सी एम जैन
जब किसी आंदोलनकारी पर लाठी बरसती है, जब किसी नागरिक को सड़क पर घसीटा जाता है, जब किसी की आवाज़ को दबाने की कोशिश की जाती है, तब दृश्य बहुत स्पष्ट दिखाई देता है। एक तरफ वर्दी होती है, दूसरी तरफ नागरिक। एक तरफ शक्ति दिखाई देती है, दूसरी तरफ पीड़ा। इसलिए अधिकांश लोग वहीं रुक जाते हैं जहाँ उनकी आँखें उन्हें रुकने के लिए कहती हैं। वे लाठी देखते हैं, चेहरा देखते हैं, गुस्सा देखते हैं, अन्याय देखते हैं। लेकिन वे उस प्रश्न तक नहीं पहुँचते जहाँ से लोकतंत्र की असली लड़ाई शुरू होती है। वे शायद ही कभी यह जानने का प्रयास करते हैं कि उनके साथ दुर्व्यवहार करने वाला अधिकारी या कर्मचारी अपने सार्वजनिक दायित्वों का पालन कितनी ईमानदारी से कर रहा है। उसने अब तक कितनी रिश्वत वसूली, कितनी अवैध संपत्ति जमा की।
आख़िर ऐसा क्यों है कि जिस व्यक्ति ने अपमान सहा, वह अपमान को तो याद रखता है, लेकिन अपमान करने वाले की जवाबदेही तलाशने नहीं निकलता? क्यों वह घटना को याद रखता है, लेकिन उस व्यवस्था की नस पकड़ने की कोशिश नहीं करता जिसने उस घटना को संभव बनाया? क्यों वह अपने घावों की गिनती करता है, लेकिन उस अधिकारी या कर्मचारी के सार्वजनिक रिकॉर्ड ओर फाइलों की नहीं, जिसने उसके अधिकारों को चुनौती दी?
शायद इसलिए कि हमें बचपन से यह सिखाया गया है कि सत्ता बहुत शक्तिशाली होती है और नागरिक बहुत कमजोर। हमें यह बताया जाता है कि सामने खड़ा अधिकारी, कर्मचारी या पुलिसकर्मी केवल आदेश का पालन कर रहा था। यह बात कई परिस्थितियों में सही भी हो सकती है। लेकिन लोकतंत्र का प्रश्न यहाँ समाप्त नहीं होता। लोकतंत्र का प्रश्न यह है कि जो व्यक्ति कानून, अधिकार और शक्ति का प्रयोग कर रहा है, क्या वह स्वयं भी उतनी ही ईमानदारी से सार्वजनिक जांच के लिए तैयार है जितनी ईमानदारी की अपेक्षा वह नागरिकों से करता है?
यहीं आम आदमी सबसे बड़ी भूल करता है। वह प्रतिरोध को केवल नारों तक सीमित समझ लेता है। उसे लगता है कि विरोध का अर्थ सड़क है, भीड़ है, भाषण है, गिरफ्तारी है, संघर्ष है। जबकि इतिहास गवाह है कि कई बार व्यवस्था को सबसे अधिक असुविधा भीड़ ने नहीं, दस्तावेज़ों ने दी है। कई बार नारे नहीं, रिकॉर्ड बोले हैं। कई बार भाषण नहीं, फाइलों ने सत्ता को जवाब देने पर मजबूर किया है।
सबसे बड़ा भ्रम यह है कि आम आदमी स्वयं को असहाय समझता है। जबकि उसके हाथ में ऐसे औजार मौजूद हैं जिनका उपयोग वह शायद ही कभी करता है। सूचना का अधिकार केवल एक कानून नहीं है; यह लोकतंत्र द्वारा नागरिक को दिया गया वह चाबी है जिससे वह बंद दरवाजों पर दस्तक दे सकता है। दुर्भाग्य यह है कि अधिकांश लोग उस चाबी को जेब में रखकर पूरी जिंदगी यह शिकायत करते रहते हैं कि दरवाजे बंद हैं।
किसी भी अधिकारी या कर्मचारी की प्रथम नियुक्ति से लेकर अब तक कि उसकी सेवा की फाइल को प्रशासनिक भाषा में “सर्विस बुक” कहते हैं। जिसमें उसके जन्म प्रमाण पत्र से लेकर उसकी शिक्षा, तथा परिवार के सदस्यों और नौकरी मिलते समय उसकी आर्थिक स्थिति के अतिरिक्त कई महत्वपूर्ण दस्तावेज होते हैं। इसके अलावा किसी भी सरकारी अधिकारी को प्रतिवर्ष अपने एवं अपने परिवार के सभी सदस्यों के नाम पर किए गए निवेश आदि की सूचना भी अलग से देनी पड़ती है और इस दस्तावेज को IPR, यानी Immovable Property Return कहते हैं। इसके अलावा एक वार्षिक ACR नाम का दस्तावेज भी होता है जिसमें उसके व्यवहार, आचरण, परफॉर्मेंस आदि की जानकारी होती है। बाकी आगे के सुराख भी यह जानकारी प्राप्त करने के बाद इसी जानकारी से मिल जाते हैं।
अब ज़रा ठहरकर सोचिए। जिस नागरिक ने लाठी खाई, क्या उसने कभी यह जानने की कोशिश की कि उसके सामने खड़ा व्यक्ति अपने पूरे सार्वजनिक जीवन में कितना जवाबदेह रहा है? उसने अपने पद का दुरुपयोग करके कितनी अवैध कमाई ओर संपति जमा की? जिस अधिकारी ने कानून की भाषा में बात की, क्या उसके अपने रिकॉर्ड भी उतने ही साफ़ हैं जितने वह नागरिकों से अपेक्षा करता है? जिस व्यक्ति ने अधिकार का प्रयोग किया, क्या उसके अपने आचरण की भी कभी जांच हुई? क्या उसकी घोषित जानकारी और वास्तविक स्थिति में कोई अंतर है? क्या उसके खिलाफ शिकायतें हुईं? क्या उसके निर्णयों पर कभी प्रश्न उठे? क्या उसके सार्वजनिक जीवन का पूरा लेखा-जोखा उतना ही पारदर्शी है जितनी पारदर्शिता वह दूसरों से चाहता है? क्या उसने कभी किसी से रिश्वत नही ली? क्या वह पूरी तरह ईमानदार है?
यहीं से शक्ति का समीकरण बदलना शुरू होता है। क्योंकि व्यवस्था को सबसे अधिक डर उस नागरिक से नहीं लगता जो एक दिन गुस्सा होकर नारा लगाता है। व्यवस्था को सबसे अधिक डर उस नागरिक से लगता है जो दस साल पुरानी फाइल निकाल लेता है। जो रिकॉर्ड पढ़ता है। जो दस्तावेज़ जोड़ता है। जो प्रश्न पूछता है। जो उत्तरों की तुलना करता है। जो भावनाओं से नहीं, तथ्यों से काम लेता है। क्योंकि भावनाएँ थक जाती हैं, लेकिन दस्तावेज़ों की स्मृति लंबी होती है।
यही कारण है कि लोकतंत्र केवल मतदान से नहीं चलता। लोकतंत्र स्मृति से चलता है। और दस्तावेज़ लोकतंत्र की स्मृति होते हैं। जो समाज अपनी स्मृति खो देता है, वह बार-बार एक ही कहानी दोहराता है। वह हर बार नए चेहरे से प्रभावित होता है, हर बार नए नारे से उत्साहित होता है, हर बार नए संघर्ष में कूद पड़ता है, लेकिन कभी यह नहीं देखता कि जिन लोगों ने शक्ति का उपयोग किया, उनका रिकॉर्ड क्या कहता है।
इसलिए यदि अन्याय हो, तो केवल घटना को याद मत रखिए। घटना से आगे बढ़िए। प्रश्न पूछिए। रिकॉर्ड देखिए। दस्तावेज़ पढ़िए। जानकारी जुटाइए। ओर फिर उस जानकारी के आधार पर संबंधित विभागों, जांच एजेंसियों से शिकायत कीजिए। क्योंकि लोकतंत्र में जवाबदेही का अर्थ किसी को दोषी घोषित करना नहीं है; जवाबदेही का अर्थ है कि कोई भी सार्वजनिक शक्ति, अधिकारी, कर्मचारी जांच से ऊपर नहीं है।
आख़िरकार, लाठी का प्रभाव कुछ मिनटों, कुछ घंटों या कुछ दिनों तक रहता है। लेकिन रिकॉर्ड ओर फाइलों का पीछा वर्षों तक किया जा सकता है। घाव भर जाते हैं, वीडियो पुराने पड़ जाते हैं, नारे बदल जाते हैं, सरकारें बदल जाती हैं, लेकिन दस्तावेज़ बचे रहते हैं। दस्तावेजों में वह तिलिस्म होता है जो किसी भी भ्रष्ट को उसकी ओकत याद दिलादे ओर उसे सलाखों के पीछे पहुंचा दे। बस सही तरीक़े से हासिल करना आना चाहिए।
और शायद लोकतंत्र का सबसे अनकहा सत्य भी यही है— जिस दिन आम आदमी को यह समझ आ जाएगा कि उसके हाथ में केवल विरोध करने का अधिकार नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने की शक्ति भी है, उस दिन शक्ति का संतुलन बदलना शुरू हो जाएगा।
क्योंकि नागरिक तब तक कमजोर रहता है जब तक वह स्वयं को केवल पीड़ित समझता है। जिस दिन वह रिकॉर्ड ओर फाइलें पढ़ना सीख जाता है, उसी दिन वह लोकतंत्र का वास्तविक भागीदार बन जाता है।





