चोरबागान (कोलकाता ) की त्रासदी: सबक सीखने में बार-बार चूक क्यों?

Chorbagan (Kolkata) Tragedy: Why Repeated Failure to Learn Lessons?

अशोक भाटिया

उत्सव जब आंसुओं में बदल जाए, तो वह केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक व्यवस्थागत अपराध बन जाता है। महासप्तमी की शाम, जब पूरा कोलकाता और देश मां दुर्गा की आराधना के उल्लास में डूबा था, तब उत्तरी कोलकाता के चोरबागान सार्वजनीन दुर्गा पूजा पंडाल से आई चीख-पुकार ने त्योहार के रंग को गहरे शोक में बदल दिया। एक भ्रामक घोषणा, अचानक आई तेज बारिश और संकरे रास्तों के चक्रव्यूह ने मिलकर 19 मासूम जिंदगियों को लील लिया और 25 से अधिक लोगों को जीवन और मृत्यु के बीच लाकर खड़ा कर दिया। चोरबागान की यह हृदयविदारक त्रासदी एक बार फिर हमारे सामने वही पुराना, कड़वा और अनुत्तरित सवाल खड़ा करती है कि भारत में सार्वजनिक सुरक्षा मानकों और भीड़ प्रबंधन की हमारी व्यवस्थाओं से सबक सीखने में हर बार इतनी बड़ी चूक क्यों होती है? क्यों हमारी प्रशासनिक मशीनरी और पूजा समितियां तब तक गहरी नींद में सोई रहती हैं, जब तक कि पंडालों की ज़मीन निर्दोष नागरिकों के खून से लाल नहीं हो जाती?

चोरबागान में जो कुछ भी हुआ, वह कोई दैवीय आपदा या अचानक घटी अनहोनी नहीं थी, बल्कि यह प्रशासनिक और संगठनात्मक स्तर पर बरती गई घोर लापरवाही की एक कड़वी दास्तान है। हादसे के कारणों की समीक्षा करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आपदा प्रबंधन का कोई भी बुनियादी ढांचा वहां मौजूद नहीं था। सबसे पहली कमी पंडाल के स्थान और क्षमता के आकलन में थी। चोरबागान जैसी संकरी गलियों वाले रिहायशी इलाके में, जहां गलियां बमुश्किल कुछ मीटर चौड़ी हैं, इतने विशालकाय और अत्यधिक भीड़ खींचने वाले पंडाल को अनुमति देना ही पहला गलत कदम था। दूसरा संकट मौसम के पूर्वानुमान को पूरी तरह नजरअंदाज करने से उपजा। जैसे ही आसमान से मूसलाधार बारिश शुरू हुई, पंडाल के बाहर खड़ी और गलियों में रेंगती हुई हजारों की भीड़ ने सिर छुपाने के लिए पंडाल के भीतर और निकास द्वारों की ओर दौड़ लगा दी। ऐसी आपातकालीन स्थिति में निकास और प्रवेश के रास्ते अलग और चौड़े होने चाहिए थे, लेकिन चोरबागान में प्रवेश और निकास की सीमाएं आपस में गुत्थमगुत्था थीं। इस त्रासदी का सबसे भयावह और गैर-जिम्मेदाराना पहलू आयोजकों द्वारा की गई वह लाउडस्पीकर घोषणा थी, जिसने आग में घी का काम किया। भीड़ को शांत करने और अनुशासित करने के बजाय, लाउडस्पीकर से यह चिल्लाया गया कि पंडाल का ढांचा गिर रहा है। इस एक भ्रामक और गैर-पेशेवर घोषणा ने पूरी भीड़ के भीतर मौत का खौफ पैदा कर दिया और लोग एक-दूसरे को कुचलते हुए भागने लगे। यह भय प्रबंधन की सबसे बड़ी विफलता थी। जब आपके पास संकट के समय भीड़ से संवाद करने की बुनियादी समझ और प्रशिक्षण ही नहीं है, तो आप इतने बड़े आयोजन की कमान कैसे संभाल सकते हैं?

हादसे के तुरंत बाद जो कुछ भी हुआ, वह भारत की प्रशासनिक संस्कृति का एक जाना-माना और घिसा-पिटा ढर्रा है। राज्य सरकार ने तुरंत मृतकों के परिवारों के लिए ₹25 लाख के मुआवजे और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की घोषणा कर दी, जबकि प्रधानमंत्री कार्यालय से भी शोक संवेदनाएं और वित्तीय सहायता व्यक्त की गई। एक उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन भी कर दिया गया, जिसे कुछ हफ्तों में रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। लेकिन क्या यह सब इस बात की गारंटी है कि भविष्य में ऐसी घटनाएं नहीं होंगी? सच तो यह है कि मुआवजे की राजनीति इंसानी जान की कीमत को पैसों से तौलने का एक जरिया बन चुकी है। यह नेताओं और अफसरों के लिए अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ने का एक आसान शॉर्टकट है। हर बड़े हादसे के बाद जांच समितियां बैठती हैं, धूल फांकती फाइलों में मोटी-मोटी रिपोर्टें बंद हो जाती हैं और जब तक अगला त्योहार आता है, तब तक उन सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। चोरबागान की त्रासदी से पहले भी देश ने कुंभ मेला, साबरमती, भगदड़ की तमाम ऐतिहासिक त्रासदियां और हाल के वर्षों में कई धार्मिक आयोजनों में ऐसी ही मौतों को देखा है, लेकिन हमारी व्यवस्था ने अतीत के इन खूनी पन्नों से कभी कोई सबक नहीं सीखा।

हाल के दशकों में, कोलकाता की दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रह गई है, बल्कि यह थीम-पूजा और भव्यता की प्रतिस्पर्धा का एक विशाल व्यावसायिक रूप ले चुकी है। हर पूजा समिति इस होड़ में शामिल है कि उसका पंडाल सबसे अनोखा हो, सबसे ऊंचा हो और सबसे ज्यादा भीड़ आकर्षित करे। कॉरपोरेट स्पॉन्सरशिप और पुरस्कारों की इस अंधी दौड़ में, पंडालों की कलात्मकता पर तो करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन सुरक्षा और क्राउड इंजीनियरिंग के बजट पर कैंची चला दी जाती है। संकरी गलियों में बुर्ज खलीफा या वेटिकन सिटी जैसे काल्पनिक महलों के ढांचे खड़े कर दिए जाते हैं, लेकिन यह भूल जाया जाता है कि इन ढांचों को देखने आने वाली लाखों की भीड़ अगर किसी आपात स्थिति में फंस गई, तो वे बाहर कैसे निकलेंगे? फायर सेफ्टी, आपातकालीन निकास मार्ग, मेडिकल एड पोस्ट और एम्बुलेंस के लिए रास्ता छोड़ना जैसी बुनियादी शर्तें केवल कागजों पर पूरी की जाती हैं। स्थानीय पुलिस और नगर निगम भी इन रसूखदार पूजा समितियों के राजनीतिक रसूख के आगे घुटने टेक देते हैं और बिना किसी वास्तविक सुरक्षा ऑडिट के एनओसी जारी कर दिए जाते हैं। चोरबागान इसी भव्यता बनाम सुरक्षा के असंतुलन की एक डरावनी परिणति है।

आजकल बड़े पंडालों में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस के साथ-साथ निजी सुरक्षा गार्डों की भारी तैनाती की जाती है, लेकिन चोरबागान की घटना ने इस निजी सुरक्षा तंत्र की कलई खोलकर रख दी है। इन एजेंसियों के पास भीड़ के मनोविज्ञान को समझने या संकट के समय रेस्क्यू ऑपरेशन चलाने का कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं होता। वे केवल लाठियां लेकर या इंसानी दीवार बनाकर भीड़ को धक्का देने का काम करते हैं। जब वास्तविक संकट आया और पंडाल में भगदड़ मची, तो ये सुरक्षाकर्मी सबसे पहले अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए। स्थानीय पुलिस और इन निजी गार्डों के बीच समन्वय का कोई रेडियो या डिजिटल लिंक नहीं था, जिसके कारण भीतर चल रही तबाही की जानकारी बाहर तैनात पुलिस बल को तब मिली जब बहुत देर हो चुकी थी। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां डिजिटल इंडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्मार्ट सिटीज का ढिंढोरा पीटा जाता है। कोलकाता जैसे महानगर में, जहां दुर्गा पूजा के दौरान दुनिया की सबसे बड़ी जन-एकत्रित भीड़ उमड़ती है, वहां हमारी भीड़ प्रबंधन तकनीक इतनी पिछड़ी हुई क्यों है? आज के समय में हमारे पास ऐसी एआई-आधारित तकनीकें उपलब्ध हैं जो सीसीटीवी कैमरों के जरिए यह भांप सकती हैं कि किसी निश्चित क्षेत्र में प्रति वर्ग मीटर कितनी भीड़ बढ़ रही है। यदि भीड़ घनत्व एक सुरक्षित सीमा से ऊपर जाता है, तो ये सिस्टम तुरंत रेड अलर्ट जारी कर सकते हैं, जिससे पुलिस पंडाल में एंट्री को समय रहते रोक सकती है। ड्रोन निगरानी का इस्तेमाल केवल त्योहार की खूबसूरत तस्वीरें खींचने के लिए नहीं, बल्कि भीड़ की गतिशीलता और गलियों के चोक-पॉइंट्स को ट्रैक करने के लिए होना चाहिए था। चोरबागान में तकनीक के इस इस्तेमाल की पूर्ण अनुपस्थिति दिखी और जब तक पंडाल खचाखच भर नहीं गया, तब तक किसी ने भी प्रवेश द्वार को बंद करने की जहमत नहीं उठाई।

चोरबागान की त्रासदी को केवल एक प्रशासनिक चूक मानकर भुलाया नहीं जा सकता, बल्कि भविष्य की सुरक्षा के लिए अब नीतिगत बदलाव और सख्त कानून समय की मांग हैं। पहली आवश्यकता यह है कि सिनेमा हॉल और स्टेडियमों की तरह पंडालों के लिए भी एक ‘अधिकतम क्षमता सीमा’ तय की जानी चाहिए। यदि किसी पंडाल की क्षमता 500 लोगों की है, तो एक समय में उससे अधिक व्यक्ति भीतर नहीं जाना चाहिए और इसके लिए ऑटोमैटिक टर्नस्टाइल गेट्स या काउंटर्स का उपयोग अनिवार्य हो। दूसरी बात यह है कि केवल अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से कुछ नहीं होगा, बल्कि पूजा समिति के पदाधिकारियों, सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाली एजेंसी के प्रमुख और उस क्षेत्र के संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों पर सीधे तौर पर आपराधिक लापरवाही का मुकदमा चलना चाहिए। जब तक जिम्मेदार लोगों को जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाएगा, तब तक व्यवस्था में डर और जवाबदेही की भावना पैदा नहीं होगी। साथ ही, सभी सार्वजनिक आयोजनों के लिए एक सख्त पैनिक मैनेजमेंट एसओपी होनी चाहिए, जिसके तहत लाउडस्पीकर पर घोषणा करने के लिए केवल प्रमाणित और प्रशिक्षित उद्घोषक ही अधिकृत हों, जो संकट के समय भीड़ को डराने के बजाय शांत और संयमित करने वाले संदेश दे सकें। इसके अलावा, एक समाज के रूप में हमें भी अपनी मानसिकता बदलनी होगी क्योंकि त्योहारों के दौरान पंडालों में जबरन घुसने की होड़ और सुरक्षा नियमों को तोड़ने को बहादुरी समझने की आदत पर हमें खुद लगाम लगानी होगी।

चोरबागान की यह चीख इतिहास के पन्नों में एक और संख्या बनकर न रह जाए, यह सुनिश्चित करना सरकार, अदालत और नागरिक समाज—तीनों की साझी जिम्मेदारी है। 19 परिवारों के बुझे हुए चिराग और त्यौहार के मंडप पर पसरा यह सन्नाटा हमसे यह मांग कर रहा है कि हम अपनी उत्सवधर्मिता के साथ-साथ नागरिक सुरक्षा के प्रति भी उतने ही गंभीर हों। यदि इस भयावै त्रासदी के बाद भी हमारी व्यवस्था नहीं चेती, यदि नीतियां केवल कागजों तक ही सीमित रहीं, तो यह मान लिया जाएगा कि एक समाज और राष्ट्र के रूप में हमने इंसानी जान की कीमत को कौड़ियों के भाव आंकना स्वीकार कर लिया है। अब समय आ गया है कि हम कागजी जांच और खोखले आश्वासनों के चक्रव्यूह से बाहर निकलें और एक ऐसा सुरक्षित भारत बनाएं जहां उत्सवों का अंत खुशियों के साथ हो, आंसुओं और जनाजों के साथ नहीं।