डॉ. प्रियंका सौरभ
सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच संघर्ष पश्चिम एशिया की सबसे गंभीर सुरक्षा चुनौतियों में से एक है। यह संघर्ष यमन के लंबे समय से जारी गृहयुद्ध, राजनीतिक अस्थिरता, क्षेत्रीय शक्ति-संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हितों का परिणाम है। वर्ष 2014 में हूती विद्रोहियों द्वारा यमन की राजधानी सना पर कब्जा करने के बाद संघर्ष ने व्यापक रूप ले लिया। मार्च 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन के हस्तक्षेप ने इसे घरेलू राजनीतिक संकट से क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौती में बदल दिया। यद्यपि कूटनीतिक प्रयासों से तनाव कम करने की कोशिशें हुई हैं, फिर भी यह संघर्ष मानवीय सुरक्षा, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है।
इस संघर्ष का पहला प्रमुख कारण यमन में राजनीतिक अस्थिरता और कमजोर शासन व्यवस्था है। वर्ष 2011 के अरब स्प्रिंग के दौरान व्यापक विरोध प्रदर्शनों के कारण राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह को सत्ता छोड़नी पड़ी। उनके उत्तराधिकारी अब्दरब्बुह मंसूर हादी एक प्रभावी और समावेशी शासन स्थापित करने में सफल नहीं हो सके। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और कमजोर सरकारी संस्थाओं ने राजनीतिक व्यवस्था को कमजोर कर दिया। परिणामस्वरूप, विभिन्न सशस्त्र समूहों और राजनीतिक शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी, जिससे हूती आंदोलन के विस्तार के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनीं।
दूसरा प्रमुख कारण हूती आंदोलन की राजनीतिक और सामाजिक शिकायतें हैं। हूती आंदोलन, जिसे अंसार अल्लाह भी कहा जाता है, उत्तरी यमन के जैदी शिया समुदाय से उभरा। इसके समर्थकों ने राजनीतिक उपेक्षा, आर्थिक पिछड़ेपन और धार्मिक-सांस्कृतिक हाशिये पर रखे जाने के विरुद्ध आवाज उठाई। समय के साथ यह आंदोलन एक शक्तिशाली सशस्त्र संगठन बन गया। हालांकि इसकी जड़ें यमन की घरेलू परिस्थितियों में हैं, लेकिन इसके सैन्य विस्तार और प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक समूहों के साथ संघर्ष ने देश की अस्थिरता को और बढ़ाया।
वर्ष 2014 में हूतियों द्वारा राजधानी सना पर कब्जा करना संघर्ष का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इसके बाद उन्होंने देश के कई अन्य क्षेत्रों में भी अपना प्रभाव बढ़ाया। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार की स्थिति कमजोर हुई और राजनीतिक संक्रमण की प्रक्रिया बाधित हो गई। सऊदी अरब ने इस घटनाक्रम को अपनी दक्षिणी सीमा के निकट एक गंभीर सुरक्षा चुनौती के रूप में देखा। यमन के साथ लंबी साझा सीमा होने के कारण सऊदी अरब को आशंका थी कि हूतियों का विस्तार उसकी क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों को प्रभावित कर सकता है।
सऊदी अरब की सुरक्षा संबंधी चिंताएँ संघर्ष का एक अन्य महत्वपूर्ण कारण हैं। हूतियों द्वारा सऊदी क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों तथा सैन्य ठिकानों एवं महत्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाए जाने से दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ा। मार्च 2015 में सऊदी अरब ने हूतियों की बढ़ती शक्ति को रोकने और मान्यता प्राप्त यमनी सरकार को समर्थन देने के उद्देश्य से सैन्य हस्तक्षेप किया। हालांकि इस हस्तक्षेप का घोषित उद्देश्य यमन की सरकार को बहाल करना था, लेकिन लंबे समय तक चले सैन्य अभियान से संघर्ष का समाधान और जटिल हो गया।
इस संघर्ष का एक व्यापक भू-राजनीतिक कारण ईरान और सऊदी अरब के बीच क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा है। ईरान ने हूती आंदोलन को विभिन्न स्तरों पर राजनीतिक, तकनीकी और सैन्य समर्थन दिया है। सऊदी अरब इसे अपनी दक्षिणी सीमा के निकट ईरानी प्रभाव बढ़ने के रूप में देखता है। हालांकि हूती आंदोलन की अपनी घरेलू जड़ें और स्वतंत्र राजनीतिक प्राथमिकताएँ भी हैं, फिर भी ईरान-सऊदी प्रतिद्वंद्विता ने संघर्ष को व्यापक क्षेत्रीय आयाम प्रदान किया। इस प्रकार यमन आंतरिक राजनीतिक संघर्ष के साथ-साथ पश्चिम एशिया की शक्ति-प्रतिस्पर्धा का भी एक प्रमुख केंद्र बन गया।
संघर्ष के क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा पर गंभीर परिणाम हुए हैं। इसका सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव मानवीय संकट के रूप में दिखाई देता है। लंबे समय तक चले युद्ध ने बड़ी संख्या में लोगों को विस्थापित किया है तथा खाद्य असुरक्षा, कुपोषण और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी जैसी समस्याओं को गंभीर बनाया है। अस्पतालों, विद्यालयों, जलापूर्ति प्रणालियों और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं को नुकसान पहुँचा है। कमजोर शासन व्यवस्था और आर्थिक संकट ने आम नागरिकों के जीवन को और कठिन बना दिया है। ऐसी परिस्थितियाँ उग्रवादी संगठनों के विस्तार और अवैध गतिविधियों के लिए भी अवसर पैदा कर सकती हैं।
दूसरा प्रमुख प्रभाव समुद्री सुरक्षा पर पड़ा है। यमन की भौगोलिक स्थिति बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के निकट होने के कारण अत्यंत रणनीतिक है। यह जलडमरूमध्य लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और स्वेज नहर के माध्यम से एशिया तथा यूरोप के बीच व्यापार के लिए महत्वपूर्ण मार्ग प्रदान करता है। हूतियों द्वारा वाणिज्यिक जहाजों और समुद्री यातायात को निशाना बनाए जाने से अंतरराष्ट्रीय नौवहन की सुरक्षा प्रभावित हुई है। विशेष रूप से 2023 के अंत से लाल सागर में बढ़ते हमलों ने कई शिपिंग कंपनियों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने के लिए प्रेरित किया। अफ्रीका के दक्षिणी सिरे से जहाजों के गुजरने के कारण यात्रा का समय, ईंधन खर्च और परिवहन लागत बढ़ गई।
तीसरा प्रभाव ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ा है। पश्चिम एशिया वैश्विक तेल आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है और यहाँ की सुरक्षा संबंधी घटनाएँ अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों को प्रभावित कर सकती हैं। वर्ष 2019 में सऊदी अरब के अबकैक और खुरैस तेल प्रतिष्ठानों पर हुए हमलों ने महत्वपूर्ण ऊर्जा बुनियादी ढाँचे की कमजोरियों को उजागर किया। इन हमलों को केवल सऊदी-हूती संघर्ष का प्रत्यक्ष परिणाम मानना उचित नहीं होगा, लेकिन उन्होंने क्षेत्रीय अस्थिरता से जुड़े व्यापक जोखिमों को स्पष्ट किया। ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमलों की आशंका से तेल की कीमतों में अनिश्चितता, बीमा लागत में वृद्धि और वैश्विक आपूर्ति में व्यवधान का खतरा बढ़ जाता है।
चौथा प्रभाव क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर पड़ा है। संघर्ष ने ईरान और सऊदी अरब के बीच अविश्वास को गहरा किया तथा पश्चिम एशिया में बाहरी शक्तियों की भूमिका को बढ़ाया। मिसाइलों, ड्रोन और अन्य आधुनिक हथियारों के बढ़ते इस्तेमाल से सैन्य प्रतिस्पर्धा तेज हुई है। इससे क्षेत्रीय देशों को अपनी रक्षा प्रणालियों, खुफिया क्षमताओं और समुद्री सुरक्षा पर अधिक संसाधन खर्च करने पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त, संघर्ष का विस्तार व्यापक क्षेत्रीय तनाव को जन्म दे सकता है, जिससे आतंकवाद-रोधी सहयोग और अन्य कूटनीतिक प्रयास भी प्रभावित होते हैं।
वैश्विक व्यापार पर इसका प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। लाल सागर और स्वेज नहर का मार्ग अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं के लिए अत्यंत आवश्यक है। इस क्षेत्र में असुरक्षा से माल की ढुलाई महँगी हो सकती है, वस्तुओं की आपूर्ति में देरी हो सकती है और आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए खाद्य पदार्थों, ईंधन और औद्योगिक वस्तुओं की बढ़ती परिवहन लागत आर्थिक चुनौतियों को और गंभीर बना सकती है।
इस संघर्ष का स्थायी समाधान सैन्य कार्रवाई के बजाय समावेशी राजनीतिक प्रक्रिया और क्षेत्रीय कूटनीति में निहित है। संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से हूती आंदोलन, मान्यता प्राप्त यमनी सरकार और अन्य संबंधित पक्षों के बीच सार्थक वार्ता को आगे बढ़ाना आवश्यक है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सत्ता-साझेदारी, सुरक्षा व्यवस्था और राष्ट्रीय संसाधनों के न्यायसंगत वितरण से जुड़े मुद्दों का समाधान किया जाना चाहिए। साथ ही, सऊदी अरब और ईरान के बीच संवाद तथा विश्वास-निर्माण के उपायों को मजबूत करना जरूरी है। वर्ष 2023 में दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने की दिशा में हुई प्रगति का उपयोग यमन में शांति स्थापित करने के लिए किया जा सकता है।
इसके अतिरिक्त, प्रभावी युद्धविराम, मानवीय सहायता की निर्बाध आपूर्ति और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को समुद्री मार्गों की सुरक्षा तथा नौवहन की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप सहयोग करना चाहिए। यमन में दीर्घकालीन शांति के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना, अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण करना और जवाबदेह शासन संस्थाओं को मजबूत बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
निष्कर्षतः, सऊदी-हूती संघर्ष दर्शाता है कि घरेलू राजनीतिक अस्थिरता, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता और बाहरी हस्तक्षेप किस प्रकार एक स्थानीय संकट को व्यापक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती में बदल सकते हैं। इसके परिणाम यमन की सीमाओं से बाहर निकलकर मानवीय कल्याण, समुद्री व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और पश्चिम एशिया की स्थिरता को प्रभावित करते हैं। स्थायी शांति के लिए समावेशी राजनीतिक समाधान, सऊदी-ईरान संवाद, अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान और यमन के पुनर्निर्माण हेतु निरंतर सहयोग आवश्यक है। एक शांतिपूर्ण, स्थिर और संप्रभु यमन न केवल वहाँ के नागरिकों के हित में है, बल्कि संपूर्ण क्षेत्र और विश्व की सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य है।





