संजय एम तराणेकर
देश में चुनाव हो रहे हों और चर्चा पानी की बोतल पर न हो-ऐसा कैसे हो सकता है! आखिर लोकतंत्र को भी बीच-बीच में पानी चाहिए और चुनाव आयोग को भी।
अब सवाल उठ रहा है कि चुनाव आयोग के सामने रखी पानी की बोतल पाँच रूपये की हो या पाँच सौ की? इस पर देश की जनता इतनी गंभीर हो गई है, मानो अगला चुनाव बोतल के ढक्कन के रंग से तय होना हो!
भाई, चुनाव आयोग चुनाव कराता है, पानी की सप्लाई नहीं। अगर किसी शहर में नल सूखा पड़ा है, मोहल्ले में टैंकर का इंतजार हो रहा है और जनता बाल्टी लेकर लाइन में खड़ी है, तो उसका हिसाब-किताब उस विभाग से होना चाहिए जिसके जिम्मे पानी पहुँचाना है। चुनाव आयोग से यह पूछना कि आपने अपनी बैठक में कौन-सा पानी पिया, कुछ वैसा ही है जैसे डाकिए से पूछना-“भाई, हमारे इलाके में सड़क कब बनेगी?”
चुनाव आयोग चाहे तो मिट्टी के घड़े का पानी पीए, चाहे सरकारी बोतल का, चाहे बाजार से खरीदा मिनरल वाटर। हाँ, यह सवाल जरूर वाजिब लगता है कि भाई इतना महंगा पानी क्यों पी रहे हो। इतने में तो हम एक टैंकर पानी डलवा ले और पूरा परिवार चार दिन तक नहाता रहे। और तो और कपड़े भी धो ले!
यह अलग बात है कि लोकतंत्र की मशीनरी चलाने के लिए पानी भी चाहिए वह भी शुद्ध। आखिर अधिकारियों और कर्मचारियों को भी तो प्यास लगती है-यह कोई संवैधानिक अपराध तो नहीं! क्योंकि “प्यास हैं बड़ी…”
हाँ, जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि सरकारी पैसे से क्या खरीदा गया, कितने में खरीदा गया और नियमों के अनुसार खरीदा गया या नहीं। पारदर्शिता तो लोकतंत्र का पानी है-यह साफ रहना ही चाहिए।
बाकी बोतल देखकर तूफान खड़ा करना भी कमाल है!
कल को कोई पूछ बैठेगा-“चुनाव आयोग ने पानी ठंडा क्यों पिया?”
फिर जवाब आएगा-“भाई साहब, चुनाव अधिकारी गरम थे… पानी तो ठंडा रखना ही पड़ेगा!” क्योंकि ऊपर से विपक्षी पार्टियों के रोज़मर्रा उलाहने भी तो सुनना पड़ते हैं? और जनता सोचती रह जाएगी-देश में पानी की समस्या बड़ी है या पानी की बोतल की कीमत?
हमारा भैया भी बोलता है कि पीने दो नी यार कौन सा डायरेक्ट अपन के जेब से बोतल का पईसा जई रिया है। आखिर बड़ा लोग हैं, बड़ा लोग तो बड़ो काम ही करें। मैं तो ये कहूँ की जो खाली बोतल का कैरेट पड़ा रे, वो हमके दई दो उका मा पाणी भर लांगा और शान से सगळ्या के बोलाँगा कि देखों हूँ भी पाँच सौ वाला बोतल में पी सकूँ हूँ!





