साहित्य के अमर शिल्पकार मुंशी प्रेमचंद और उनकी कालजयी विरासत

Munshi Premchand, the immortal craftsman of literature, and his timeless legacy

दिलीप कुमार पाठक

आज इकतीस जुलाई को हिंदी और उर्दू साहित्य के सबसे बड़े लेखक मुंशी प्रेमचंद की जयंती है। जब हम प्रेमचंद का नाम सुनते हैं तो हमारे दिमाग में एक ऐसे सीधे-साधे इंसान की तस्वीर उभरती है जिसने हमेशा आम जनता की बात की। उन्होंने राजा-रानियों और परियों की काल्पनिक कहानियों को छोड़कर समाज के सबसे गरीब और बेबस लोगों को अपनी लेखनी का हीरो बनाया। प्रेमचंद केवल कहानियां लिखने वाले लेखक नहीं थे बल्कि वे अपने समय से बहुत आगे की सोचने वाले एक सच्चे युग दृष्टा थे। उन्होंने समाज को देखने और समझने का एक नया नजरिया दिया। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने करीब सौ साल पहले जिन सामाजिक बुराइयों और इंसानी स्वभाव को पहचाना था वे सारी बातें आज भी हमारे समाज में सच साबित हो रही हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए एक ऐसी साहित्यिक विरासत हमारे बीच छोड़ी है जो हमेशा हमारा रास्ता रोशन करती रहेगी।

प्रेमचंद के पूरे साहित्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी सादगी और जमीन से जुड़ी सच्चाई थी। उन्होंने भारत के गांवों, वहां के किसानों और मेहनत करने वाले मजदूरों के दुख-दर्द को बहुत करीब से देखा और महसूस किया था। उनका साहित्य केवल समाज की कमियां नहीं गिनाता बल्कि हमें अंदर से झकझोर कर सोचने पर मजबूर कर देता है। उन्होंने गोदान, गबन और रंगभूमि जैसे महान उपन्यासों के जरिए उस समय के जमींदारों और सूदखोरों पर सीधा हमला किया जो गरीब जनता का खून चूस रहे थे। प्रेमचंद ने पैसों की भूख, जातिवाद, छुआछूत और महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ अपनी कलम को सबसे बड़ा हथियार बनाया। उनकी दूरदर्शिता इसी बात से समझ आती है कि वे बहुत पहले जान गए थे कि जब तक हमारे देश का किसान खुशहाल नहीं होगा तब तक देश की तरक्की की बातें बिल्कुल अधूरी हैं। उनकी छोटी-छोटी कहानियों का असर इतना गहरा है कि वे सीधे पाठक के दिल में उतर जाती हैं। पूस की रात, कफन और ठाकुर का कुआं जैसी कहानियां मनोरंजन के लिए नहीं लिखी गई थीं बल्कि वे समाज का आईना थीं। कफन कहानी में भूख और तंगहाली के कारण संवेदनहीन हो चुके बाप-बेटे के जरिए उन्होंने दिखाया कि भयंकर गरीबी कैसे इंसान के भीतर की दया और ममता को मार देती है। वहीं ठाकुर का कुआं कहानी में उन्होंने जाति के नाम पर होने वाले उस भेदभाव को दिखाया जो आज भी हमारे समाज में किसी न किसी रूप में दिखाई दे जाता है। प्रेमचंद ने इंसानी दिमाग और उसकी भावनाओं को इतनी गहराई से समझा था कि उनके बनाए किरदार वक्त के साथ पुराने नहीं हुए बल्कि आज भी हमारे आसपास जीते-जागते नजर आते हैं। अगर हम उनके साहित्यिक प्रभाव की बात करें तो प्रेमचंद ने अपने बाद आने वाले लेखकों की कई पीढ़ियों की सोच को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने साहित्य की भाषा को बड़े-बड़े विद्वानों के कमरों से निकालकर आम लोगों की बोलचाल की भाषा बनाया। उन्होंने हिंदी और उर्दू के शब्दों को मिलाकर एक बेहद सरल हिंदुस्तानी भाषा तैयार की जिसे पढ़ना और समझना हर किसी के लिए आसान था। प्रेमचंद का मानना था कि लेखक का काम सिर्फ सुंदर शब्द लिखना नहीं है बल्कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना भी है। उन्होंने साहित्य को समाज में बदलाव लाने का एक जरिया बना दिया जिससे प्रेरणा लेकर बाद के अनगिनत लेखकों ने सच लिखने का रास्ता चुना। प्रेमचंद ने अपना पूरा जीवन बहुत तंगी और अभावों में गुजारा लेकिन उन्होंने कभी अपने स्वाभिमान और सच का साथ नहीं छोड़ा। उन्होंने महलों की सुख-सुविधाओं के आगे झुकने के बजाय विपरीत परिस्थितियों में रहकर सच लिखना ज्यादा ठीक समझा। उनकी यही दूरदर्शिता और आम जनता से जुड़ाव उन्हें साहित्य जगत का असली साहित्य सम्राट बनाता है। उनकी छोड़ी हुई विरासत हमें सिखाती है कि सच्चा साहित्य वही है जो हर दौर में सच का साथ दे और इंसानी भावनाओं को जिंदा रखे। उनका यह प्रभाव आने वाले कई युगों तक ऐसे ही बना रहेगा।