रंगमंच का वो कबीर चला गया… अलविदा नाना!

The Kabir of the theatre world has departed… Goodbye, Nana!

दिलीप कुमार पाठक

किताबों की बातें करने वाले, हमेशा दिल से जीने वाले नाना। इतने बड़े फनकार बने आप, पूरी दुनिया ने आपकी अदाकारी को सलाम किया और ‘सम्पूर्ण अदाकार’ का खिताब दिया, लेकिन आप अपनी आख़िरी सांस तक वही ठेठ गाँव के सीधे-सादे फक्कड़ इंसान ही रहे। अपनी ही मस्ती में, अपनी ही रफ्तार से चलने वाले एक अलबेले मुसाफ़िर। जिसकी अपनी एक अलग ही दुनिया थी। आपकी वो सादगी और बेलौस अंदाज़ ऐसा था कि बड़े से बड़े लोग आपके सामने मद्धम पड़ जाते थे। कमाल का था आपका रूतबा। जब दिल किया, किसी की भी खुलकर तारीफ़ कर दी और जब गुस्सा आया, तो सामने कोई भी हो, बिना डरे खरी-खरी सुना दी। आपका कोई तय ढर्रा या बंदिश नहीं थी, न किसी दल में न दलदल में। आपकी तो बस एक ही अपनी विचारधारा थी इंसानियत, मानवता, सद्भाव और प्रेम। इस बेढंगी दुनिया में एक शानदार इंसान रहे हैं आप। आपको एक अभिनेता से बढ़कर एक खरे इंसान के रूप में याद किया जाएगा। सचमुच आप सिनेमा के कबीर थे।

इतनी शोहरत और नेशनल अवॉर्ड्स, नागरिक सम्मान सहित बड़े बड़े अवॉर्ड जीतने के बाद भी आप अक्सर कितनी मासूमियत से कहते थे, ‘यार, मुझे अच्छी हिंदी आती तो मैं बहुत अच्छा एक्टर बन जाता… मुझे गुस्सा बहुत आता है, मैं दिखने में भी अच्छा नहीं हूँ… लेकिन हाँ, कुछ करने का जज्बा है।’ यही जज्बा आपको सबसे अलग और एक नायाब शख्सियत बनाता था।

विश्वसनीयता ऐसी थी कि यार नाना पाटेकर कभी झूठ नहीं बोल सकते। निहायत ही ईमानदार आदमी, हमेशा बेबाक बोलता हुआ। दूसरों की दिल खोलकर तारीफ करता हुआ। आपका अभिनय कोई किताबी थ्योरी नहीं था, वो तो जिंदगी के कड़वे तजुर्बों की भट्टी में तपकर निकला हुआ सोना था। मुरुद-जंजीरा की गलियों से निकलकर, ‘गमन’ से शुरू हुआ आपका ये सफर ‘परिंदा’, ‘प्रहार’, ‘क्रांतिवीर’ और ‘नटसम्राट’ जैसी बेहतरीन फिल्मों से गुज़रते हुए भारतीय सिनेमा की सबसे ऊंची मिसाल बन गया। कैमरे के सामने आपकी खामोशी में भी एक अजीब सी चीख होती थी और जब आप दहाड़ते थे, तो थियेटर के परदे कांप उठते थे।

वो अल्फाज जो जिंदगी को रास्ता दिखाते हैं, यार नाना, आपके संवाद सिर्फ परदे पर तालियां बटोरने के लिए नहीं थे, वे तो इंसान को भीतर तक झकझोरने और जीने का सलीका सिखाने का जरिया थे। फिल्म ‘थोड़ा सा रूमानी हो जाएं’ में बारिश पर कही गई आपकी वो कविता याद है? आपने कहा था-
‘हां मेरे दोस्त, वही बारिश, वही बारिश जो आसमान से आती है
बूंदों मैं गाती है, पहाड़ों से फिसलती है, नदियों मैं चलती है
नहरों मैं मचलती है, कुंए पोखर से मिलती है, खप्रेलो पर गिरती है, गलियों मैं फिरती है, मोड़ पर संभालती है, फिर आगे निकलती है, वही बारिश.. ये बारिश अक्सर गीली होती है
इसे पानी भी कहते हैं, उर्दू में आप, मराठी में पानी, तमिळ में कन्नी, कन्नड़ में नीर, बंगला में… जोल केह्ते हैं.
संस्‍कृत में जिसे वारि नीर जीवन पै अमृत पै अम्बु भी कह्ते हैं.
ग्रीक में इसे aqua Pura, अंग्रेजी में इसे water
फ्रेंच में औ, और केमिस्ट्री में H2O कहते हैं।

ये पानी आंखों से ढलता है तो आंसू कहलता है, लेकिन चेहरे पर चढ़ जाये तो रुबाब बन जाता है, हां…कोई शर्म से पानी पानी हो जाता है, और कभी कभी यह पानी सरकारी फाइलों में अपने कुंए समेत चोरी हो जाता है। पानी तो पानी है पानी जिन्दगानी है, इसलिए जब रूह की नदी सूखी हो, और मन का हिरण प्यासा हो, दीमाग में लगी हो आग, और प्यार की घागर खाली हो, तब मैं….हमेशा, ये बारिश नाम का गीला पानी लेने की राय देता हूं, मेरी मानिए तो ये बारिश खरीदिये
सस्ती सुन्दर टिकाऊ बारिश, सिर्फ 5 हज़ार रुपये में
इस्से कम में दे कोई तो चोर की सज़ा वो मेरी, आपकी जूती सिर पर मेरी… मेरी बारिश खरीदये.. सस्ती सुन्दर टिकाऊ बारिश…

इस कविता के जरिए आपने जिंदगी का कितना बड़ा फलसफा समझा दिया था कि उतार-चढ़ाव तो जिंदगी का नियम है,
लेकिन बहते रहना और अंत में अनंत में विलीन हो जाना ही है।

फिल्म ‘यशवंत’ में जब आपने पूरे रौब के साथ कहा था – ‘एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है!’ तो भले ही लोग उस पर हंसे, लेकिन वह इस समाज की उस लाचारी और सुस्ती पर एक गहरा कटाक्ष था, जहां इंसान छोटी-छोटी समस्याओं के सामने घुटने टेक देता है। आपने हमेशा अपने संवादों से सिखाया कि हालात चाहे जितने भी बदतर हों, रीढ़ की हड्डी हमेशा सीधी होनी चाहिए। ‘नटसम्राट’ में जब आपने रंगमंच और जिंदगी के फासले को बयां किया, तो लगा जैसे आप अभिनय नहीं, बल्कि आत्मा का निचोड़ परदे पर रख रहे हैं। आपके संवाद समझाते हैं कि इंसान को अपनी तकलीफों पर रोने के बजाय अपनी बेबाकी और उसूलों के साथ सर उठाकर जीना चाहिए।

यार नाना, लोग तो सिर्फ परदे पर बंदूक तानकर ‘देशभक्ति’ की एक्टिंग करते हैं, लेकिन आपने तो असल जिंदगी में मौत से आंखें मिलाई थीं। 1990 के दशक में जब आप ‘प्रहार’ फिल्म बना रहे थे, तो आपने महज़ एक्टिंग के लिए नहीं, बल्कि सेना को करीब से समझने के लिए तीन साल की सख्त मिलिट्री ट्रेनिंग ली थी। आप टेरिटोरियल आर्मी में शामिल हुए और बाद में आपको लेफ्टिनेंट कर्नल के मानद रैंक से नवाजा गया। और वो 1999 का कारगिल युद्ध! जब देश पर संकट आया, तो आपने चकाचौंध वाली फिल्म इंडस्ट्री को एक झटके में छोड़ दिया। तत्कालीन रक्षा मंत्री से खास इजाजत लेकर आप सीधे सरहद पर पहुंच गए। उस हाड़ कंपा देने वाली ठंड और बारूद के बीच, ‘क्विक रिएक्शन टीम’ के सदस्य के तौर पर आप द्रास, कुपवाड़ा और बटालिक की चौकियों पर हमारे जवानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे। वहां रसद पहुंचानी हो या मिलिट्री अस्पताल में घायल सिपाहियों की तीमारदारी करनी हो, आपने सब किया। इस सेवा के दौरान आपने अपना 20 किलो वजन तक गंवा दिया था। आप अक्सर कहते थे, ‘हमारा सबसे बड़ा हथियार बोफोर्स या एके-47 नहीं, हमारे जांबाज जवान हैं।’ सचमुच, देश के लिए ऐसा जूनून किसी रील हीरो में नहीं, सिर्फ आप जैसे रियल हीरो में ही हो सकता था।

आपकी इसी बेलौस फितरत का एक वाकया पूरी दुनिया को हमेशा याद रहेगा। जब सरकार की तरफ से आपको देश के बड़े नागरिक सम्मान पद्म श्री देने का एलान हुआ, तो आपकी बेबाकी वहां भी सिर चढ़कर बोली। आपने बिना किसी हिचकिचाहट के सीधे पूछ लिया था, ‘ये अवॉर्ड आखिर किस लिए दिया जा रहा है मुझे?’ वहां से जवाब आया कि आपने कला के जरिए समाज की बहुत सेवा की है, देश का नाम रोशन किया है। इस पर आपने मुस्कुराकर कहा था, ‘अजी छोड़ो यार, ये कैसा सम्मान? मैंने जो भी काम किया, उसके बदले प्रोड्यूसर से पूरे पैसे वसूल किए हैं… जब काम के बदले दाम ले लिया, तो फिर ये समाजसेवा कैसी और ये सम्मान क्यों?’ ऐसी खरी और सच्ची बात कहना सिर्फ और सिर्फ आपके ही बस की बात थी।

आम दुनिया तो बस आपके परदे के किरदारों को जानती है नाना, लेकिन आपकी जिंदगी के कुछ पन्ने ऐसे रहे जो आज भी लोगों की नज़रों से ओझल हैं। बचपन की वो भयानक तंगहाली जब आपने महज 13 साल की उम्र में रोज़ाना 16 किलोमीटर पैदल चलकर 35 रुपये की पहली नौकरी की थी। उस वक़्त मुंबई की सड़कों पर जेब्रा क्रॉसिंग की पट्टियां बनाना और फिल्मों के पोस्टर पेंट करना आपकी मजबूरी थी, लेकिन उसने आपके अंदर के कलाकार को कभी मरने नहीं दिया। जब वक़्त बदला और आप थिएटर करने लगे, तब भी सादगी ऐसी थी कि शादी जैसी बड़ी रस्म भी आपने कोई तामझाम किए बिना महज 750 रुपये के कुल खर्च में पूरी कर ली थी। कमाई का तो आपका फलसफा ही जुदा था। फिल्म इंडस्ट्री में जब बड़े-बड़े सितारे अपने महंगे शौक पालते हैं, आप अपने फार्महाउस पर खुद ट्रैक्टर चलाकर अनाज उगाते रहे। मज़े की बात यह है कि उस अनाज को आप खुद बाज़ार में जाकर बेचते थे और उससे होने वाली पाई-पाई की कमाई चुपचाप उन गरीब महिलाओं या शहीद सैनिकों के परिवारों को सौंप देते थे, जिनका इस दुनिया में कोई सहारा नहीं बचा था। अभिनय की दुनिया में भी आपका एक ऐसा अनोखा रिकॉर्ड है जो बड़े से बड़ा सूरमा नहीं बना पाया; आप भारतीय सिनेमा के इकलौते ऐसे फनकार हैं जिसने फिल्मफेयर के इतिहास में ‘बेस्ट एक्टर’ क्रांतिवीर, ‘बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर’ परिंदा और ‘बेस्ट विलेन’ अपहरण, तीनों ही अलग-अलग श्रेणियों में मुख्य पुरस्कार जीतकर अपना परचम लहराया। और जब भी सेट पर फुर्सत मिलती, आप एक उम्दा शेफ बनकर अपने हाथों से ठेठ गाँव के स्वाद का खाना बनाकर सबको खिलाते थे।

खेत से खुद उगा कर खाना और मुंबई से कमाकर लाना और किसानों की मदद में लुटा देना। यार नाना, ये दिलदारी सिर्फ आपको ही आती थी। करोड़ों की गाड़ियाँ खरीदने की बजाय अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा चुपचाप तंगहाल किसानों की झोली में डाल देना, ‘नाम फाउंडेशन’ बनाकर महाराष्ट्र के सूखे खेतों में ज़िंदगी की नई उम्मीद बोना। ये काम कोई मामूली एक्टर नहीं, सिर्फ एक रूहानी इंसान ही कर सकता था। आप हमेशा ज़मीन से जुड़े रहे, मुंबई की चकाचौंध के बीच रहकर भी अपनी फकीरी का दामन थामे रखा। आज आप इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कहकर, उस पार के एक नए मंच की ओर निकल गए हैं। मौत का तमाशा देखने आई इस दुनिया को अपनी बेबाकी से निरुत्तर करके आप जा चुके हैं।

यार नाना, आपकी ये बेलौस ईमानदारी, वो बेढंगा लेकिन खूबसूरत अंदाज़ बहुत याद आएगा। लेकिन एक बात बोलूँ लोग मरते हैं, युगपुरुष नहीं, आप हमेशा हम लोगों के दिलों में ज़िंदा रहेंगें, आपका वजूद तब तक रहेगा, जब तक तारीख़ रहेगी। अलविदा नाना।