जेंन ज़ेड के आक्रोश से सत्ता के गलियारों में खलबली!

There is panic in the corridors of power due to the anger of Gen Z!

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

वैश्विक स्तरपर भारत की राजनीति में 12 अक्टूबर 2026 का दिन युवा असंतोष,चुनावी पारदर्शिता विपक्षी लामबंदी और लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर एक बड़े सवाल के साथ सामने आया है—क्या जेंन ज़ेड यांने नई पीढ़ी का राजनीतिक आक्रोश सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है? दिल्ली में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग,विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण को लेकर विवाद,विपक्षी नेताओं का सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च और उसी दिन जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाने का निर्णय इन घटनाओं ने राष्ट्रीय राजनीति को नया मोड़ दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तरपर भी युवा आंदोलनों की ताकत पर चर्चा इसलिए बढ़ी है,क्योंकि बांग्लादेश और नेपाल में हाल के वर्षों में युवाओं के नेतृत्व वाले प्रदर्शनों ने सरकारों के भविष्य को प्रभावित किया।

साथियों बात अगर हम जंतर- मंतर पर रोक नहीं, प्रदर्शन स्थल में बदलाव,लेकिन सवाल अनेक! इसको समझने की करें तो, 12 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को आधिकारिक रूप से निर्धारित प्रदर्शन स्थलों कीसूची से हटाने और उसके स्थान पर तीन नए स्थानों रामलीला मैदान,बुराड़ी मैदान तथा पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड को प्रदर्शन के लिए चिन्हित करनेकी घोषणा की।मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार के 11 अक्टूबर के आदेश ने 28 अप्रैल 2022 के पुराने स्थायी आदेश में आंशिक संशोधन किया। इस बदलाव के पीछे केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित समिति की सिफारिशों का उल्लेख किया गया है।नए स्थलों पर प्रदर्शन आयोजित करने के लिए विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया अलग से जारी किए जाने की बात कही गई है। जंतर-मंतर लंबे समय से देश के राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों का एक प्रमुख प्रतीक रहा है। यहां नागरिक संगठनों,विद्यार्थियों, राजनीतिक दलों और विभिन्न जनसमूहों ने अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाया है। ऐसे में इस स्थान को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाना केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं,बल्कि सार्वजनिक विरोध की पहुंच,दृश्यता और व्यवस्था को लेकर व्यापक बहस का विषय बन गया है।प्रशासन की ओर से वैकल्पिक स्थलों की व्यवस्था और भीड़ प्रबंधन जैसे कारणों का उल्लेख किया गया है। दूसरी ओर, आंदोलनकारी संगठनों को आशंका है कि राजधानी के केंद्रीय राजनीतिक क्षेत्र से प्रदर्शनों को दूर करने पर उनकी आवाज कीसार्वजनिक पहुंच प्रभावित हो सकती है। इसलिए मूल प्रश्न यह है कि क्या नए स्थान नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को समान रूप से व्यावहारिक बनाए रखेंगे?यह कहना कि सरकार ने निश्चित रूप से जेंन ज़ेड के आंदोलन से डरकर यह फैसला लिया है, उपलब्ध तथ्यों से सिद्ध नहीं होता। आदेश में गृह मंत्रालय की समिति की सिफारिशों का उल्लेख है, लेकिन इसके राजनीतिक प्रभावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है। किसी फैसले की वास्तविक मंशा का मूल्यांकन उसके आधिकारिक आधार, लागू नियमों, प्रदर्शनकारियों को मिलने वाली सुविधाओं और उसके व्यावहारिक परिणामों से किया जाना चाहिए, केवल घटनाओं के एक साथ घटित होने से नहीं।

साथियों बात अगर हम जेंन ज़ेड का आक्रोश और एनडीए की कशमकश, को समझने की करें तो चिराग पासवान से मांझी तक अलग-अलग राजनीतिक संकेत दिल्ली में चल रहे विरोध प्रदर्शनों का केंद्र केवल एक प्रदर्शन स्थल नहीं,बल्कि चुनावी प्रक्रिया कीविश्वसनीयता और राजनीतिक जवाबदेही का प्रश्न भी है।सीजेपी सहित युवा समूहों और विपक्षी दलों की ओर से मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की जा रही है। विवाद का एक प्रमुख आधार विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआऱ के दौरान मतदाता सूचियों में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने को लेकर उठे सवालहैं।विपक्ष इसे मताधिकार और चुनावी निष्पक्षता से जुड़ा विषय बता रहा है, जबकि निर्वाचन आयोग की ओर से मतदाता सूची की शुद्धता और निर्धारित प्रक्रिया का पक्ष रखा गया है। इन आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच अंतिम निष्कर्ष के लिए तथ्यात्मक जांच,पारदर्शिता और कानूनी प्रक्रिया आवश्यक हैं।एनडीए के भीतर सहयोगी दलों के अलग-अलग राजनीतिक संकेत इस विवाद को और दिलचस्प बनाते हैं। आपके दिए गए विवरण के अनुसार, चिराग पासवान युवाओं के प्रति सहानुभूति और उनके सवालों को सुनने की जरूरत पर जोर देते दिखाई दे रहे हैं, जबकि जीतन राम मांझी केंद्र सरकार के समर्थन में खड़े हैं। इन रुखों को गठबंधन के भीतर मतभेद की संभावना के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन केवल अलग-अलग बयानों से गठबंधन में किसी बड़े संकट का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।राजनीतिक गठबंधन की असली परीक्षा तब होती है,जब युवाओं की आकांक्षाएं सरकार की नीतियां और चुनावी गणित एक-दूसरे से टकराते हैं।युवा मतदाता रोजगार, भर्ती परीक्षाओं की निष्पक्षता,शिक्षा,महंगाई,भ्रष्टाचार और राजनीतिक जवाब देही जैसे मुद्दों पर स्पष्ट उत्तर चाहते हैं। यदि राजनीतिक दल इन प्रश्नों को केवल विपक्ष की रणनीति बताकर खारिज करते हैं, तो असंतोष बढ़ सकता है। इसके विपरीत, यदि शिकायतों की निष्पक्ष जांच और समयबद्ध समाधान सामने आते हैं, तो तनाव कम करने का रास्ता खुल सकता है।

साथियों बात अगर हम बांग्लादेश और नेपाल: जब युवाओं की सड़कें सत्ता परिवर्तन का कारण बनीं इसको समझने की करें तो, भारत में जेंन ज़ेड की राजनीतिक शक्ति को समझने के लिए पड़ोसी देशों के अनुभवों पर ध्यान देना जरूरी है।हालांकि हर देश की राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक परिस्थितियां अलग होती हैं, लेकिन इन घटनाओं से एक साझा सबक मिलता है,जब युवा असंतोष व्यापक जनसमर्थन, संगठित आंदोलन और शासन के प्रति अविश्वास के साथ जुड़ जाता है,तो उसका प्रभाव सत्ता के शीर्ष तक पहुंच सकता है।बांग्लादेश,अगस्त 2024: शुरुआत सरकारी नौकरियों में आरक्षण व्यवस्था के विरोध में छात्र प्रदर्शनों से हुई थी। धीरे-धीरे आंदोलन व्यापक सरकार-विरोधी संघर्ष में बदल गया। हिंसक कार्रवाई, बड़ी संख्या में मौतों और बढ़ते जनआक्रोश के बीच 5 अगस्त 2024 को प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस्तीफा दे दिया और देश छोड़ दिया। इसके साथ ही उनके लगभग 15 वर्ष के शासन का अंत हुआ। यह घटनाक्रम दिखाता है कि रोजगार के अवसरों और सरकारी भर्ती में निष्पक्षता जैसे प्रश्न किस तरह व्यापक राजनीतिक संकट का रूप ले सकते हैं। नेपाल, सितंबर 2025: नेपाल में युवाओं के नेतृत्व वाले प्रदर्शनों के पीछे भ्रष्टाचार,आर्थिक असमानता, बेरोजगारी और राजनीतिक व्यवस्था के प्रति असंतोष जैसे मुद्दे थे। सोशल मीडिया मंचों पर प्रतिबंध लगाने के फैसले ने भी विरोध को उग्र बनाने में भूमिका निभाई। प्रदर्शन देशभर में फैले, हिंसा में लोगों की जान गई और अंततः प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। इस घटनाक्रम ने दक्षिण एशिया में युवा आंदोलनों की राजनीतिक ताकत को फिर से रेखांकित किया। इन दोनों उदाहरणों को भारत की परिस्थितियों पर सीधे लागू करना उचित नहीं होगा। भारत में नियमित चुनाव, बहुदलीय लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाएं और न्यायिक समीक्षा की स्थापित व्यवस्थाएं हैं। फिर भी संदेश स्पष्ट है,युवा पीढ़ी को केवल चुनाव के समय याद करना पर्याप्त नहीं है। उसकी शिकायतों को समय रहते सुनना और संस्थागत समाधान देना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के हित में है।

साथियों बात अगर हम सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च: क्या न्यायपालिका और चुनाव आयोग पर दबाव बनाने की कोशिश? इसको समझने की करें तो 12 अक्टूबर को दिल्ली में विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं का सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च चुनावी विवाद को एक नए चरण में ले गया। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में एसआईआऱ प्रक्रिया को लेकर सवाल और मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांग शामिल थी। राहुल गांधी सहित विपक्षी नेताओं की ओर से न्यायपालिका के समक्ष अपना पक्ष रखने का प्रयास किया गया, लेकिन भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने विपक्षी नेताओं के प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इनकार किया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने न्यायपालिका को राजनीतिक विवादों में खींचने से बचने और अदालत के कामकाज को बाधित न करने की आवश्यकता पर जोर दिया। यहां एक संवैधानिक अंतर समझना जरूरी है। किसी संस्था के निर्णय की आलोचना करना, अपनी शिकायत प्रस्तुत करना और न्यायिक प्रक्रिया के जरिए राहत मांगना लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंग हैं;लेकिन न्यायपालिका पर किसी विशेषराजनीतिक निष्कर्ष के लिए दबाव बनाना अलग बात है। इसी प्रकार, चुनाव आयोग से जवाबदेही मांगना और किसी संवैधानिक पदाधिकारी का इस्तीफा मांगना राजनीतिक अभिव्यक्ति के दायरे में हो सकता है, लेकिन इस्तीफे की मांग अपने आप में आरोपों को सिद्ध नहीं करती।विपक्ष के लिए चुनौती यह है कि वह अपने आरोपों को प्रमाण, दस्तावेज और कानूनी आधार के साथ प्रस्तुत करे। चुनाव आयोग के लिए चुनौती यह है कि मतदाता सूची में नाम हटाने, जोड़ने और सुधारने की प्रक्रिया पर उठने वाले सवालों का पारदर्शी और विश्वसनीय उत्तर दे।न्यायपालिका की भूमिका कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर विवादों का निर्णय करना है, न कि किसी राजनीतिक पक्ष की मांग को स्वतः स्वीकारकरना।

साथियों बात अगर हम 2027 के विधानसभा चुनाव: क्या जेंन ज़ेड बदल सकता है चुनावी गणित? इसको समझने की करें तो, 2027 में सात राज्यों,उत्तर प्रदेश, पंजाब,उत्तराखंड,गोवा,मणिपुर,गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने की संभावना है। चुनाव की आधिकारिक तारीखें निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित की जानी हैं।इनमें उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा राजनीतिक अखाड़ा होगा,जहां 403 विधानसभा सीटों पर मुकाबला राष्ट्रीय राजनीति की दिशा को प्रभावित कर सकता है। उत्तर प्रदेश के संदर्भ में आपके द्वारा उल्लिखित अनुमान के अनुसार, जेंन ज़ेड मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 15 प्रतिशत मानी जा रही है। इस आंकड़े को आधिकारिक मतदाता आंकड़े के रूप में प्रस्तुत करने से पहले निर्वाचन आयोग के आयु-आधारित आंकड़ों से सत्यापित करना जरूरी है। फिर भी इतना स्पष्ट है कि युवा मतदाता रोजगार, शिक्षा,भर्ती परीक्षाओं, डिजिटल स्वतंत्रता और शासन की जवाबदेही जैसे विषयों पर निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।2022 के विधानसभा चुनाव के बारे में दिया गया यह दावा कि 99 सीटों पर जीत-हार का अंतर 10,000 से कम था, आधिकारिक निर्वाचन परिणामों के आधार पर जांचा जाना चाहिए। यदि यह संख्या सत्यापित होती है, तो इसका राजनीतिक अर्थ महत्वपूर्ण होगा: करीबी मुकाबले वाली सीटों पर युवा मतदाताओं की भागीदारी, मतदान प्रतिशत और मतदान के अंतिम विकल्प परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, केवल युवा आबादी का आकार किसी दल की जीत सुनिश्चित नहीं करता।उनकी प्राथमिकताएं क्षेत्र,वर्ग, रोजगार की स्थिति और स्थानीय उम्मीदवारों के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।एनडीए के लिए यह समय युवाओं की शिकायतों का जवाब देने और रोजगार,भर्ती प्रक्रिया तथा चुनावी पारदर्शिता पर ठोस कदम दिखाने का है।विपक्ष के लिए भी केवल विरोध प्रदर्शन पर्याप्त नहीं होंगे;उसे विश्वसनीय विकल्प और स्पष्ट नीतियां प्रस्तुत करनी होंगी।जेंन ज़ेड किसी एक दल की स्थायी संपत्ति नहीं है वह उपलब्ध विकल्पों, अपने अनुभवों और भविष्य की उम्मीदों के आधार पर निर्णय कर सकती है।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि सरकार का डर या लोकतंत्र की परीक्षा?जंतर- मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने का निर्णय, सीजेपी और विपक्ष का आंदोलन,सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च और 2027 के चुनावों की आहट,इन सभी घटनाओं ने एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है।क्या प्रशासनिक फैसले नागरिकों के विरोध के अधिकार को सीमित कर रहे हैं, या भीड़ प्रबंधन के लिए वैकल्पिक व्यवस्था बना रहे हैं? क्या चुनावी प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों का पर्याप्त उत्तर दिया जा रहा है? और क्या राजनीतिक दल युवाओं के असंतोष को समझने के बजाय उसे केवल सत्ता संघर्ष के चश्मे से देख रहे हैं?इन प्रश्नों के उत्तर किसी अनुमान से नहीं, बल्कि तथ्यों, आधिकारिक आदेशों, निष्पक्ष जांच और लोकतांत्रिक व्यवहार से मिलेंगे। जंतर- मंतर का नाम सूची से हटना अपने आप में सरकार के डर का प्रमाण नहीं है; लेकिन इस फैसले का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होगा कि नागरिकों को नए स्थलों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की कितनी प्रभावी सुविधा मिलती है।