संजय सक्सेना
राजनीति, कला और विवाद का चोली-दामन का साथ रहा है, खासकर तब जब किसी राजनीतिक परिवार की पृष्ठभूमि से जुड़े किसी व्यक्ति की कलाकृति अचानक करोड़ों रुपये में बिक जाए और उसके बाद वह रहस्यमयी तरीके से गायब हो जाए। कुछ साल पहले भारतीय राजनीतिक गलियारों और कला जगत में एक ऐसी ही घटना ने भूचाल ला दिया था, जब कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा द्वारा बनाई गई एक पेंटिंग की नीलामी और उसकी भारी-भरकम कीमत ने हर किसी को हैरान कर दिया था। इस पूरी घटना ने न केवल कला बाजार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए थे, बल्कि यह भी दिखाया था कि कैसे राजनीति और कला का यह घालमेल कई बार गहरे संदेह और राजनीतिक बयानबाजी का केंद्र बन जाता है। इस पूरे प्रकरण की शुरुआत तब हुई जब प्रियंका गांधी वाड्रा की बनाई गई एक पेंटिंग दो करोड़ रुपये की भारी कीमत में बिकी, जिसने रातों-रात कला प्रेमियों और राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था। उस समय इस पेंटिंग को खरीदने वाले खरीदार का नाम सामने आने के बाद यह विवाद और अधिक गहरा गया था, क्योंकि खरीदने वाले कोई और नहीं बल्कि जाने-माने उद्योगपति और यस बैंक के संस्थापक राणा कपूर थे। राणा कपूर द्वारा इस पेंटिंग को दो करोड़ रुपये में खरीदने की खबर ने देश भर में सनसनी फैला दी थी क्योंकि न तो इससे पहले और न ही उसके बाद कभी प्रियंका गांधी की कोई अन्य पेंटिंग सार्वजनिक तौर पर दिखाई दी थी और न ही कभी यह सुनने में आया था कि वह चित्रकला या पेंटिंग बनाने का कोई विशेष शौक रखती हैं।
एक ऐसा व्यक्ति जो कला जगत में सक्रिय नहीं है और जिसकी कोई स्थापित कलात्मक पहचान नहीं है, उसकी अचानक बनाई गई एक साधारण या अमूर्त पेंटिंग का दो करोड़ रुपये में बिक जाना अपने आप में कई अनकहे सवाल खड़े करता है। इस पूरी घटना की गूंज केवल कला दीर्घाओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि आने वाले समय में यह राजनीतिक बहसों का एक बड़ा हथियार बन गई, खासकर तब जब प्रवर्तन निदेशालय और अन्य जांच एजेंसियों ने राणा कपूर से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग और वित्तीय घोटालों की जांच शुरू की थी। जांच एजेंसियों के सामने राणा कपूर ने खुलासा किया था कि उन्होंने प्रियंका गांधी से यह पेंटिंग मजबूरी में और तत्कालीन परिस्थितियों के दबाव में आकर खरीदी थी, जिसके बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का एक अंतहीन दौर शुरू हो गया था। भारतीय जनता पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने इस मामले को लेकर गांधी परिवार पर सीधा हमला बोला और इसे कला के नाम पर राजनीतिक संरक्षण या सौदेबाजी का एक माध्यम करार दिया था, जबकि कांग्रेस पार्टी ने इन सभी आरोपों को राजनीति से प्रेरित और बेबुनियाद बताया था। इस घटना का यह पहलू इस बात बताता है कि कैसे भारत में कला और संस्कृति का इस्तेमाल कई बार वित्तीय लेन-देन या राजनीतिक प्रभावों के आदान-प्रदान के लिए एक मुखौटे के रूप में किया जा सकता है।
इस पूरे विवाद को यदि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखा जाए और प्रियंका गांधी के बेटे रेहान वाड्रा की कला प्रदर्शनियों से जोड़ा जाए, तो यह कहानी और भी अधिक जटिल और दिलचस्प हो जाती है। रेहान वाड्रा, जो मुख्य रूप से फोटोग्राफी और विजुअल आर्ट्स में अपनी रुचि रखते हैं और समय-समय पर अपनी कला प्रदर्शनियों का आयोजन करते रहे हैं, वे भी कई बार विवादों के घेरे में आ चुके हैं। जब एक राजनीतिक परिवार की दूसरी पीढ़ी कला के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने की कोशिश करती है, तो समाज और मीडिया की नजरें स्वाभाविक रूप से इस बात पर टिक जाती हैं कि क्या इस सफलता के पीछे उनकी अपनी प्रतिभा है या उनके पारिवारिक राजनीतिक रसूख का कोई बड़ा हाथ है। रेहान वाड्रा की कला प्रदर्शनियों को लेकर भी अक्सर यह बहस छिड़ती रही है कि क्या उनके द्वारा प्रदर्शित की जाने वाली तस्वीरें या कलाकृतियां वास्तव में अंतरराष्ट्रीय कला बाजार के मानकों पर खरी उतरती हैं या फिर उन्हें केवल उनके परिवार के राजनीतिक कद के कारण ही अत्यधिक व्यावसायिक महत्व और मीडिया कवरेज मिल जाता है। प्रियंका गांधी की दो करोड़ रुपये में बिकने वाली पेंटिंग और उनके बेटे रेहान वाड्रा की कला प्रदर्शनियों के बीच एक स्पष्ट वैचारिक और मनोवैज्ञानिक धागा जुड़ा हुआ है, जो यह दर्शाता है कि कैसे इस परिवार के सदस्यों के लिए कला एक शौक से बढ़कर राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव का एक साधन बन जाती है। जब प्रियंका की पेंटिंग दो करोड़ में बिकी थी, तब भी कला समीक्षकों ने इस बात पर हैरानी जताई थी कि बिना किसी कलात्मक पोर्टफोलियो के किसी व्यक्ति की पहली ही कृति इतनी भारी कीमत पर कैसे बिक सकती है, और यही सवाल अक्सर रेहान वाड्रा की प्रदर्शनियों के संदर्भ में भी उठाए जाते हैं।
कला जगत के जानकारों का एक वर्ग हमेशा से यह मानता आया है कि जब राजनीति से जुड़े लोग कला के क्षेत्र में कदम रखते हैं, तो वहाँ निष्पक्ष मूल्यांकन की गुंजाइश बहुत कम बचती है, क्योंकि खरीदार और दर्शक अक्सर कलाकार की कला को नहीं बल्कि उसके राजनीतिक वजूद को खरीद रहे होते हैं। राणा कपूर द्वारा प्रियंका गांधी की पेंटिंग को इतनी बड़ी रकम में खरीदना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण माना जाता है कि उस समय वित्तीय और राजनीतिक समीकरण कलात्मक गुणवत्ता पर भारी पड़ रहे थे। इस प्रकार की घटनाएं कला के सच्चे संरक्षकों और उन उभरते हुए कलाकारों के साथ एक प्रकार का अन्याय होती हैं जो वर्षों तक कड़ी मेहनत करने के बाद भी अपनी कला का सही मूल्य पाने के लिए संघर्ष करते रहते हैं। जब एक राजनीतिक हस्ती या उनके परिवार का कोई सदस्य रातों-रात एक सफल कलाकार के रूप में स्थापित हो जाता है, तो यह आम जनमानस के मन में यह संदेश देता है कि विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लिए सफलता के रास्ते कितने सुगम होते हैं। प्रियंका गांधी की पेंटिंग वाला विवाद और रेहान वाड्रा की प्रदर्शनियों पर उठने वाले सवाल इस बात का गहन अध्ययन प्रस्तुत करते हैं कि भारत में परिवारवाद और राजनीतिक प्रभाव केवल राजनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे कला, संस्कृति और कॉर्पाेरेट जगत के गलियारों तक अपनी गहरी पैठ बना चुके हैं।
इस तरह के विवाद का यदि मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि कैसे शक्ति और धन का यह संयोजन भारतीय समाज में हमेशा से आकर्षण और विवाद दोनों का केंद्र रहा है। प्रियंका गांधी जैसी बड़ी राजनीतिक हस्ती का अचानक चित्रकला के मैदान में उतरना और उनकी पहली ही पेंटिंग का दो करोड़ रुपये में बिक जाना कोई सामान्य घटना नहीं थी, बल्कि यह शक्ति के उस केंद्र को रेखांकित करती है जहाँ साधारण नियम काम करना बंद कर देते हैं। राणा कपूर जैसे हाई-प्रोफाइल बैंकर्स और उद्योगपतियों का इस प्रकार की खरीद-फरोख्त में शामिल होना यह बताता है कि कैसे कॉप्रारेट और राजनीति के बीच के संबंध कला के नाम पर एक नया मुखौटा पहन लेते हैं। जब जांच एजेंसियों के माध्यम से यह बात सामने आई कि राणा कपूर के पास एम एफ हुसैन की एक मशहूर पेंटिंग भी थी और उन्होंने दबाव में आकर प्रियंका की पेंटिंग खरीदी थी, तो इससे यह साबित हुआ कि कलाकृतियां अब केवल सौंदर्य बोध का प्रतीक नहीं रह गई हैं, बल्कि वे सत्ता के गलियारों में अपने प्रभाव को बनाए रखने या बढ़ाने का एक माध्यम बन चुकी हैं। इस घटना ने भारतीय कला बाजार की पारदर्शिता पर भी एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया था, क्योंकि जब कला की कीमतें प्रतिभा के आधार पर तय होने के बजाय खरीदार और विक्रेता के राजनीतिक और आर्थिक संबंधों के आधार पर तय होने लगें, तो कला का असली उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। यही कारण है कि जब रेहान वाड्रा अपनी कला प्रदर्शनियों का आयोजन करते हैं, तो लोग बहुत जल्दी उन पर सवाल उठाना शुरू कर देते हैं, क्योंकि जनता के मन में यह अविश्वास पहले ही बैठ चुका होता है कि इस परिवार से जुड़ा कोई भी व्यक्ति यदि कला के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, तो उसके पीछे विशेषाधिकार का ही खेल है। यह स्थिति उन युवा कलाकारों के लिए बेहद निराशाजनक होती है जो अपनी मेधा और संघर्ष के बल पर अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे होते हैं, लेकिन उन्हें वह मंच और वित्तीय सराहना नहीं मिलती जो राजनीतिक परिवारों के सदस्यों को आसानी से मिल जाती है। प्रियंका गांधी की पेंटिंग का विवाद और रेहान वाड्रा की कलात्मक यात्रा इस बात का सटीक उदाहरण है कि कैसे किसी राजनीतिक परिवार की पृष्ठभूमि सफलता के रास्ते को या तो पूरी तरह से आसान बना देती है या फिर उसे हमेशा के लिए विवादों के साये में खड़ा कर देती है। कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं होगा कि कला हमेशा से आत्मा की अभिव्यक्ति का माध्यम रही है, लेकिन जब इसमें राजनीति, धन और शक्ति का तड़का लग जाता है, तो यह केवल एक सौदा बनकर रह जाती है, जहाँ न तो कला की कोई सच्ची कीमत होती है और न ही कलाकार की कोई स्वतंत्र पहचान बच पाती है।





