अशोक भाटिया
भारतीय सिनेमा और सामाजिक चेतना का एक बेहद मुखर, बेबाक और ओजस्वी अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया। दिग्गज अभिनेता और संवेदनशील सामाजिक कार्यकर्ता नाना पाटेकर (विश्वनाथ पाटेकर) का 75 वर्ष की आयु में गोवा स्थित उनके आवास पर कार्डियक अरेस्ट के कारण अचानक निधन हो गया । उनके इस आकस्मिक महाप्रयाण से न केवल मनोरंजन जगत स्तब्ध है, बल्कि देश ने एक ऐसा सजग नागरिक और वैचारिक स्तंभ खो दिया है, जिसने कभी भी व्यवस्था के सामने झुकना या सच को छिपाना नहीं सीखा। भारतीय राजनीति और कला के अंतर्संबंधों के इतिहास में नाना पाटेकर का स्थान हमेशा अद्वितीय रहेगा, क्योंकि उन्होंने कभी भी किसी राजनैतिक दल का झंडा थामे बिना, जनता के हितों की निर्भीक वकालत की। उनके निधन के इस शोक संतप्त क्षण में, उनके उस अनोखे और बेबाक राजनीतिक दृष्टिकोण का समग्र विश्लेषण करना आज के दौर के लिए एक आवश्यक वसीयतनामा है। समकालीन दौर में जब अधिकांश हस्तियां किसी न किसी राजनीतिक खेमे या विचारधारा की सुरक्षित छांव तलाश लेती हैं, नाना पाटेकर पूरी तरह स्वतंत्र, व्यवस्था-उन्मुख, राष्ट्र-केंद्रित और आम नागरिक की पीड़ा से उपजे हुए दर्शन पर अडिग रहे। उनका राजनीतिक चरित्र किसी पारंपरिक दलीय सांचे में नहीं समा सकता था।
नाना पाटेकर की राजनीतिक सोच का सबसे पहला और बुनियादी नियम था—किसी भी राजनीतिक दल के प्रति स्थायी वफ़ादारी न रखना। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि जिस क्षण एक कलाकार या बुद्धिजीवी किसी दल विशेष की सदस्यता ग्रहण कर लेता है, वह अपनी स्वतंत्र सोचने की और सच को सच कहने की क्षमता को हमेशा के लिए खो देता है। दलीय कार्यकर्ता बनने के बाद व्यक्ति को दल के केंद्रीय नेतृत्व की कमियों पर मौन साधना पड़ता है और उसकी गलतियों की ज़िम्मेदारी भी अपने कंधों पर ढोनी पड़ती है। नाना पाटेकर ने अपने जीवन में इस आत्मघाती समझौते को कभी स्वीकार नहीं किया।
वर्ष 2014 के आम चुनावों के दौरान जब देश में एक बड़ा वैचारिक बदलाव आ रहा था, तब उन्हें देश के सबसे बड़े राजनीतिक दलों (विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी द्वारा मुंबई से) की ओर से चुनावी मैदान में उतरने के सीधे प्रस्ताव मिले थे। किसी भी सामान्य अभिनेता के लिए संसद पहुंचने का यह एक सुगम मार्ग हो सकता था, लेकिन नाना ने इसे सिरे से ठुकरा दिया। उनका यह निर्णय किसी राजनीतिक उदासीनता का परिणाम नहीं था, बल्कि उनकी उस गहरी आत्म-जागरूकता का प्रमाण था जो उन्हें राजनीति के ढुलमुल चरित्र से दूर रखती थी। उन्होंने स्वयं कई मंचों पर स्वीकार किया था कि उनका स्वभाव अत्यधिक स्पष्टवादी और अल्प-क्रोध वाला है। यदि वे किसी दल में शामिल होते और स्वयं उस दल के शीर्ष नेतृत्व या अध्यक्ष से कोई गलती होती, तो वे चुप नहीं बैठ पाते। वह जानते थे कि समकालीन राजनीति में ‘अनुशासन’ के नाम पर सत्य की बलि चढ़ाई जाती है, और वे अपनी आत्मा का सौदा करने के लिए तैयार नहीं थे।
नाना पाटेकर की राजनीतिक विचारधारा को ‘मुद्दा-आधारित संप्रभुता’ के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। उन्होंने कभी भी किसी राजनेता या सरकार को ‘पूर्ण रूप से अच्छा’ या ‘पूर्ण रूप से बुरा’ नहीं माना। जब केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने कुछ साहसिक और जनहितैषी कदम उठाए, तो नाना ने सार्वजनिक रूप से उनकी सराहना की। परंतु, इस सराहना को राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा उनका ‘भगवाकरण’ या ‘दक्षिणपंथी झुकाव’ मान लेना एक बड़ी भूल थी। नाना ने तुरंत स्पष्ट किया था कि किसी अच्छे कार्य की प्रशंसा करना एक जागरूक नागरिक का कर्तव्य है, न कि किसी पार्टी का कार्यकर्ता बनना।
ठीक इसी तरह, महाराष्ट्र की प्रादेशिक राजनीति में उनके संबंध राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कद्दावर नेता शरद पवार से लेकर भाजपा के देवेंद्र फडणवीस तक, सभी से बेहद आत्मीय और व्यक्तिगत रहे। वे शरद पवार की राजनीतिक सूझबूझ और चाणक्य नीति के प्रशंसक रहे, तो फडणवीस को अपना व्यक्तिगत मित्र भी मानते थे। लेकिन इन व्यक्तिगत संबंधों का प्रभाव कभी भी उनकी वैचारिक स्वतंत्रता पर नहीं पड़ा। उन्होंने हमेशा नेताओं के काम और उनकी नीतियों के आधार पर अपनी तात्कालिक राय बनाई, न कि उनके दल के नाम पर। आज के ध्रुवीकृत दौर में, जहाँ व्यक्ति को या तो इस पार होना पड़ता है या उस पार, नाना पाटेकर का यह दृष्टिकोण एक दुर्लभ संतुलन प्रस्तुत करता था।
यदि हम नाना पाटेकर के राजनीतिक दर्शन की वास्तविक आत्मा को खोजना चाहें, तो वह हमें वातानुकूलित स्टूडियो या राजनीतिक रैलियों में नहीं, बल्कि विदर्भ और मराठवाड़ा के उन सूखे खेतों में मिलती थी जहाँ भारत का अन्नदाता दम तोड़ रहा था। नाना पाटेकर की राजनीति किताबी सिद्धांतों से नहीं, बल्कि ज़मीनी हकीकत से उपजी थी। नाना पाटेकर खुद भी बड़े किसान थे और 27 एकड़ के फार्म हाउस में खेती करते थे। जब महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्याएं एक भयावह त्रासदी का रूप ले चुकी थीं और तत्कालीन सरकारें कागज़ी पैकेजों की घोषणाओं में व्यस्त थीं, तब नाना पाटेकर ने मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘नाम फाउंडेशन’ की शुरुआत की थी।
यह कदम केवल एक सामाजिक कार्य नहीं था, बल्कि यह देश की पूरी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता को एक खुली चुनौती थी। उन्होंने सीधे तौर पर राजनेताओं और नौकरशाही के निकम्मेपन को बेनकाब किया। किसानों के मुद्दों पर बोलते हुए उनकी भाषा हमेशा तीखी और आक्रामक रही। किसान आंदोलनों के संदर्भ में उनका यह बयान ऐतिहासिक महत्व रखता है कि “किसानों को अब सरकारों के सामने भीख मांगने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि उन्हें खुद यह तय करना चाहिए कि देश की सत्ता और कमान किसे सौंपनी है।” उनका यह विचार यह दर्शाता है कि वे जनता को केवल ‘वोट बैंक’ नहीं, बल्कि व्यवस्था का संप्रभु नियंता मानते थे। उनकी इस सोच ने देश के शोषित वर्ग को अपनी राजनीतिक ताकत पहचानने का हौसला दिया।
भारतीय राजनीति का सबसे अंधकारमय पहलू हमेशा से जाति और संप्रदाय के आधार पर होने वाला ध्रुवीकरण रहा है। नाना पाटेकर ने अपनी पूरी चेतना के साथ इस सामाजिक बुराई पर प्रहार किया। उन्होंने बार-बार युवाओं से अपील की कि वे राजनेताओं के उस जाल में न फंसें जो उन्हें जातियों में बांटकर अपनी रोटियां सेकते हैं। उन्होंने देश के युवाओं को ‘भीड़ का हिस्सा’ बनने के बजाय ‘सोचने वाले नागरिक’ बनने की प्रेरणा दी।नाना का मानना था कि जाति आधारित राजनीति देश के विकास की सबसे बड़ी बाधा है। जब नेता विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए जाति का कार्ड खेलते हैं, तो एक आम नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह मतदान के गुप्त हथियार से ऐसी ताकतों को परास्त करे। उन्होंने फिल्मों में भी (जैसे ‘क्रांतिवीर’ या ‘तिरंगा’) और वास्तविक जीवन में भी हमेशा एक अखंड, समतावादी भारतीय समाज की वकालत की। उनकी नज़र में राष्ट्र की प्रगति तभी संभव थी जब नागरिक अपनी संकीर्ण पहचानों से ऊपर उठकर देशहित को सर्वोपरि रखें।
नाना पाटेकर की राजनीतिक सोच केवल घरेलू सीमाओं तक सीमित नहीं थी। भारत-पाकिस्तान संबंधों और सीमा पार से होने वाले तनावों पर भी उनकी एक परिपक्व और मानवीय दृष्टि थी। जहाँ एक ओर वे भारतीय सेना के शौर्य और देश की संप्रभुता के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे—जिसके चलते उन्होंने कारगिल युद्ध के समय अग्रिम मोर्चे पर जाकर सैनिकों का हौसला भी बढ़ाया था और टेरिटोरियल आर्मी में उन्हें लेफ्टिनेंट कर्नल की मानद रैंक दी गई थी—वहीं दूसरी ओर वे कला, संस्कृति और राजनीति में बेवजह नफ़रत फैलाने के सख्त खिलाफ थे। उनका मानना था कि पड़ोसी देशों के साथ दुश्मनी की राजनीति अंततः दोनों तरफ के आम लोगों और गरीबों का ही नुकसान करती है। वे फिल्मों या बयानों के ज़रिए युद्धोन्माद भड़काने वाले तत्वों के आलोचक थे। उनका यह अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण सह-अस्तित्व, शांति और संवाद की भारतीय कूटनीतिक परंपरा के बिल्कुल अनुकूल था। वे राष्ट्रवाद को एक सकारात्मक ऊर्जा मानते थे, न कि दूसरों के प्रति अंध-नफ़रत का ज़रिया।
नाना पाटेकर की राजनीतिक विचारधारा का संक्षेप यही है कि वे ‘लोक’ के पक्ष में खड़े एक निर्भीक पथिक थे, जिन्हें ‘तंत्र’ (व्यवस्था) की कमियों को उजागर करने में कभी संकोच नहीं हुआ। उनकी राजनीति संसद की कुर्सियों या मंत्रियों के विशेषाधिकारों की मोहताज नहीं थी। उन्होंने एक कलाकार की सामाजिक जवाबदेही को उस ऊंचाई पर पहुंचाया जहाँ राजनीति स्वयं उनके सामने बौनी नज़र आने लगती है।आज जब वे हमारे बीच शारीरिक रूप से मौजूद नहीं हैं, तो पूरी राजनीतिक व्यवस्था चाटुकारिता, दलबदल, अवसरवादिता और वैचारिक शून्यता के जिस दौर से गुज़र रही है, उसमें नाना पाटेकर का जीवन और उनके विचार एक प्रकाश स्तंभ की तरह याद किए जाएंगे। उन्होंने एक बार मुस्कुराते हुए कहा था कि उन्होंने मरने के लिए सूखी लकड़ियां इकट्ठा कर रखी हैं ताकि धुएं से किसी दोस्त की आंख में पानी न आए और उन्हें गलतफहमी न हो कि कोई उनके लिए रो रहा है। लेकिन आज उनके जाने पर देश की आंखें वास्तव में नम हैं। वे हमें सिखा गए कि राजनीति में सक्रिय होने के लिए किसी दल का बिल्ला लगाना ज़रूरी नहीं है; सत्ता की आँखों में आँखें डालकर सच कहना ही सबसे बड़ी देशभक्ति है। भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए उनकी यह ‘गैर-पक्षपातपूर्ण’ और स्वतंत्र विचारधारा हमेशा मार्गदर्शक बनी रहेगी।





