शोध विद्यार्थियों के लिए आपातकाल का सन्दर्भ ग्रन्थ

A Reference Book on the Emergency for Research Scholars

प्रो.राज कुमार भाटिया

1975 में भारत में लागू किए गए आपातकाल के 50 वर्ष पूर्ण होने पर वरिष्ठ व अनुभवी पत्रकार श्री अजय सेतिया द्वारा लिखित और सुप्रसिद्ध प्रभात प्रकाशन की ओर से प्रकाशित 240 पृष्ठों की पुस्तक “आपातकाल: आन्दोलन और विश्वासघात की अंतर्कथा “ भरपूर सामग्री और तथ्यों से लैस है। लेखक, जो आपातकाल के पूर्व एक युवा राजनीतिक कार्यकर्ता थे और जिन्हें आपातकाल में बंदी भी बनना पड़ा, ने आपातकाल संबंधी साहित्य के अध्ययन एवं अपनी प्रत्यक्ष जानकारियों के आधार पर एक समृद्ध पुस्तक बनाई है। वैसे तो आपातकाल संबंधी अनेक पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं, फिर भी संभवतः इस पुस्तक में जिज्ञासुओं को नया कुछ जानने का अवसर मिलेगा। आपातकाल से जिनका गहरा नाता रहा और जो स्वयं आपातकाल के संबंध में शोध आधारित नई पुस्तकें लिख रहे हैं, ऐसे वरिष्ठ पत्रकार श्री रामबहादुर राय ने पुस्तक के प्राक्कथन में लिखा है— “इमरजेंसी पर पुस्तकें तो कोई कमी नहीं हैं। फिर भी यह पुस्तक इसलिए बहुत उपयोगी है, क्योंकि ज्यादातर पुस्तकें ऐसी हैं, जो इमरजेंसी के संदर्भ पर ध्यान नहीं देतीं। अजय सेतिया की यह पुस्तक पाठकों को उस दौर में चित्रवत पहुँचाती है।”

पुस्तक की प्रासंगिकता के बारे में लेखक ने दो वजहें बताई हैं। वे लिखते हैं—”दूसरी वजह पहली वाली वजह से भी ज्यादा गंभीर है। आपातकाल की पचासवीं सालगिरह पर मार्क्सवादी कम्युनिस्टों और समाजवादियों ने आपातकाल के दौरान घटी घटनाओं को इतना विकृत करने का प्रयास किया कि सच्चाई का दस्तावेज सामने लाना जरूरी हो गया है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने आपातकाल का विरोध जरूर किया था, लेकिन आपातकाल के खिलाफ सत्याग्रह या भूमिगत आंदोलन में उसकी कोई भूमिका नहीं थी, जबकि समाजवादियों की आंदोलन और लोक संघर्ष समिति में सक्रिय भागीदारी थी। लेकिन ज्यादातर समाजवादी शुरू के दिनों में ही गिरफ्तार हो गए थे। उनका समाज में ढांचा इतना कमजोर था कि सत्याग्रह में उनकी भूमिका नगण्य थी, जिसके आँकड़े भी इस पुस्तक में दिए गए हैं। भूमिगत आंदोलन और सत्याग्रह मोटे तौर पर जनसंघ, विद्यार्थी परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर ही निर्भर था। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, केरल और जम्मू-कश्मीर के लोकतंत्र सेनानियों और जिन राज्यों में उन्हें पेंशन मिलती है, उनकी सूची देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि आपातकाल के खिलाफ आंदोलन किसने संचालित किया था |”

पुस्तक में लेखक ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि आपातकाल के दौरान विभिन्न संगठनों की वास्तविक भूमिका क्या थी तथा किन संगठनों ने लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए सबसे अधिक सक्रियता से कार्य किया। उन्होंने अनेक दस्तावेजों, संस्मरणों, सरकारी अभिलेखों तथा समकालीन समाचारों के आधार पर अपने निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं। आपातकाल से पूर्व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय पदाधिकारी होने के नाते , आपातकाल में पूरे समय जेलबंदी के नाते व आपातकाल के तुरंत पश्चात् के घटनाक्रम का भी स्वयं साक्षी था। इसलिए मैं यह अनुभव करता रहा हूँ कि ऐसी पुस्तकों की महती आवश्यकता थी, जो आपातकाल के विरुद्ध किए गए संघर्ष में ‘संघ परिवार’ की भूमिका को सुसंगत रूप से प्रस्तुत करे। जिसकी अब तक लिखी गई पुस्तों में कमी महसूस हो रही थी | अजय सेतिया की पुस्तक से वह कमी कुछ सीमा तक दूर हुई है।

वैसे तो लेखक ने आपातकाल से पूर्व और आपातकाल के बाद के दृश्यों को समेटते हुए 19 माह के आपातकाल का सजीव चित्रण व विश्लेषण प्रस्तुत किया है, पर जैसा कि ‘दूसरी वजह’ में उनकी मंशा थी। 36 अध्यायों की पुस्तक में उन्होंने 8 अध्याय ‘संघ परिवार’ के संदर्भ में लिखे हैं। दो अध्यायों में उन्होंने ‘मदरलैंड’ अखबार के संपादक के. आर. मलकानी , उनकी गिरफ्तारी तथा अखबार के 26 जून के अंक के बारे में लिखा है, तो दो अध्यायों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कीभूमिगत आंदोलन और सत्याग्रह में भूमिका को उजागर किया है। दो अध्यायों में उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की भूमिका के बारे में लिखा है। परिषद के आंदोलन, उसके भूमिगत कार्य तथा लोकतंत्र की रक्षा के लिए किए गए संघर्ष का तथ्यात्मक विवरण प्रस्तुत किया गया है।

संघ परिवार से जुड़े उनके दो अध्याय अति विशेष हैं | एक है बाला साहब मधुकर दतात्रेय की चिठ्ठियों पर बवंडर और दूसरा -संघ जनसंघ और जयप्रकाश नारायण | बाला साहब देवरस आपातकाल के समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक थे , जिन्हें बंदी बना लिया गया था | उन्होंने कारागार में रहते हुए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखे थे, जो अब इतिहास की धरोहर हैं और जिन पर कम्युनिस्टों और समाजवादियों के द्वारा निर्मित बवंडर का लेखक ने 18 पृष्ठों में प्रतिवाद किया है | जयप्रकाश नारायण ने आपातकाल से पूर्व 15-16 माह तक बिहार आन्दोलन, जिसे जयप्रकाश आन्दोलन भी कहा गया था, का नेतृत्व किया था | उनकी पुरानी पृष्ठभूमि संघ परिवार के अनुकूल नहीं थी | पर आन्दोलन के कारण वे संघ परिवार ( संघ, जनसंघ और विद्यार्थी परिषद ) के साथ खड़े हो गए थे |जयप्रकाश जी के संघ और जनसंघ के निकट आने की कहानी लेखक ने एक अध्याय में वर्णित की है |

पुस्तक के अंतिम अध्यायों में आपातकाल की समाप्ति की ओर जाने वाले घटनाक्रम का वर्णन आया है। उसी में एक अध्याय है-‘चरण सिंह का निर्णायक विश्वासघात’, जिसमें आपातकाल विरोधी सफल आंदोलन की उपलब्धियों पर पानी फेर दिए जाने की कहानी है।

आपातकाल भारत में आपातकाल लगाना जितनी बड़ी त्रासदी थी, उतनी ही पीड़ादायक कहानी थी उसके विरुद्ध हुए संघर्ष और आंदोलन की सफलता को मटियामेट करने वाली स्वार्थ और महत्त्वाकांक्षा से युक्त राजनीति, जिसे लेखक ने ‘निर्णायक विश्वासघात’ कहा है |

कुल मिलाकर यह पुस्तक आपातकाल के इतिहास, उसके राजनीतिक परिप्रेक्ष्य तथा लोकतंत्र की रक्षा के लिए हुए संघर्ष को समझने के इच्छुक पाठकों के लिए एक उपयोगी और संदर्भग्रंथ के रूप में सामने आती है। विशेष रूप से नई पीढ़ी के लिए यह पुस्तक उस दौर की घटनाओं को समझने तथा उनसे सीख लेने का एक महत्वपूर्ण माध्यम सिद्ध हो सकती है। पुस्तक की कीमत 500 रूपए मात्र है,जो रियायती कीमत पर इमेजोन , फ्लिप्कार्ट और प्रभात प्रकाशन पर उपलब्ध है | ( समीक्षक आपातकाल के समय खुद जेल बंदी थे )