अजय कुमार बियानी
भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं, जिन्हें किसी एक फिल्म, किसी एक किरदार या किसी एक दौर में सीमित नहीं किया जा सकता। वे पर्दे पर आते हैं तो केवल कहानी का हिस्सा नहीं रहते, बल्कि स्वयं कहानी की एक महत्वपूर्ण आवाज बन जाते हैं। नाना पाटेकर इसी श्रेणी के कलाकार हैं। उनकी कड़क आवाज, चेहरे के बदलते भाव, संवाद अदायगी की विशिष्ट शैली और अभिनय की तीव्रता ने उन्हें हिंदी सिनेमा में अलग पहचान दी।
‘परिंदा’ से ‘क्रांतिवीर’ तक, ‘अग्निसाक्षी’ से ‘तिरंगा’ तक, ‘अब तक छप्पन’ से ‘अपहरण’ तक और ‘वेलकम’ से ‘नटसम्राट’ तक उनका सफर बताता है कि एक अभिनेता के लिए किसी एक छवि में बंध जाना जरूरी नहीं। नाना पाटेकर ने खलनायक, पुलिस अधिकारी, विद्रोही, संवेदनशील व्यक्ति, हास्य पात्र और टूटते हुए कलाकार—हर रूप को अपनी अभिनय क्षमता से अलग पहचान दी।
उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी संवाद अदायगी रही। वे संवाद को केवल शब्दों के रूप में नहीं बोलते थे। उनके स्वर में पात्र का गुस्सा, पीड़ा, बेचैनी, आत्मविश्वास और कभी-कभी उसकी असहायता भी सुनाई देती थी। यही कारण है कि उनके कई संवाद फिल्म से बाहर निकलकर लोगों की स्मृति का हिस्सा बन गए।
‘परिंदा’ में उनका अभिनय दर्शकों को अपराध की दुनिया के अंधेरे से रूबरू कराता है। ‘क्रांतिवीर’ में उन्होंने व्यवस्था और सामाजिक अन्याय के खिलाफ आम आदमी के आक्रोश को आवाज दी। उनका किरदार केवल फिल्म का पात्र नहीं था, बल्कि उस समय के सामाजिक असंतोष का प्रतिनिधि बन गया। यही अभिनय की ताकत है—जब काल्पनिक पात्र वास्तविक जीवन की किसी सच्चाई को छू ले।
लेकिन नाना पाटेकर की कला केवल गंभीर और आक्रामक भूमिकाओं तक सीमित नहीं रही। ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी के रूप में उन्होंने अपनी गंभीर छवि को पूरी तरह अलग रंग दिया। चेहरे की कठोरता, संवादों का अंदाज और परिस्थितियों से पैदा होने वाला हास्य—इन सबने इस किरदार को लोकप्रिय बना दिया। दर्शकों ने यहां एक ऐसे नाना को देखा जो बिना अपनी मूल अभिनय पहचान खोए लोगों को खूब हंसा सकते थे।
‘अब तक छप्पन’ में पुलिस अधिकारी की भूमिका हो या ‘अपहरण’ में अपराध और राजनीति के बीच उलझा चरित्र, नाना पाटेकर ने पात्रों को बाहरी अंदाज से नहीं, उनकी मानसिकता से समझने की कोशिश की। उनके अभिनय में यह विशेषता दिखाई देती है कि वे पात्र को अपने ऊपर हावी होने देते हैं।
और फिर आया ‘नटसम्राट’—एक ऐसा किरदार जिसमें अभिनय, रंगमंच, उम्र, अकेलापन और रिश्तों की पीड़ा एक साथ दिखाई देती है। वृद्ध कलाकार के टूटते जीवन और आत्मसम्मान को जिस गहराई से उन्होंने पर्दे पर उतारा, वह उनके अभिनय की परिपक्वता का प्रमाण है। कई दृश्यों में शब्दों से अधिक उनकी चुप्पी बोलती है।
यही नाना पाटेकर की कला का सार है। वे केवल संवादों के अभिनेता नहीं हैं। वे मौन के भी अभिनेता हैं।
उनकी अभिनय यात्रा में संघर्ष भी रहा और उपलब्धियां भी। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से लेकर पद्मश्री तक उन्हें अनेक सम्मान मिले, लेकिन पुरस्कारों से परे उनकी वास्तविक उपलब्धि वह प्रभाव है जो उन्होंने दर्शकों के मन पर छोड़ा। किसी कलाकार के लिए इससे बड़ा सम्मान शायद ही कोई हो कि वर्षों बाद भी उसके निभाए पात्र याद किए जाएं।
नाना पाटेकर का व्यक्तित्व पर्दे से बाहर भी चर्चा में रहा है। सामाजिक सरोकारों से जुड़े उनके प्रयासों ने यह संकेत दिया कि कलाकार की जिम्मेदारी केवल कैमरे के सामने समाप्त नहीं होती। किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े सामाजिक कार्यों में उनकी भागीदारी ने उनकी सार्वजनिक पहचान को एक अलग आयाम दिया।
आज सिनेमा की दुनिया तेजी से बदल रही है। तकनीक, दृश्य प्रभाव और नए माध्यम अभिनय की प्रस्तुति को लगातार बदल रहे हैं। ऐसे समय में नाना पाटेकर जैसे कलाकारों का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि उनका अभिनय यह याद दिलाता है कि किसी भी तकनीक से अधिक प्रभावशाली वह मानवीय भाव है, जो अभिनेता अपनी आंखों, आवाज और चेहरे से दर्शक तक पहुंचाता है।
नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए उनका सफर एक महत्वपूर्ण सीख है। अभिनय केवल सुंदर चेहरा, लोकप्रियता या संवाद बोलने की क्षमता नहीं है। अभिनय का अर्थ है किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन, संघर्ष और भावनाओं को समझकर उसे विश्वसनीय रूप देना।
नाना पाटेकर ने पर्दे पर कभी व्यवस्था से सवाल किया, कभी अपराध की दुनिया का अंधेरा दिखाया, कभी पुलिस अधिकारी की कठोरता दिखाई, कभी रिश्तों की टूटन को आवाज दी और कभी हास्य के माध्यम से दर्शकों को गुदगुदाया। हर बार उनका अंदाज अलग रहा, लेकिन अभिनय की ईमानदारी कायम रही।
इसीलिए नाना पाटेकर को केवल अभिनेता कहना उनके योगदान को छोटा करना होगा। वे एक ऐसी अभिनय पाठशाला हैं, जहां संवाद केवल बोले नहीं जाते, महसूस किए जाते हैं; जहां चुप्पी भी कहानी कहती है और जहां किरदार फिल्म समाप्त होने के बाद भी दर्शक के भीतर कहीं जीवित रहता है।
सिनेमा की पीढ़ियां बदलती रहेंगी, कहानियां बदलती रहेंगी, लेकिन सच्चे अभिनय की पहचान कभी पुरानी नहीं होती। नाना पाटेकर इसी अमर अभिनय परंपरा के उन कलाकारों में हैं, जिनकी आवाज और अभिनय लंबे समय तक भारतीय सिनेमा की स्मृति में गूंजते रहेंगे।





