नाना पाटेकर: बेबाक आवाज का अंत, किरदारों में हमेशा जिंदा रहेंगे

Nana Patekar: End of the outspoken voice, will always be alive in the characters

स्वदेश कुमार

भारतीय सिनेमा के फलक पर कुछ ही ऐसे चेहरे होते हैं जो सिर्फ कैमरे के सामने अभिनय नहीं करते, बल्कि अपनी मौजूदगी से पूरे समाज के भीतर सुलग रहे सवालों को आवाज देते हैं। 8 अक्टूबर 2026 को गोवा के डोना पाउला स्थित अपने फ्लैट में 75 वर्ष की आयु में जब नाना पाटेकर ने अंतिम सांस ली, तो देश ने केवल एक दिग्गज अभिनेता को नहीं खोया, बल्कि उसने अपनी माटी की वह खरी आवाज खो दी जो कभी सत्ता के आगे झुकी नहीं और न ही किसी दिखावे की चादर में छिपी। महाराष्ट्र के रायगढ़ में 1 जनवरी को जन्मे विश्वनाथ पाटेकर से लेकर पर्दे के ‘नाना’ बनने तक का उनका यह सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं था, लेकिन यह पटकथा पूरी तरह सच के पन्नों पर लिखी गई थी। आंकड़ों और तथ्यों के आईने में देखें तो नाना पाटेकर का पांच दशकों से अधिक लंबा करियर इस बात की गवाही देता है कि बिना किसी फिल्मी घराने या गॉडफादर के भी कैसे सिर्फ प्रतिभा और जमीन से जुड़कर शिखर को छुआ जा सकता है। अपने बेमिसाल करियर में उन्होंने सौ से अधिक फिल्मों में काम किया और अपने अभिनय के दम पर तीन बार प्रतिष्ठित नेशनल फिल्म अवॉर्ड अपने नाम किए। साल 1989 की चर्चित फिल्म ‘परिंदा’ में खतरनाक गैंगस्टर अन्ना के किरदार के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, जिसके बाद 1994 की फिल्म ‘क्रांतिवीर’ के बागी प्रताप पाटिल के रूप में उनके दमदार और आग उगलते संवादों ने पूरे देश के युवाओं में एक नई चेतना जगा दी, और इस फिल्म के लिए उन्हें बेस्ट एक्टर के नेशनल अवॉर्ड से नवाजा गया। इसके ठीक बाद 1996 में आई फिल्म ‘अग्निसाक्षी’ में उनके रोंगटे खड़े कर देने वाले अभिनय के लिए उन्हें फिर से बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इसके अलावा भारतीय कला जगत में उनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए साल 2013 में उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया था। वह मराठी सिनेमा के पहले ऐसे सुपरस्टार थे जिन्होंने रंगमंच की मजबूत नींव पर खड़े होकर हिंदी सिनेमा के मुख्यधारा के आंचल में अपनी एक ऐसी अमिट छाप छोड़ी जिसकी बराबरी आज तक कोई नहीं कर पाया।

लेकिन जिस कलाकार ने अपनी पूरी जिंदगी मंच पर और पर्दे के पीछे बेबाकी की मिसाल पेश की, उसके आखिरी पल इतने वीरान और दर्दनाक होंगे, इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। गोवा के मणिपाल अस्पताल के ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. शेखर सालकर और शुरुआती मेडिकल खुलासों के मुताबिक, 8 अक्टूबर 2026 की उस मनहूस रात में, जब पूरी दुनिया गहरी नींद में थी, नाना पाटेकर के सीने में अचानक तेज घबराहट और बाईं तरफ असहनीय दर्द उठा। अपने गोवा वाले फ्लैट में उस वक्त वे पूरी तरह अकेले थे। जिंदगी के उस आखिरी और सबसे बड़े संकट के क्षण में उन्होंने अपने एक बेहद करीबी और जिगरी दोस्त को व्हाट्सएप पर एक संदेश भेजा। उस संदेश में उन्होंने अपनी बिगड़ती तबीयत और दिल के पास उठ रहे उस तूफान का जिक्र किया था। लेकिन विडंबना देखिए कि उस गहरी रात में दोस्त का फोन साइलेंट होने या दूर रखे होने के कारण वह नोटिफिकेशन उस समय तक नहीं देख सका। जब करीब डेढ़ घंटे बीत जाने के बाद सुबह के चार बजे उस दोस्त की आंख खुली और उसने मोबाइल पर नाना का वह दर्दभरा पैगाम पढ़ा, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। वह बिना एक पल गंवाए तुरंत डोना पाउला स्थित उस फ्लैट की तरफ दौड़ा, जहां का नजारा किसी खौफनाक सपने जैसा था। नाना पाटेकर अपने कमरे के फर्श पर अचेत गिरे हुए थे, उनका पूरा शरीर पसीने से बुरी तरह भीगा हुआ था और वे सांस लेने के लिए भयानक संघर्ष कर रहे थे। आनन-फानन में उन्हें गाड़ी में डालकर मणिपाल अस्पताल पहुंचाया गया, जहां सुबह करीब साढ़े चार से पांच बजे के बीच डॉक्टरों ने उन्हें देखते ही ‘ब्रॉट डेड’ घोषित कर दिया। अस्पताल के डॉक्टरों की टीम ने पूरी शिद्दत के साथ लगभग पैंतालीस मिनट से एक घंटे तक लगातार सीपीआर यानी कार्डियक मसाज देकर उनकी रुकी हुई धड़कनों को वापस लाने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन मौत अपनी बाजी जीत चुकी थी और इस महान फनकार का जिस्म हमेशा के लिए शांत हो चुका था।

नाना पाटेकर की मौत के बाद उनके जीवन के वे फलसफे और इंटरव्यू फिर से गूंज उठे हैं जो उन्होंने जीते-जी बेबाकी से कहे थे। एक बार एक इंटरव्यू में उन्होंने मौत की सच्चाई को बहुत ही गहरे और बेबाक अंदाज में समझाते हुए कहा था कि इंसान हमेशा खुद को अमर समझकर दिन-रात दौलत, शोहरत और सुख-सुविधाओं के पीछे भागता रहता है, जबकि हकीकत यह है कि जिंदगी से ज्यादा अनिश्चित कुछ भी नहीं है। उनका मानना था कि यदि हर इंसान सुबह उठते वक्त यह मान ले कि वह कल इस दुनिया में नहीं रहेगा, तो शायद वह अपने सारे अहंकार, लालच और दिखावे को छोड़कर आज के इस पल को पूरी सादगी, सच्चाई और इंसानियत के साथ जी सके। सिनेमा को लेकर उनका नजरिया बिल्कुल स्पष्ट था। उनका साफ कहना था कि यदि मेरे पास करोड़ों लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का इतना बड़ा और असरदार माध्यम मौजूद है, और फिर भी मैं उसका इस्तेमाल समाज के दबे-कुचले लोगों, किसानों के दर्द और व्यवस्था की सड़न को बयां करने के लिए नहीं करता, तो उस अभिनेता होने का कोई मतलब ही नहीं है। यही वजह थी कि उन्होंने फिल्मों में केवल मनोरंजन करने के बजाय ‘अंकुश’, ‘तिरंगा’, ‘अपहरण’ और ‘राजनीति’ जैसे गंभीर मुद्दों को चुना। असल जिंदगी में भी वह सिर्फ बातों के शेर नहीं थे, बल्कि सामाजिक जमीन पर उतरकर काम करने वाले इंसान थे। महाराष्ट्र और देश के सूखाग्रस्त इलाकों में जब किसानों की आत्महत्याओं का दौर बढ़ा, तो उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘नाम फाउंडेशन’ की नींव रखी। इसके जरिए उन्होंने न केवल किसानों के परिवारों को आर्थिक संबल दिया, बल्कि जल संरक्षण के बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम करके यह साबित कर दिया कि एक सच्चा कलाकार सिर्फ पर्दे का हीरो नहीं होता, बल्कि वह असल जिंदगी का भी मसीहा होता है। राजनीति और अपनी बेबाक टिप्पणियों को लेकर भी वह कभी किसी के दबाव में नहीं आए। जब उनसे उनके राजनीतिक रुख या तथाकथित ‘मोदी भक्त’ होने को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के दो टूक कहा था कि उन्हें इन लेबल से कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका सीधा और कड़क रुख था कि देशहित में यदि कोई काम अच्छा होता है, तो वह उसकी तारीफ खुले दिल से करेंगे, क्योंकि वे किसी पार्टी के नहीं बल्कि इस देश के एक जागरूक नागरिक हैं।

उनकी अंतिम इच्छा और उनका अंतिम संस्कार भी उनके व्यक्तित्व की तरह ही पूरी तरह बेबाक और फकीराना रहा। साल 2023 में अपनी फिल्म ‘द वैक्सीन वॉर’ के प्रचार के दौरान उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी अंतिम इच्छा जताते हुए कहा था कि वे अपनी पूरी जिंदगी बेहद साधारण तरीके से जिए हैं और वे मरने के बाद भी किसी ढकोसले में नहीं रहना चाहते। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिया था कि उनके अंतिम संस्कार में कभी भी गीली लकड़ियों का इस्तेमाल न किया जाए, क्योंकि गीली लकड़ियों से उठने वाला धुआं वहां मौजूद लोगों की आंखों में आंसू ले आएगा, और वे कतई नहीं चाहते कि उनके जाने पर कोई भी रोए या उनकी तस्वीर पर माला चढ़ाकर शोक मनाए। उनका मानना था कि उनके माता-पिता, भाई और बहनें सभी इस दुनिया से जा चुके हैं और वे अकेले बचे हैं, इसलिए उनकी यह मौत उन्हें उनके अपनों के पास ही ले जा रही है। उनके माता-पिता और परिवार के बिछड़ने का वह अकेलापन उनके भीतर हमेशा एक गहरी खामोश टीस बनकर रहता था। आज जब वे खुद इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं, तो महाराष्ट्र सरकार ने उनके महान योगदान और जनसेवा को सम्मान देते हुए पुणे स्थित उनके फार्महाउस पर राजकीय सम्मान के साथ उनके अंतिम विदाई की घोषणा की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर देश की तमाम राजनीतिक और फिल्मी हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए यही माना है कि नाना पाटेकर का जाना भारतीय संस्कृति और सिनेमा के एक ऐसे युग का अंत है, जिसे चाहकर भी दोबारा पैदा नहीं किया जा सकता। वे फिल्मों के आसमान में एक आजाद परिंदे की तरह उड़े, जिन्होंने अपनी आवाज से व्यवस्था की नींव हिला दी और अपनी खामोशी से करोड़ों दिलों में एक ऐसा खालीपन छोड़ गए जिसे कभी भरा नहीं जा सकता। अलविदा नाना, तुम्हारी वह तीखी और खरी आवाज हमेशा इस देश की हवाओं में गूंजती रहेगी।