गांधी जयंती और स्वच्छता अभियान: आधुनिक युग में प्रासंगिकता

Gandhi Jayanti and the Cleanliness Drive: Relevance in the Modern Era

सुनील कुमार महला

प्रतिवर्ष 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के रूप में मनाया जाता है। वास्तव में यह दिवस केवल और केवल एक महान नेता के जन्म का ही स्मरण मात्र नहीं है, बल्कि यह उन विचारों को पुनः जीवित करने का अवसर है, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम और सामाजिक चेतना को एक नई दिशा दी। गांधी जी का स्वच्छता के बारे में यह कथन था कि-‘

स्वच्छता ईश्वरभक्ति के बाद दूसरा स्थान रखती है।’ कहना ग़लत नहीं होगा कि गांधी जी स्वच्छता को केवल शारीरिक या बाहरी आवरण तक सीमित नहीं मानते थे, बल्कि इसे आत्म-शुद्धि, नैतिक बल और ईश्वर भक्ति से जोड़कर देखते थे। सच तो यह है कि स्वच्छता केवल आदत नहीं, राष्ट्र की प्रगति का आधार है और स्वच्छ वातावरण स्वस्थ नागरिक और सशक्त समाज का निर्माण करता है। जहाँ स्वच्छता होती है, वहाँ स्वास्थ्य, पर्यटन और विकास को गति मिलती है।हर नागरिक का छोटा-सा स्वच्छता प्रयास देश की बड़ी तस्वीर बदल सकता है। स्वच्छ सोच, स्वच्छ व्यवहार और स्वच्छ परिवेश से ही विकसित राष्ट्र का निर्माण संभव है।

स्वच्छ भारत अभियान एक जन-आंदोलन:-

पाठक जानते होंगे कि स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत 2 अक्टूबर 2014 को महात्मा गांधी की जयंती पर की गई थी और इस अभियान का उद्देश्य देश को खुले में शौच से मुक्त बनाना और स्वच्छता के प्रति जनजागरूकता बढ़ाना है। इसके तहत घर-घर शौचालय निर्माण और ठोस-तरल कचरा प्रबंधन पर जोर दिया गया। वास्तव में यह स्वच्छ भारत अभियान ही था, जिसके तहत भारतीय गांवों और शहरों में स्वच्छता के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया गया।यह काबिले-तारीफ है कि आज ओडीएफ(खुले में शौच से मुक्ति) के बाद अब ओडीएफ प्लस के माध्यम से गांवों में ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। कहना ग़लत नहीं होगा कि स्वच्छता से स्वास्थ्य, पर्यावरण, सम्मान और जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है तथा स्वच्छ भारत केवल एक अभियान नहीं, बल्कि स्वच्छ और स्वस्थ राष्ट्र के निर्माण का जनआंदोलन है।

गांधी जी का स्वच्छता दर्शन और आज के युग में प्रासांगिकता:-

गांधी जी का मानना था कि एक स्वच्छ समाज ही एक स्वस्थ और स्वावलंबी राष्ट्र का निर्माण कर सकता है। गांधी जी का यह मानना था कि स्वच्छता किसी विशेष वर्ग या जाति का काम नहीं है, बल्कि यह देश के प्रत्येक नागरिक का नैतिक व परम कर्तव्य है। सरल शब्दों में कहें तो उनका यह मानना था कि बाहरी कूड़े-कचरा की सफाई जितनी जरूरी है, उतनी ही आवश्यक मन की बुराइयों- जैसे घृणा, असमानता और छुआछूत की सफाई भी है। दरअसल, गांधी जी अपने आस पास के वातावरण की साफ-सफाई को नैतिक जिम्मेदारी मानते थे और आश्रम में रहने वाले हर व्यक्ति के लिए इसे अनिवार्य बनाते थे। आज हम सभी इक्कीसवीं सदी में सांस ले रहे हैं और इस समय पूरी दुनिया तीव्र शहरीकरण, औद्योगिक विकास, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है, ऐसे में गांधी जी के स्वच्छता विचार और स्वच्छता अभियान की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज के समय में प्लास्टिक कचरा, ई-कचरा और औद्योगिक प्रदूषण गंभीर व बड़ी समस्या बन चुके हैं। स्वच्छता अभियान अब केवल झाड़ू लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कचरा प्रबंधन (वेस्ट मैनेजमेंट), रीसायकलिंग और पर्यावरण संरक्षण का पर्याय बन गया है। देश की तरक्की और प्रगति के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखना बहुत ही जरूरी है और यह तभी संभव हो सकता है जब देश में हर तरफ स्वच्छता हो। गंदगी कई बीमारियों का मूल कारण है। वास्तव में,स्वच्छता से जल जनित और संक्रामक बीमारियों में भारी कमी आती है, जिससे नागरिकों का स्वास्थ्य सुधरता है और चिकित्सा पर होने वाले खर्च में बचत होती है। एक स्वस्थ कार्यबल राष्ट्र की आर्थिक उन्नति में सीधा योगदान देता है।आज संयुक्त राष्ट्र के ‘सतत विकास लक्ष्यों’ (जैसे स्वच्छ जल, स्वच्छता और बेहतर स्वास्थ्य) को प्राप्त करने में स्वच्छता अभियान एक मजबूत स्तंभ साबित हो रहा है।

स्वच्छ भारत, विकसित भारत:-

वर्ष 2026 तक स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) 2.0 और ग्रामीण चरण-2 के माध्यम से देश को पूरी तरह कचरा-मुक्त और सतत् स्वच्छ बनाने के लक्ष्य पर तीव्र गति से कार्य जारी है। इस वर्ष ‘स्वच्छता ही सेवा 2026’ अभियान को ‘स्वच्छता में सहभाग; स्वच्छ भारत, विकसित भारत’ की राष्ट्रव्यापी थीम के साथ आयोजित किया गया है। आंकड़े बताते हैं कि आज ग्रामीण क्षेत्रों में 95% से अधिक गांवों ने ओडीएफ प्लस (खुले में शौच मुक्त के साथ अपशिष्ट प्रबंधन) का दर्जा हासिल कर लिया है। वास्तव में यहां यह कहना ग़लत नहीं होगा कि स्वच्छ भारत मिशन अब केवल शौचालय निर्माण तक सीमित नहीं, बल्कि देश में समग्र स्वच्छता और कचरा प्रबंधन का व्यापक अभियान बन चुका है। वर्ष 2026-27 में स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण के लिए ₹7,192 करोड़ का बजट प्रावधान किया गया है। इसके तहत 48,096 गांवों में ठोस कचरा प्रबंधन, 36,119 गांवों में ग्रे-वॉटर प्रबंधन तथा 1,352 ब्लॉकों में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाइयों का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही 1.50 लाख गांवों में फीकल स्लज प्रबंधन की व्यवस्था विकसित करने का लक्ष्य है। अगस्त 2025 तक 4.77 लाख से अधिक गांव ओडीएफ प्लस मॉडल घोषित किए जा चुके थे। इतना ही नहीं, शहरों में डोर-टू-डोर कचरा संग्रहण में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है और वैज्ञानिक तरीके से ठोस अपशिष्ट प्रसंस्करण की दर 75% से अधिक पहुंच गई है। इस मिशन के अंतर्गत स्वच्छता ऐप के जरिए अब तक 2 करोड़ से अधिक जन शिकायतों का त्वरित समाधान भी दर्ज किया गया है। यह अभियान केवल सरकारी अवसंरचना निर्माण तक सीमित न रहकर जनभागीदारी, रीसायकल और अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े एक राष्ट्रीय व्यवहारिक बदलाव में परिवर्तित हो चुका है।ये सभी आंकड़े बताते हैं कि स्वच्छ भारत मिशन का अगला चरण स्वच्छता के साथ-साथ कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण और स्वच्छ पर्यावरण पर केंद्रित है।

अंत में निष्कर्ष के तौर पर यही कहूंगा कि स्वच्छ भारत अभियान केवल और केवल एक अभियान मात्र ही नहीं है, बल्कि यह एक जीवन शैली है। आज गांधी जयंती के अवसर पर हमें यह समझना होगा कि स्वच्छता कोई एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक दैनिक जीवन शैली है। यदि हम वास्तव में गांधी जी को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं, तो हमें स्वच्छता को अपने आचरण में ढालना होगा। हमें देश के नागरिक होने के नाते यह चाहिए कि हम न केवल अपने आसपास के वातावरण को साफ रखें बल्कि दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करें। आज प्लास्टिक स्वच्छ भारत की बड़ी बाधा है। दरअसल, प्लास्टिक नालियों, नदियों और मिट्टी को प्रदूषित कर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है। इसलिए एकल-उपयोग प्लास्टिक पर रोक के साथ इसके जिम्मेदार निस्तारण की जरूरत महत्ती है। हमें यह चाहिए कि हम प्लास्टिक छोड़ें और स्वच्छता को अपनाएं। एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक (सिंगल यूज प्लास्टिक) का बहिष्कार करें।गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग करने की आदत डालें। हमें यह बात अपने जेहन में रखनी चाहिए कि जब तक हर नागरिक स्वच्छता को अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी नहीं समझेगा, तब तक एक पूर्णतः स्वच्छ और समृद्ध भारत का सपना अधूरा रहेगा। बापू के इस विचार को जीवंत रखना ही आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है।