अभियान, सोशल मीडिया प्रचार, विपणन गतिविधियाँ, डेटा अपलोड, निरीक्षण तैयारियाँ, विभिन्न पोर्टलों पर रिपोर्टिंग, कार्यक्रम प्रबंधन, अभिभावकों से निरंतर संवाद, देर रात तक मोबाइल संदेशों का उत्तर—इन सबके बीच वास्तविक अध्यापन कहीं पीछे छूटने लगता है।
विडंबना यह है कि उत्कृष्ट परिणामों की अपेक्षा भी उसी शिक्षक से की जाती है, जिसके पास स्वयं अध्ययन, योजना और नवाचार के लिए समय ही नहीं बचता।
सम्मान की जगह भय का वातावरण:
विद्यालय अनुशासन के केंद्र होने चाहिए, किंतु अनुशासन और भय समानार्थी नहीं हैं।
जहाँ संवाद की जगह आदेश ले लेते हैं, जहाँ सुझावों की जगह चेतावनियाँ सुनाई देती हैं, जहाँ छोटी-सी त्रुटि पर सार्वजनिक फटकार सामान्य बात बन जाती है, वहाँ शिक्षक धीरे-धीरे अपनी सृजनात्मकता खो देता है। निरंतर निगरानी, मूल्यांकन का दबाव, नौकरी खोने का भय और असुरक्षा की भावना मिलकर उसे मानसिक रूप से थका देती है।
भयग्रस्त शिक्षक कभी प्रेरणादायी शिक्षक नहीं बन सकता।
मानसिक स्वास्थ्य—जिस पर सबसे कम चर्चा होती है:
हम विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य की बात करते हैं, जो अत्यंत आवश्यक भी है। किंतु क्या कभी हमने शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर चर्चा की?
लगातार तनाव, कार्य का असंतुलन, अवकाश का अभाव, पारिवारिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव और भविष्य की अनिश्चितता अनेक शिक्षकों को भावनात्मक थकान (Burnout) की स्थिति तक पहुँचा देती है। इसका प्रभाव केवल शिक्षक पर नहीं पड़ता; उसका सीधा प्रभाव विद्यार्थियों के सीखने के वातावरण, विद्यालय की संस्कृति और शिक्षा की गुणवत्ता पर भी पड़ता है।
क्या शिक्षा सेवा है या केवल व्यवसाय?
निजी विद्यालयों ने देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विस्तार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। यह स्वीकार करना न्यायसंगत होगा कि अनेक संस्थान उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं और वहाँ शिक्षक सम्मानपूर्वक कार्य करते हैं।
किन्तु जब शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रतिस्पर्धा, ब्रांडिंग और आर्थिक सफलता तक सीमित होने लगता है, तब सबसे पहले शिक्षक की गरिमा प्रभावित होती है।
विद्यालय उद्योग नहीं हैं; वे संस्कारों की प्रयोगशालाएँ हैं। यहाँ लाभ से अधिक विश्वास, परिणाम से अधिक व्यक्तित्व और अनुशासन से अधिक मानवीय संवेदना का महत्व होना चाहिए।
क्या सुधार संभव हैं?—निश्चित रूप से:
समस्या का समाधान टकराव नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार है।
प्रत्येक विद्यालय में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष शिकायत निवारण समिति हो।
शिक्षकों के कार्य-घंटों और गैर-शैक्षणिक कार्यों की स्पष्ट सीमा निर्धारित की जाए।
मानसिक स्वास्थ्य एवं तनाव प्रबंधन के लिए नियमित परामर्श सत्र आयोजित किए जाएँ।
सेवा-शर्तों में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित हो।
सम्मानजनक संवाद को विद्यालय संस्कृति का अनिवार्य अंग बनाया जाए।
उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षकों को केवल पुरस्कार ही नहीं, निर्णय प्रक्रिया में भी भागीदारी मिले।
नियामक संस्थाएँ समय-समय पर कार्यस्थल संस्कृति का भी मूल्यांकन करें, केवल परीक्षा परिणामों का नहीं।
समाज को भी आत्ममंथन करना होगा:
हम शिक्षक दिवस पर पुष्प अर्पित करते हैं, मंचों से उनका गुणगान करते हैं, किंतु क्या हम उनके आत्मसम्मान की रक्षा भी उतनी ही गंभीरता से करते हैं?
एक शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तक नहीं पढ़ाता; वह भविष्य लिखता है।
यदि वही निराश, अपमानित और भयभीत रहेगा, तो वह विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, नैतिकता और राष्ट्रप्रेम की लौ कैसे प्रज्वलित करेगा?
अंतिम प्रश्न… जो हम सबके लिए है:
जब किसी विद्यालय की सफलता का श्रेय प्रबंधन को मिलता है, तब उसकी असफलताओं का सबसे बड़ा बोझ अक्सर शिक्षक पर क्यों डाल दिया जाता है?
जब शिक्षक से उत्कृष्ट परिणाम, अनुशासन, नवाचार, संस्कार और समर्पण की अपेक्षा की जाती है, तो क्या उसे सम्मान, सुरक्षा और गरिमापूर्ण कार्य वातावरण देना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी नहीं है?
आज आवश्यकता किसी पक्ष या विपक्ष की नहीं, बल्कि शिक्षा के पक्ष में खड़े होने की है।
जिस दिन शिक्षक का आत्मसम्मान सुरक्षित हो जाएगा, उसी दिन भारत की शिक्षा व्यवस्था अपनी सबसे बड़ी परीक्षा में सफल मानी जाएगी।
आइए, हम केवल “श्रेष्ठ विद्यालय” बनाने का संकल्प न लें, बल्कि “श्रेष्ठ कार्यस्थल वाले विद्यालय” भी बनाएँ—जहाँ शिक्षक भय से नहीं, विश्वास से पढ़ाएँ; आदेश से नहीं, प्रेरणा से काम करें; और जहाँ प्रबंधन तथा शिक्षक दोनों मिलकर राष्ट्र के भविष्य का निर्माण करें।
क्योंकि…
“जिस राष्ट्र में शिक्षक सम्मानित होता है, वहीं ज्ञान संस्कृति बनता है; और जहाँ शिक्षक अपमानित होता है, वहाँ शिक्षा केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है।”





