संजय सक्सेना
भारतीय राजनीति में लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शनों का एक गरिमामय इतिहास रहा है। संविधान ने नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांगों को रखने और विरोध दर्ज कराने का मौलिक अधिकार दिया है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में देश की राजनीति में एक खतरनाक प्रवृत्ति देखने को मिली है, जहाँ लोकतांत्रिक आंदोलन की आड़ में उपद्रवी और अराजक तत्व हिंसा फैलाते हैं और राजनीतिक दल अपने संकीर्ण स्वार्थों के लिए उन दंगाइयों-उपद्रवियों को कभी मासूम जनता, मासूम छात्र और युवा या अन्नदाता बताकर देश में अराजकता फैलाने और लोगों को भड़काने की साजिश में जुट जाते हैं। हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों और उपद्रव के दौरान भी यही पटकथा दोहराई गई। उपद्रवियों और हिंसा फैलाने वालों को छात्रों का चोला पहनाकर पूरे देश के युवाओं की संवेदनाओं से खेलने का प्रयास किया जा रहा है। यह पहला अवसर नहीं है; इससे पूर्व किसान आंदोलन, नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) विरोधी प्रदर्शन, और एसआईआर आंदोलन के दौरान भी विपक्ष ने अराजकता फैलाने वालों को ढाल बनाकर अपने राजनीतिक मंसूबों को साधने का प्रयास किया था। इसकी जड़ में जाया जाये तो पता चलता है कि जब-जब देश में बड़े कानून बने या प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण की दिशा में कदम उठाए गए, तब-तब एक खास राजनीतिक तंत्र ने उन सुधारों का रचनात्मक विरोध करने के बजाय सड़कों पर हिंसा और व्यवधान उत्पन्न करने वाली शक्तियों को संरक्षण दिया। सीएए विरोधी आंदोलन, नागरिकता देने वाले कानून को नागरिकता छीनने वाला भ्रम बनाकर देश के विभिन्न हिस्सों में सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। हिंसा में लिप्त असामाजिक तत्वों के पक्ष में राजनीतिक बयानबाजी की गई।
इसी तरह से किसानों के नाम पर दिल्ली की सीमाओं को महीनों तक घेरा गया, जिससे आम नागरिकों और देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ। 26 जनवरी को लाल किले पर हुई ऐतिहासिक हिंसा और राष्ट्रीय ध्वज के अपमान के दोषियों का बचाव करने में भी राजनीतिक दलों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। जंतर-मंतर पर हालिया प्रदर्शनों के दौरान जब स्थिति बिगड़ी और उपद्रवियों द्वारा सुरक्षा बलों एवं आम जनजीवन को निशाना बनाया गया, तब पुनः वही घिसा-पिटा वृत्तांत गढ़ा गया कि सरकार निर्दोष छात्रों पर अत्याचार कर रही है।उधर, न्यायपालिका ने बार-बार स्पष्ट किया है कि विरोध प्रदर्शन का अधिकार कानून हाथ में लेने या हिंसा फैलाने का लाइसेंस नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई मील के पत्थर साबित होने वाले फैसलों में यह सिद्धांत तय किया है। आंदोलन या विरोध के नाम पर सार्वजनिक या निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले, कानून-व्यवस्था को भंग करने वाले और सार्वजनिक हिंसा में शामिल पूर्व के अपराधियों एवं उपद्रवियों के खिलाफ दर्ज मुकदमों को राजनीतिक दबाव में वापस नहीं लिया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख स्पष्ट करता है कि कानून की नजर में उपद्रवी केवल उपद्रवी होता है, चाहे वह खुद को छात्र कहे या आंदोलनकारी।
बहरहाल, अदालत के इस स्पष्ट और सख्त रुख के बावजूद, आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज और अन्य नेताओं ने अदालती प्रक्रिया और फैसलों पर राजनीतिक बयानबाजी की। न्यायपालिका द्वारा आपराधिक मामलों को वापस न लेने के फैसले के खिलाफ जिस प्रकार की तीखी भाषा का प्रयोग किया गया, उसने न्यायिक मर्यादाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। अदालत को एक तरह से राजनीतिक चुनौती देना या सार्वजनिक रूप से दबाने का प्रयास करना न्याय तंत्र की निष्पक्षता पर सीधा हमला है। विपक्ष के वृत्तांत की सबसे बड़ी कमजोरी उसका दोहरा रवैया और चयनात्मक संवेदनशीलता है।बात पैलेट गन के इस्तेमाल की भी जरूरत है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी संसद से लेकर सड़कों तक पेलेट गन की एक घटना को लेकर पूरे देश में हाहाकार मचाए हुए हैं और संसद की कार्यवाही नहीं चलने दे रहे हैं। निस्संदेह किसी भी नागरिक या छात्र का घायल होना दुखद है और उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लेकिन इस एक घटना को राजनीतिक ढाल बनाकर संसद की कार्यवाही को ठप करना, देश के करोड़ों रुपये और विधायी समय को बर्बाद करना कहाँ तक न्यायसंगत है? दूसरी तरफ, प्रतियोगी परीक्षाओं के तनाव, कोचिंग संस्थानों की लापरवाही और प्रशासनिक कमियों के चलते जब हाल ही में लगभग 21 छात्र-छात्राओं की अकाल मृत्यु (आत्महत्या और दुर्घटनाओं) हुई, तो उस गंभीर त्रासदी पर विपक्ष की ओर से वैसी संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई।
पैलेट गन की घटना पर विपक्ष ने संसद की कार्यवाही बाधित की, प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं और आक्रामक बयान दिए, जबकि 21 छात्रों की मृत्यु पर सीमित या नाममात्र की बयानबाजी देखने को मिली। पेलेट गन की घटना में नेता पीड़ित के घर पहुँचे या मीडिया में उनके साथ दिखाई दिए, लेकिन 21 मृतक छात्र-छात्राओं के मामले में किसी प्रमुख विपक्षी नेता का परिवारों से मिलने पहुँचना भी आवश्यक नहीं समझा गया। जहाँ एक घटना में सरकार विरोधी माहौल बनाने का प्रयास हुआ, वहीं दूसरी घटना में राजनीतिक लाभ न दिखने के कारण उपेक्षा दिखाई दी। चाहे कांग्रेस हो, समाजवादी पार्टी हो या आम आदमी पार्टी, किसी भी बड़े नेता ने उन 21 मृतक छात्र-छात्राओं के पीड़ित परिवारों से व्यक्तिगत रूप से मिलकर उनका दर्द बाँटना जरूरी नहीं समझा। यह विरोधाभास साफ दर्शाता है कि विपक्ष की संवेदनाएँ छात्रों के भविष्य या उनके जीवन से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती हैं कि किस घटना से सरकार पर राजनीतिक हमला बोला जा सकता है।
सब जानते हैं कि युवा किसी भी देश की रीढ़ होते हैं। उनकी ऊर्जा, उनका आक्रोश और उनकी आकांक्षाएँ देश के निर्माण में काम आनी चाहिए। लेकिन जब राजनीतिक दल अपने स्वार्थों के लिए युवाओं के हाथों में किताबों के बजाय अराजकता का झंडा थमाने की कोशिश करते हैं, तो इसका नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ता है। जब आपराधिक छवि के लोग या हिंसा फैलाने वाले उपद्रवी छात्रों के भेष में शामिल होते हैं, तो वास्तविक और जायज मांगों के लिए लड़ रहे सच्चे छात्रों की आवाज भी दब जाती है। हर मुद्दे पर संसद को ठप करना देश के लोकतांत्रिक ढाँचे को कमजोर करता है। उपद्रवियों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने की मांग करना भविष्य के अपराधियों को यह संदेश देता है कि वे हिंसा करके भी राजनीतिक संरक्षण पा सकते हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार सर्वोपरि है, लेकिन हिंसा और अराजकता की आड़ में देश की व्यवस्था को बंधक बनाना कतई स्वीकार्य नहीं हो सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि हिंसा के दोषियों को सजा मिलनी ही चाहिए।
विपक्ष को यह समझना होगा कि हर विरोध प्रदर्शन को राजनीतिक हथियार बनाकर देश के युवाओं को भड़काने की नीति दीर्घकालिक रूप से देशहित और स्वयं उनके राजनीतिक भविष्य के लिए घातक है। पेलेट गन की घटना पर आक्रामक होकर संसद रोकना और दूसरी तरफ दर्जनों मृत छात्रों के परिवारों की उपेक्षा करना विपक्ष की संवेदनहीनता और दोहरे चरित्र को उजागर करता है। देश का युवा आज जागरूक है; वह समझता है कि कौन उसके भविष्य की बात कर रहा है और कौन उसे केवल राजनीतिक मोहरा बना रहा है। विपक्ष को लगता है कि वह अगले साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में इसका फायदा उठा लेगा तो यह इतना सहज नहीं है क्योंकि जनता सब जानती है।





