अजय कुमार बियानी
रावण के दस सिर जलाएं, पानी की हर बूंद बचाएं!
“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।”
श्रीमद्भगवद्गीता का यह संदेश बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इंदौर में दशहरा केवल रावण दहन नहीं, बल्कि परंपरा, पारिवारिक मेल-मिलाप और सांस्कृतिक उत्सव का अवसर है। कभी परिवार के साथ रामलीला देखना, मेले में घूमना और रावण दहन का इंतजार करना बच्चों के लिए खास अनुभव होता था। आज आयोजन भव्य हुए हैं और मोबाइल में तस्वीरें सहेजने का चलन बढ़ा है, लेकिन पर्व का मूल संदेश वही है—बुराइयों का अंत और अच्छे आचरण की शुरुआत।
इंदौर स्वच्छता के लिए देशभर में पहचान बना चुका है। अब समय है कि शहर स्वच्छता के साथ जल संरक्षण में भी मिसाल बने। पानी की कमी की चिंता केवल गर्मियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। भूजल का गिरता स्तर और पानी की बढ़ती मांग हमें चेतावनी देते हैं कि हर बूंद की कीमत समझनी होगी। दशहरे के उत्सव में इस बार एक संदेश भी गूंजना चाहिए—रावण के दस सिर जलाएं, लेकिन पानी की एक बूंद भी व्यर्थ न बहाएं।
इसी विचार के बीच मिस्टर दशानन मिल गए। दस सिरों वाले रावण के चेहरे पर उदासी थी। मैंने पूछा, “इंदौर में हर साल आपका पुतला जलता है, फिर आप दुखी क्यों हैं?”
दशानन बोले, “पुतला मेरा जलता है, बुराइयां नहीं। लोग मैदान में बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाते हैं, लेकिन लौटते ही अपनी गलतियों पर पर्दा डालने और दूसरों की कमियां गिनाने लगते हैं। अपने लिए छूट चाहिए, दूसरों से नियमों के पालन की अपेक्षा रखते हैं।”
उनकी बात में दम था। सड़क पर कचरा न फेंकना, यातायात नियमों का पालन करना और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना नागरिक जिम्मेदारी है। इसी तरह पानी बचाना भी केवल सरकार या नगर निगम का काम नहीं, हर नागरिक का कर्तव्य है। घर में खुला नल बंद करना, टपकते नल की मरम्मत कराना, वाहन और फर्श धोने में जरूरत से ज्यादा पानी न बहाना तथा वर्षाजल संचयन अपनाना छोटी पहल जरूर हैं, लेकिन इनका सामूहिक प्रभाव बड़ा हो सकता है।
मैंने पूछा, “क्या आज का रावण पहले से ज्यादा ताकतवर है?”
दशानन बोले, “अब मुझे पुतलों में मत खोजिए। मैं वहां हूं, जहां पद सेवा के बजाय रौब दिखाने का साधन बन जाए, नियम अपनी सुविधा से बदल लिए जाएं और समाजहित की बातें केवल भाषणों तक सीमित रहें। पानी की कमी पर चिंता जताई जाए, लेकिन नल बहते रहें और वर्षाजल बचाने की पहल टलती रहे—तो समझिए, लापरवाही का रावण अभी जीवित है।”
इंदौर की पुरानी रामलीलाओं में मनोरंजन के साथ मर्यादा, त्याग और कर्तव्य की सीख भी मिलती थी। आज की पीढ़ी तकनीक के साथ आगे बढ़ रही है। वह सवाल करती है और तर्क चाहती है। यह अच्छी बात है, लेकिन उत्सव केवल तस्वीरों और वीडियो तक सीमित न रहे। परंपरा का अर्थ तभी है, जब उसका संदेश जीवन में उतरे।
दशानन ने कहा, “बच्चों को ईमानदारी और जिम्मेदारी सिखाइए। उन्हें यह भी बताइए कि पानी प्रकृति का अनमोल उपहार है, असीमित संसाधन नहीं। आज बचाई गई बूंद कल किसी की जरूरत पूरी कर सकती है।”
संस्कृत का प्रसिद्ध सुभाषित है—“धर्मो रक्षति रक्षितः।” अर्थात धर्म की रक्षा करने वाले की धर्म रक्षा करता है। इसी भावना से प्रकृति और उसके संसाधनों की रक्षा करना भी हमारा दायित्व है।
इस दशहरे पर इंदौर के मैदानों में रावण के पुतले जलेंगे, आतिशबाजी होगी और शहर उत्सव मनाएगा। लेकिन पर्व की सार्थकता तब बढ़ेगी, जब हम अहंकार और स्वार्थ के साथ पानी की बर्बादी को भी अपनी बुराइयों में गिनेंगे।
इंदौर की असली जीत केवल स्वच्छ शहर कहलाने में नहीं, बल्कि जल-संरक्षण के प्रति जागरूक नागरिक बनने में भी है। रावण का पुतला जलाने में कुछ मिनट लगते हैं, लेकिन बुरी आदतें छोड़ने के लिए संकल्प चाहिए। इस दशहरे पर संकल्प लें—नल व्यर्थ नहीं बहने देंगे, वर्षाजल सहेजेंगे और पानी की हर बूंद का सम्मान करेंगे। रावण दहन के साथ जल संरक्षण का संदेश भी घर-घर पहुंचे—यही पर्व की सच्ची सार्थकता है।





