जानकी गोदारा
किसी बच्चे के स्वस्थ विकास की शुरुआत स्कूल की कक्षा से बहुत पहले हो जाती है। जीवन के शुरुआती छह वर्ष बच्चे के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। यही वह उम्र है जब पोषण, स्वास्थ्य देखभाल, टीकाकरण और सीखने का माहौल बच्चे के भविष्य की नींव तैयार करता है।
ग्रामीण भारत में इस जिम्मेदारी को लंबे समय से आंगनबाड़ी केंद्र निभाते आए हैं। यह केवल छोटे बच्चों को बैठाने और खाना देने की जगह नहीं है, बल्कि उनके साथ साथ गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माताओं तक पोषण, स्वास्थ्य और प्रारंभिक शिक्षा पहुंचाने की सबसे महत्वपूर्ण जमीनी व्यवस्थाओं में से एक है। लेकिन सवाल यह है कि जिस उद्देश्य के लिए आंगनबाड़ी व्यवस्था शुरू की गई थी, क्या वह आज अपने लक्ष्य तक पहुँचता नज़र आ रह है?
बीकानेर जिला के लूणकरणसर ब्लॉक से करीब 13 किमी दूर खियेरा गांव तो सरकारी आंकड़ों से कुछ अलग कहानी बताता है। इस गांव में संचालित आंगनबाड़ी केंद्र के भवन की स्थिति संतोषजनक नहीं है। जिसमें बिजली और शौचालय तक की सुविधा नहीं है। गर्मी के दिनों में जब तापमान बच्चों के लिए मुश्किलें पैदा करता है, तब अभिभावक भी उन्हें वहां भेजने से हिचकते हैं।
ग्रामीणों के अनुसार इस केंद्र पर पोलियो की दवा पिलाने और बच्चों के नियमित टीकाकरण की व्यवस्था भी नहीं हो पाती। हालांकि ग्रामीण यह भी बताते हैं कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सुनीता और कंचन अपनी जिम्मेदारी पूरी मेहनत से निभाती हैं। वे बच्चों को घर से केंद्र तक लाती हैं और केंद्र बंद होने के बाद उन्हें वापस घर भी पहुंचाती हैं। उन्हें पौष्टिक भोजन भी देती हैं। यानी समस्या उस व्यवस्था की है जिसमें उन्हें काम करना पड़ता है।
हालांकि सरकार अब पुराने केंद्रों को ‘सक्षम आंगनबाड़ी’ बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। मार्च 2026 तक देश में 1,03,940 आंगनबाड़ी केंद्रों को सक्षम आंगनबाड़ी के रूप में विकसित किया जा चुका था। इनमें बेहतर भवन, सुरक्षित पेयजल, एलईडी स्क्रीन, इंटरनेट की सुविधा जहां संभव हो, सीखने की सामग्री, पोषण वाटिका, साफ भंडारण और बच्चों के अनुकूल वातावरण जैसी सुविधाओं पर जोर है।
केंद्र सरकार ने कुल दो लाख आंगनबाड़ी केंद्रों को चरणबद्ध तरीके से मजबूत करने का लक्ष्य रखा है। 2026-27 के केंद्रीय बजट में भी मिशन सक्षम आंगनबाड़ी एवं पोषण 2.0 के लिए 23,100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस राशि का इस्तेमाल पोषण सहायता, प्रारंभिक बाल देखभाल एवं शिक्षा और आंगनबाड़ी के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने जैसी गतिविधियों में होना है।
राजस्थान के 2026-27 के बजट में भी आंगनबाड़ी को लेकर कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं। राज्य में 7,500 आंगनबाड़ियों को ‘नंद घर’ के रूप में विकसित करने के लिए 225 करोड़ रुपये, करीब 3,800 केंद्रों की मरम्मत और सुदृढ़ीकरण के लिए 80 करोड़ रुपये से अधिक तथा विद्यालयों के साथ संचालित 22,746 आंगनबाड़ी केंद्रों में खेल सामग्री और ‘जादुई पिटारा’ उपलब्ध कराने के लिए करीब 323 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा बिजली से वंचित सरकारी भवनों में चल रहे 17,095 आंगनबाड़ी केंद्रों को बिजली कनेक्शन देने की घोषणा की गई है।
इन घोषणाओं का महत्व खियेरा जैसे गांवों को देखकर समझा जा सकता है। यदि किसी आंगनबाड़ी में बिजली नहीं है, शौचालय नहीं है और बच्चों के बैठने तथा सीखने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है तो वहां पोषण और प्रारंभिक शिक्षा की गुणवत्ता की उम्मीद करना मुश्किल है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि भवन, बिजली, पानी, शौचालय और बच्चों के अनुकूल वातावरण को बुनियादी अधिकार की तरह लिया जाए। स्वास्थ्य विभाग और आंगनबाड़ी के बीच समन्वय इतना मजबूत हो कि टीकाकरण, स्वास्थ्य जांच और पोषण संबंधी सेवाएं कागज पर नहीं, बल्कि नियमित रूप से केंद्र तक पहुंचें।
आंगनबाड़ी की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने केंद्र खुले हैं या कितने बच्चों को भोजन मिला। असली सवाल यह होना चाहिए कि कितने बच्चे स्वस्थ हुए, कितने बच्चों का कुपोषण कम हुआ, कितने बच्चों ने स्कूल के लिए बेहतर तैयारी की और कितने गांवों में माताओं को अपने बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य के बारे में सही जानकारी मिली।
भारत में आंगनबाड़ी व्यवस्था की शुरुआत 2 अक्टूबर 1975 को एकीकृत बाल विकास सेवा यानी आईसीडीएस के रूप में हुई थी। इसका उद्देश्य छह वर्ष तक के बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य में सुधार करना, बच्चों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास की नींव रखना, कुपोषण और बाल मृत्यु को कम करना तथा माताओं को पोषण और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देना था।
केंद्रीय स्तर पर इसकी नीति और योजना महिला एवं बाल विकास मंत्रालय देखता है, जबकि रोजमर्रा के स्तर पर इसका क्रियान्वयन राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। इस व्यवस्था में पूरक पोषण, प्री-स्कूल शिक्षा, पोषण एवं स्वास्थ्य शिक्षा, टीकाकरण, स्वास्थ्य जांच और जरूरत पड़ने पर रेफरल जैसी सेवाएं शामिल हैं।
आज देश में आंगनबाड़ी का नेटवर्क कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जुलाई 2026 तक करीब 13.99 लाख से अधिक आंगनबाड़ी केंद्र और लगभग 13.30 लाख आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कार्यरत थे। इन केंद्रों से लगभग 8.94 करोड़ लाभार्थी जुड़े थे, जिनमें छह वर्ष तक के बच्चों की संख्या 7.2 करोड़ से अधिक थी।
राजस्थान में भी यह नेटवर्क काफी व्यापक है। राज्य में 363 बाल विकास परियोजनाएं संचालित है, जिनमें 300 ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। राज्य में 63,206 आंगनबाड़ी केंद्र स्वीकृत हैं, जिनमें 63,064 केंद्र कार्यरत बताए गए हैं। इन केंद्रों में 61,706 आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और 55,441 सहायिकाएं काम कर रही हैं।
दिसंबर 2025 तक 27.64 लाख बच्चों, 2.89 लाख गर्भवती महिलाओं और 2.84 लाख स्तनपान कराने वाली महिलाओं को पूरक पोषण दिया गया था, जबकि 3 से 6 वर्ष के 11.73 लाख बच्चों को प्री-स्कूल शिक्षा दी जा रही थी। इससे राजस्थान में बच्चों की पोषण स्थिति में कुछ सुधार दिखाई देता है। लेकिन यह आंकड़े बताते हैं कि चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है।





