जातीय आरक्षण से योग्यता पर ग्रहण, समाज में अलगाव बढ़ा

Caste-based reservation overshadows merit and has increased social division

संजय सक्सेना

भारत के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में आरक्षण, यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के प्रावधानों और सामाजिक न्याय की नीतियों को लेकर एक नया और गहरा वैचारिक संघर्ष आकार ले रहा है। हाल के दिनों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और अन्य अगड़ी जातियों (जिन्हें सामान्य वर्ग या सवर्ण समाज कहा जाता है) के बैनर तले हो रहे आंदोलन इस बात के गवाह हैं कि देश की सामाजिक बनावट में सुलग रही असंतोष की चिंगारी अब सतह पर आ चुकी है। इन आंदोलनों की तीव्रता किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर भारत से लेकर महाराष्ट्र और महानगरों तक इसका विस्तार देखा जा रहा है। सवर्ण समाज की इस नाराजगी के केंद्र में आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा की मांग और उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू होने वाले यूजीसी के दिशा-निर्देशों का विरोध मुख्य रूप से शामिल है। आंदोलनकारियों का तर्क है कि जातिगत आरक्षण ने मेधा और योग्यता की अनदेखी की है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर और सामान्य वर्ग के युवाओं के लिए अवसरों का दायरा लगातार सिमटता जा रहा है। उनका यह भी मानना है कि यूजीसी के कुछ नए नियमों और प्रावधानों के क्रियान्वयन से विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में निष्पक्षता प्रभावित हो रही है, जिससे बहुसंख्यक सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों में असुरक्षा की भावना पनप रही है।

जमीन पर उतरकर यदि इस आंदोलन की नब्ज टटोली जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि यह केवल कुछ लोगों का तात्कालिक आक्रोश नहीं है, बल्कि यह उस लंबी असंतुष्ट खामोशी का प्रस्फुटन है, जो पिछले कई दशकों से मुख्यधारा की राजनीति में अपनी अनदेखी महसूस कर रही थी। हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम का सबसे पेचीदा और विरोधाभासी पहलू यह है कि इतनी बड़ी सामाजिक हलचल के बावजूद देश का कोई भी प्रमुख राजनीतिक दल इन आंदोलनकारियों के पक्ष में खुलकर खड़ा होता नजर नहीं आ रहा है। राजनीतिक गलियारों में छाई यह खामोशी इस देश की उस चुनावी सच्चाई को उजागर करती है, जिसे हम वोट बैंक की सियासत कहते हैं। भारतीय लोकतंत्र में चुनावी गणित हमेशा से संख्या बल के इर्द-गिर्द बुना जाता रहा है और राजनीतिक दलों के लिए सत्ता की सीढ़ी चढ़ने का सबसे सुगम मार्ग संख्यात्मक रूप से बड़े समूहों को साधना माना गया है। इसी राजनीतिक विवशता के चलते सवर्ण जातियों के इन जायज सरोकारों और तर्कों पर बात करने से भी राजनीतिक दल कतराते दिख रहे हैं।एक समय था जब भारतीय जनता पार्टी को वैचारिक और सामाजिक रूप से मुख्य तौर पर ब्राह्मणों और बनियों की पार्टी समझा जाता था और यह माना जाता था कि अगड़ी जातियों के हितों की रक्षा के लिए यह दल स्वाभाविक आश्रय स्थल है। परंतु, समय के चक्र और चुनावी राजनीति की अनिवार्यताओं ने इस समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है। आज सत्ता के शीर्ष पर बैठी भाजपा हो या विपक्ष के अन्य दल, सभी इस बात को भली-भांति समझते हैं कि राजनीतिक वजूद को बचाए रखने के लिए दलित, पिछड़े और आदिवासी समुदायों (बहुजन समाज) का समर्थन अनिवार्य है। यही कारण है कि आज भाजपा बिना किसी संकोच के दलितों और पिछड़ों के अधिकारों, कल्याणकारी योजनाओं और उनके प्रतीकों के साथ मजबूती से खड़ी नजर आती है।

पार्टी का यह रणनीतिक बदलाव पूरी तरह से व्यावहारिक राजनीति पर आधारित है, जहां चुनावी जीत और सत्ता का संतुलन अगड़ी जातियों की नाराजगी की कीमत पर भी साधने से दल पीछे नहीं हट रहे हैं। यही वजह है कि सरकार इन आंदोलनकारियों की मांगों पर विचार करना तो दूर, उनसे औपचारिक बातचीत करने से भी कतराती दिख रही है। राजनेताओं को यह डर सता रहा है कि यदि वे सवर्ण आंदोलनों के पक्ष में थोड़ा भी झुकाव दिखाते हैं, तो उनका मुख्य मतदाता वर्ग छिटक सकता है, जिससे चुनावी हार का खतरा पैदा हो सकता है।इस राजनीतिक उदासीनता और प्रशासनिक उपेक्षा का असर अब सीधे तौर पर भारतीय समाज के ताने-बाने पर दिखने लगा है। जब नीति-निर्माता और राजनीतिक दल किसी बड़े सामाजिक वर्ग की शिकायतों को अनसुना कर देते हैं, तो समाज में दूरियां और कड़वाहट बढ़ने लगती हैं। इसके जमीनी दुष्परिणाम अब आम नागरिकों के जीवन में तनाव और टकराव के रूप में सामने आने लगे हैं। उदाहरण के लिए, हाल ही में मुंबई और उसके आसपास के क्षेत्रों में हुई कुछ घटनाओं ने यह दिखा दिया है कि कैसे वैचारिक और सामाजिक ध्रुवीकरण का असर रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ने लगा है।

यूजीसी के प्रावधानों और जातिगत संवेदनशीलता की आड़ में कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा सामान्य वर्ग के लोगों को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने या बेवजह निशाना बनाने की खबरें लगातार आ रही हैं। इस प्रकार की घटनाएं समाज में उस अविश्वास और कटुता को हवा दे रही हैं, जो दशकों के सामाजिक मेल-मिलाप के बाद बड़ी मुश्किल से सींची गई थी। जब एक वर्ग यह महसूस करता है कि कानून और व्यवस्था के मोर्चे पर उसकी सुनवाई नहीं हो रही है और प्रशासनिक मशीनरी भी सत्ता की राजनीतिक प्राथमिकताओं के आगे झुक चुकी है, तो समाज के भीतर एक गहरा क्षोभ जन्म लेता है। यह क्षोभ केवल आर्थिक या शैक्षणिक अधिकारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आत्मसम्मान की लड़ाई बन जाता है।इस पूरे परिदृश्य में एक बुनियादी सवाल यह उठता है कि क्या भारतीय लोकतंत्र में बहुसंख्यक लेकिन संख्यात्मक रूप से खंडित सवर्ण समाज के अधिकारों की रक्षा का कोई लोकतांत्रिक उपाय शेष नहीं बचा है? क्या सिर्फ इसलिए किसी वर्ग की आवाज को दबा दिया जाएगा क्योंकि उनके पास चुनाव जिताने लायक एकीकृत वोट बैंक की ताकत नहीं है? राजनीतिक दलों की यह कार्यप्रणाली अंततः देश के सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर रही है। जब न्याय और संवाद के द्वार एक विशेष वर्ग के लिए बंद कर दिए जाते हैं, तो लोकतंत्र की मूल भावना आहत होती है।

आज जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल तात्कालिक चुनावी लाभ और वोट बैंक की गणित से ऊपर उठकर समाज के सभी वर्गों की चिंताओं को सुनें। आरक्षण की समीक्षा का मुद्दा हो या यूजीसी जैसे मामलों में निष्पक्षता का प्रश्न, इन पर बिना किसी राजनीतिक पूर्वाग्रह के एक खुली और पारदर्शी राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। यदि राजनीति समाज के घावों पर मरहम लगाने के बजाय उन्हें वोट की तराजू में तौलना जारी रखेगी, तो मुंबई जैसी घटनाएं केवल अपवाद नहीं रहेंगी, बल्कि यह देश के अन्य हिस्सों में भी सामाजिक असंतोष की बड़ी आंधी का रूप ले सकती हैं।इसलिए, यह समय सभी दलों के लिए आत्ममंथन का है, ताकि लोकतंत्र की गाड़ी को केवल एक पहिए पर खींचने के बजाय समाज के हर हिस्से को साथ लेकर आगे बढ़ाया जा सके।