दिलीप कुमार पाठक
मान लीजिए, एक सात-आठ साल का बच्चा अपनी कॉपी लेकर बैठा है। आप उसे बी लिखने को कहते हैं, वह डी लिख देता है। आप उसे छह लिखने को बोलते हैं, वह नौ बना देता है। आप दो बार डांटते हैं, तीसरी बार हाथ उठा देते हैं। आपको लगता है कि वह जानबूझकर कर रहा है, उसका मन सिर्फ फोन चलाने या खेलने में है। लेकिन हो सकता है उस बच्चे को आपकी बात समझ ही न आ रही हो? उसे कॉपी के पन्ने पर लिखे शब्द सीधे दिखने के बजाय तैरते हुए या उल्टे दिखाई दे रहे हों? बस इसी उलझन का नाम डिस्लेक्सिया है।
इसे समझने के लिए कोई डॉक्टर बनने की ज़रूरत नहीं है। सीधे शब्दों में कहें तो हमारा और आपका दिमाग अक्षरों को देखकर तुरंत पहचान लेता है। लेकिन कुछ बच्चों का दिमाग इन अक्षरों को थोड़ा अलग तरीके से देखता है। यह कोई बीमारी नहीं है कि डॉक्टर के पास गए, सिरप पिलाया और बच्चा ठीक हो गया। यह दिमाग की अपनी एक बनावट है जो जन्म से ही ऐसी होती है। बच्चा न तो पागल है, न मंदबुद्धि है और न ही कामचोर। उसका दिमाग बस एक अलग सॉफ्टवेयर पर चल रहा है, जिसे हम ज़बरदस्ती अपने पुराने ढर्रे पर चलाने की कोशिश कर रहे हैं।
आंकड़े बताते हैं कि यह समस्या हमारे अनुमान से कहीं ज़्यादा बड़ी है। द डिस्लेक्सिया एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक, भारत में करीब 10 से 15 फीसदी बच्चे डिस्लेक्सिया से प्रभावित हैं। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि हर स्कूल की क्लास में औसतन दो से तीन बच्चे इस उलझन से जूझ रहे हैं, लेकिन सही जानकारी न होने के कारण उन्हें सिर्फ कमज़ोर छात्र मान लिया जाता है। अगर आप माता-पिता या शिक्षक हैं, तो इसके लक्षणों को पहचानना बहुत ज़रूरी है। इसके मुख्य लक्षण कुछ इस तरह दिखते हैं। पहला यह कि बच्चा लिखते समय बी और डी या पी और क्यु में हमेशा कन्फ़्यूज रहता है। दूसरा, वह शब्दों को उल्टा पढ़ता है जैसे सॉ को वॉज़ पढ़ लेना या शब्दों को आगे-पीछे कर देना। तीसरा, वह अपनी उम्र के बाकी बच्चों की तुलना में बहुत अटक-अटक कर और धीरे पढ़ता है। इसके अलावा ऐसे बच्चे बचपन में देर से बोलना शुरू करते हैं या मिलते-जुलते तुकबंदी वाले शब्दों को समझने में उन्हें परेशानी होती है। कई बार एक साथ दो-तीन काम कह दिए जाएं, तो बच्चा कन्फ़्यूज हो जाता है कि पहले क्या करना है।
अब चूंकि यह दिमाग की कुदरती बनावट है, इसलिए इससे बचाव का कोई मेडिकल तरीका या टीका नहीं आता। लेकिन हां, इसके बुरे असर से बच्चे को ज़रूर बचाया जा सकता है, जिसे एक्सपर्ट्स अर्ली इंटरवेंशन यानी सही समय पर संभालना कहते हैं। इसका सबसे बड़ा बचाव यह है कि बच्चे की दिक्कत को बचपन में ही पहचान लिया जाए। जब आप उसे डांटने के बजाय थेरेपी, ऑडियो-विजुअल टूल्स जैसे वीडियो या एनिमेशन और छूकर सीखने वाले अक्षरों यानी थ्री-डी खिलौनों से पढ़ाते हैं, तो उसका दिमाग शब्दों को डिकोड करना सीख जाता है।
दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन, एप्पल कंपनी बनाने वाले स्टीव जॉब्स और एक्टर ऋतिक रोशन – इन सबमें एक बात कॉमन थी। इन सबको बचपन में पढ़ने-लिखने में भारी दिक्कत आती थी। लेकिन जब इन्हें सही समय पर समझा गया, तो इन्होंने वो कर दिखाया जो आम लोग सोच भी नहीं सकते। इनका दिमाग आउट ऑफ द बॉक्स सोचता है क्योंकि ये शब्दों में नहीं, बल्कि तस्वीरों में सोचते हैं।
दिक्कत बच्चे में नहीं, हमारे रवैये में है। हम चाहते हैं कि हर बच्चा पहली क्लास से ही टॉपर बन जाए। अगर कोई बच्चा दाएं-बाएं में कन्फ़्यूज हो रहा है, जूते के फीते नहीं बांध पा रहा, या शब्दों को उल्टा लिख रहा है, तो उस पर चिल्लाने के बजाय उसके साथ बैठिए। उसे थोड़ा ज़्यादा वक्त दीजिए। अक्षरों को रेत पर उंगली से बनाकर सिखाइए। उसे डांट से ज़्यादा इस बात के भरोसे की ज़रूरत है कि कोई बात नहीं, तू अपनी रफ़्तार से सीख। हर बच्चा रेस का घोड़ा नहीं होता कि चाबुक मारा और वह दौड़ पड़ा। कुछ बच्चे ऐसे भी होते हैं जिन्हें दौड़ने से ज़्यादा उड़ना पसंद होता है। उन्हें बस अपनी उड़ान भरने के लिए थोड़ा सा खुला आसमान और अपनों का साथ चाहिए होता है।





