वैश्विक न्याय के लिए जरूरी है सुरक्षा परिषद का पुनर्गठन

Reconstitution of the Security Council is necessary for global justice

महेन्द्र तिवारी

दुनिया में शांति, सुरक्षा और सहयोग स्थापित करने के उद्देश्य से बने संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ उसकी प्रासंगिकता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध की विभीषिका के बाद 1945 में स्थापित इस अंतरराष्ट्रीय संस्था से अपेक्षा की गई थी कि वह भविष्य में युद्धों को रोकने, देशों के बीच विवादों का समाधान करने और मानवता को विनाश से बचाने में प्रभावी भूमिका निभाएगी। लेकिन आठ दशक बाद भी विश्व अनेक युद्धों, क्षेत्रीय संघर्षों और राजनीतिक टकरावों से जूझ रहा है। ऐसी परिस्थितियों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना में सुधार की मांग तेज होना स्वाभाविक है। भारत ने इसी संदर्भ में सभी स्थायी सदस्यों को समान वीटो अधिकार देने की मांग उठाकर वैश्विक व्यवस्था में व्याप्त असमानता पर एक बार फिर ध्यान आकर्षित किया है।

26 अक्टूबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में सुरक्षा परिषद में वीटो के प्रश्न पर आयोजित चर्चा के दौरान भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वतनेनी ने कहा कि जब तक वीटो का अधिकार अस्तित्व में है, तब तक सुधार के बाद गठित सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी सदस्यों को समान अधिकार मिलने चाहिए। भारत का स्पष्ट मत है कि नए स्थायी सदस्यों को वीटो से वंचित रखकर परिषद का विस्तार करना वास्तविक सुधार नहीं होगा। इससे स्थायी सदस्यों की दो श्रेणियाँ बन जाएँगी और मौजूदा शक्तिशाली देशों का प्रभुत्व पहले की तरह बना रहेगा। भारत ने ऐसी व्यवस्था को असमानता को स्थायी रूप देने वाला कदम बताया है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने की प्रमुख जिम्मेदारी निभाती है। वर्तमान में इसके 15 सदस्य हैं। इनमें चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका पाँच स्थायी सदस्य हैं, जिन्हें वीटो का विशेषाधिकार प्राप्त है। शेष 10 अस्थायी सदस्य दो वर्ष के लिए चुने जाते हैं। सुरक्षा परिषद के महत्वपूर्ण गैर-प्रक्रियात्मक प्रस्तावों को पारित होने के लिए कम से कम नौ सदस्यों का समर्थन और किसी स्थायी सदस्य का नकारात्मक मत न होना आवश्यक है। इस व्यवस्था के कारण पाँच स्थायी सदस्यों में से कोई एक देश भी किसी प्रस्ताव को रोक सकता है। यही विशेषाधिकार वीटो कहलाता है।

सैद्धांतिक रूप से वीटो का उद्देश्य बड़ी शक्तियों को संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था में बनाए रखना और उनके बीच सीधे टकराव की आशंका कम करना था। लेकिन व्यवहार में कई बार यह अधिकार अंतरराष्ट्रीय सहमति के रास्ते में बाधा बन जाता है। जब किसी युद्ध, मानवीय संकट या अंतरराष्ट्रीय विवाद पर सुरक्षा परिषद के सदस्य सहमत नहीं हो पाते, तब वीटो के कारण आवश्यक कार्रवाई रुक सकती है। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि क्या विश्व शांति की जिम्मेदारी निभाने वाली संस्था को कुछ देशों के राजनीतिक हितों के अधीन रहना चाहिए?

भारत के प्रतिनिधि ने अपने वक्तव्य में बताया कि संयुक्त राष्ट्र की स्थापना से अब तक वीटो का इस्तेमाल 331 बार किया जा चुका है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पाँच स्थायी सदस्यों में से दो ने साढ़े तीन दशक से अधिक समय से वीटो का इस्तेमाल नहीं किया है, जबकि अधिकांश वीटो या वीटो की धमकियाँ तीन देशों की ओर से आई हैं। भारत का कहना है कि वीटो को संकीर्ण राजनीतिक हितों का साधन नहीं, बल्कि एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके इस्तेमाल में संयम और जवाबदेही आवश्यक है।

भारत की मांग का संबंध केवल वीटो अधिकारों तक सीमित नहीं है। वह सुरक्षा परिषद की सदस्यता, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, परिषद के आकार, कामकाज की पद्धति और निर्णय लेने की प्रक्रिया में व्यापक सुधार चाहता है। भारत का तर्क है कि वर्तमान संरचना आज की वैश्विक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करती। 1945 में दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियाँ अलग थीं। तब से अनेक देश स्वतंत्र हुए हैं, विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का महत्त्व बढ़ा है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा सुरक्षा के नए समीकरण बने हैं। इसके बावजूद सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का मूल ढाँचा लगभग वैसा ही बना हुआ है।

भारत दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देशों में से एक है और वैश्विक अर्थव्यवस्था, शांति अभियानों तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। वह लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग करता रहा है। भारत के साथ ब्राजील, जर्मनी और जापान भी जी-4 समूह के माध्यम से सुधार का समर्थन करते हैं। अफ्रीकी देशों ने भी संयुक्त राष्ट्र की निर्णय प्रक्रिया में अपने महाद्वीप को अधिक प्रतिनिधित्व देने की मांग उठाई है। इन देशों का मानना है कि यदि सुरक्षा परिषद को विश्व की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप बनाना है, तो उसमें विभिन्न क्षेत्रों और विकासशील देशों की आवाज को उचित स्थान देना होगा।

हालाँकि, भारत की समान वीटो अधिकारों की मांग के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं। कुछ देश सुरक्षा परिषद की सदस्यता बढ़ाने के पक्ष में हैं, लेकिन नए स्थायी सदस्यों को वीटो देने के विरोधी हैं। उनका तर्क है कि वीटो का विस्तार निर्णय प्रक्रिया को और जटिल बना सकता है। यदि स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ेगी और प्रत्येक को प्रस्ताव रोकने का अधिकार मिलेगा, तो परिषद के लिए किसी मुद्दे पर सहमति बनाना कठिन हो सकता है। यह चिंता पूरी तरह निराधार नहीं है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में व्यापक प्रतिनिधित्व के साथ निर्णय लेने की क्षमता बनाए रखना भी आवश्यक है।

दूसरी ओर, नए स्थायी सदस्यों को वीटो से वंचित रखना भी समानता के सिद्धांत के विपरीत दिखाई देता है। यदि किसी देश को स्थायी सदस्य कहा जाए, लेकिन उसे पुराने स्थायी सदस्यों के बराबर अधिकार न मिलें, तो ऐसी सदस्यता की वास्तविक उपयोगिता सीमित रह जाएगी। भारत का कहना है कि स्थायी सदस्यता की दो श्रेणियाँ बनाना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि मौजूदा असमानता को नए रूप में बनाए रखना होगा। इसलिए वीटो, सदस्यता के स्वरूप और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर एक साथ विचार किया जाना चाहिए।

सुधार की राह में सबसे बड़ी संस्थागत बाधा संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन की प्रक्रिया है। चार्टर के अनुच्छेद 108 के अनुसार, संशोधन के लिए महासभा में दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन और सदस्य देशों की संवैधानिक प्रक्रियाओं के अनुसार अनुमोदन आवश्यक है। इसमें सुरक्षा परिषद के सभी मौजूदा स्थायी सदस्यों की पुष्टि भी शामिल है। इसका अर्थ है कि जिन देशों के विशेषाधिकारों में बदलाव की बात हो रही है, उनकी सहमति के बिना सुधार लागू करना कठिन है। यही कारण है कि दशकों से चर्चा के बावजूद सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता में व्यापक बदलाव नहीं हो सका है।

भारत ने इस स्थिति से आगे बढ़ने के लिए समयबद्ध और ठोस वार्ता की आवश्यकता पर जोर दिया है। उसका मानना है कि केवल चर्चाएँ करते रहने से परिणाम नहीं निकलेंगे। सदस्य देशों को लिखित प्रस्तावों, स्पष्ट समयसीमा और निश्चित लक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए। साथ ही वीटो के उपयोग में संयम, निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने पर भी विचार होना चाहिए।

अंततः, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का प्रश्न केवल भारत की स्थायी सदस्यता या वीटो अधिकार प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। यह उस वैश्विक व्यवस्था के भविष्य से जुड़ा है, जिसमें युद्ध और शांति जैसे गंभीर निर्णय लिए जाते हैं। यदि संयुक्त राष्ट्र को विश्व समुदाय का वास्तविक प्रतिनिधि बनना है, तो उसे बदलती परिस्थितियों के अनुरूप अपनी संरचना में सुधार करना होगा। भारत की मांग इस बहस को एक स्पष्ट दिशा देती है कि समान जिम्मेदारियों के साथ समान अधिकार भी होने चाहिए। हालांकि वीटो के विस्तार से निर्णय प्रक्रिया पर पड़ने वाले प्रभावों पर गंभीर विचार आवश्यक है, लेकिन मौजूदा असमानता को अनिश्चितकाल तक बनाए रखना भी उचित नहीं होगा। विश्व समुदाय के सामने चुनौती यही है कि वह शक्ति और समानता, प्रतिनिधित्व और प्रभावशीलता के बीच ऐसा संतुलन बनाए, जिससे संयुक्त राष्ट्र अधिक विश्वसनीय, न्यायपूर्ण और सक्षम संस्था बन सके।