ओ पी उनियाल
दीपावली का त्यौहार नजदीक है। बाजार भी सज चुके हैं। घरों-दुकानों पर रोशनी की जगमगाहट होने लगी हैं। दुकानों पर तरह-तरह का सजावटी सामान बिकना शुरु हो गया है। खील-बताशे एवं मिठाइयां भी अपना रंग जमाने लगे हैं। इसके अलावा तरह-तरह के पटाखे भी। आतिशबाजी का सिलसिला वैसे तो दशहरे से ही शुरु हो जाता है। गली-मोहल्लों में कहीं-कहीं पटाखों के धमाके शुरु हो जाते हैं।
परंपरा के अनुसार दीपावली घर-घर दीपों की रोशनी का त्यौहार है। लेकिन इस त्यौहार की वास्तविकता को हम खोते जा रहे हैं। दीवाली के दिन अंधाधुंध आतिशबाजी कर ध्वनि-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण तो फैलाया ही जाता है साथ ही साथ जगह-जगह अग्निकांड से जान-माल की अपूरणीय क्षति अलग होती है। यही नहीं पशु-पक्षियों के मन में भी दहशत बैठ जाती है। वे भी खुद को असहज महसूस करने लगते हैं।
बात करें वायु प्रदूषण की, तो एक दिन की आतिशबाजी के कारण जो जहरीला धुंआ आसमान में हवा के साथ फैलता है उसका असर कई दिनों तक बरकरार रहता है। इंसान एवं अन्य प्राणी इससे बुरी तरह प्रभावित होते हैं। इस जहरीले धुएं से श्वसनतंत्र पर सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है। अत्यधिक धमाकेदार पटाखों से आतिशबाजी के खतरनाक दुष्परिणामों के बारे में जानते हुए भी हर साल दीपावली के अवसर पर एक-दूसरे की होड़ के चलते अनदेखी करते हैं। माना कि एक तरफ पटाखा उद्योग से कई परिवारों की रोजी-रोटी चलती है, मगर दूसरी तरफ पटाखों के दीपावली, दशहरा व शादी-ब्याह के अवसर पर धमाकेदार उपयोग कहीं न कहीं चिंता का विषय भी बनता जा रहा है। इस विषय पर केंद्र, राज्य सरकारों व आम नागरिक को गहनता से विचार करना होगा।





