व्यावहारिक कूटनीति की नई सुबह और भारत-कनाडा संबंध

A New Dawn of Pragmatic Diplomacy and India-Canada Relations

अशोक भाटिया

वैश्विक भू-राजनीति में स्थायी शत्रु या स्थायी मित्र नहीं होते, बल्कि स्थायी केवल राष्ट्रहित होते हैं। भारत और कनाडा के संबंधों का हालिया इतिहास इस सदाबहार कूटनीतिक सिद्धांत का सबसे सटीक उदाहरण बनकर उभरा है। पिछले दो वर्षों के अभूतपूर्व कूटनीतिक तनाव, आरोपों-प्रत्यारोपों के दौर और दोनों पक्षों द्वारा दूतावासों के कर्मचारियों में की गई कटौती के बाद, आखिरकार नई दिल्ली और ओटावा ने पुरानी कड़वाहट को पीछे छोड़ते हुए एक व्यावहारिक और दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के ८१वें सत्र के इतर भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर और कनाडा की नवनियुक्त विदेश मंत्री अनीता आनंद के बीच न्यूयॉर्क में हुई द्विपक्षीय वार्ता महज एक औपचारिक मुलाकात नहीं थी, बल्कि यह दोनों देशों द्वारा अपने रिश्तों को एक ‘नई ऊंचाई’ पर ले जाने की साझा प्रतिबद्धता का शंखनाद है।

यह कूटनीतिक पुनरुद्धार इस बात का प्रमाण है कि आर्थिक अनिवार्यताएं और रणनीतिक हित अंततः राजनीतिक मतभेदों पर हावी हो जाते हैं। कनाडा में मार्च २०२५ में प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के सत्ता संभालने के बाद से दोनों पक्षों के बीच संबंधों को क्रमिक रूप से सामान्य बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। इस बैठक के बाद कनाडाई प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने स्पष्ट किया है कि भारत के साथ संबंध कई स्तरों पर—जनसंख्या, सुरक्षा और व्यापार—अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। दोनों लोकतंत्रों ने यह समझ लिया है कि समकालीन वैश्विक परिदृश्य में एक-दूसरे से दूरी बनाए रखना दोनों के लिए ही नुकसानदेह साबित हो रहा था।

वर्तमान सुधार को समझने के लिए भारत-कनाडा संबंधों के उस स्वर्ण काल को याद करना आवश्यक है, जिसने इस साझेदारी की मजबूत बुनियाद रखी थी। जयशंकर और आनंद की वर्तमान वार्ता और आगामी कूटनीतिक रूपरेखा की रीढ़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अप्रैल २०१५ की ऐतिहासिक कनाडा यात्रा है। वह यात्रा किसी भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा ३३ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद की गई पहली स्टैंडअलोन आधिकारिक कनाडाई यात्रा थी।२०१५ में प्रधानमंत्री मोदी के उस दौरे ने दोनों देशों के रिश्तों को ‘रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर पर उन्नत किया था। उस दौरान भारत और कनाडा के बीच असैन्य परमाणु ऊर्जा सहयोग को लेकर एक बड़ा समझौता हुआ था, जिसके तहत कनाडा की कंपनी केमेको ने भारत को यूरेनियम की दीर्घकालिक आपूर्ति का जिम्मा लिया था। इसके अलावा, निवेश प्रोत्साहन, विमानन और अंतरिक्ष क्षेत्र में तकनीकी आदान-प्रदान के कई ऐतिहासिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे। उस यात्रा ने न केवल दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को एक नई दिशा दी थी, बल्कि कनाडा में रह रहे विशाल भारतीय प्रवासियों के बीच भारत की साख को एक नया मुकाम दिया था। आज जब २०२६ में दोनों देश अपने संबंधों को एक पायदान और ऊपर ले जाने की बात कर रहे हैं, तो उसकी रूपरेखा उसी २०१५ के मजबूत आर्थिक और रणनीतिक ढांचे पर टिकी हुई है।दोनों देशों के बीच इस रणनीतिक बदलाव का सबसे मजबूत स्तंभ आर्थिक मोर्चे पर दिखाई दे रहा है। भारत और कनाडा के बीच प्रस्तावित व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते पर बातचीत को फिर से तेज कर दिया गया है। अधिकारियों के अनुसार, इस साल दिसंबर २०२६ तक व्यापार वार्ता को पूरी तरह से संपन्न करने का लक्ष्य रखा गया है। यह समझौता दोनों देशों के वाणिज्यिक परिदृश्य को पूरी तरह से बदल कर रख देगा।

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल द्वारा मई २०२६ में कनाडा का किया गया हालिया व्यापार दौरा, जिसमें १२० से अधिक भारतीय कंपनियों का प्रतिनिधिमंडल शामिल था, यह दर्शाता है कि भारत इस आर्थिक साझेदारी को लेकर कितना गंभीर है। दोनों देशों ने मिलकर वर्ष 2030 तक आपसी द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना से अधिक कर ७० अरब कनाडाई डॉलर (लगभग ५० अरब अमेरिकी डॉलर) तक पहुंचाने का एक अत्यंत महत्वाकांक्षी साझा लक्ष्य निर्धारित किया है। यह लक्ष्य केवल वस्तुओं के व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें डिजिटल व्यापार, कृषि-खाद्य, वित्तीय सेवाएं और उन्नत विनिर्माण जैसे उच्च मूल्य वाले क्षेत्र शामिल हैं। कनाडाई पेंशन फंड पहले से ही भारतीय बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) में अरबों डॉलर का निवेश कर चुके हैं, और इस नए समझौते के बाद निवेश का यह प्रवाह और तेजी से बढ़ेगा।

समकालीन विश्व में ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश की संप्रभुता और आर्थिक स्थिरता की पहली शर्त है। भारत, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं में विविधता लाने और कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए तेजी से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है, के लिए कनाडा एक आदर्श और विश्वसनीय भागीदार साबित हो सकता है। मार्च २०२६ में प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की भारत यात्रा के दौरान असैन्य परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा विभाग और कनाडाई कंपनी के बीच २.६ अरब कनाडाई डॉलर के यूरेनियम आपूर्ति समझौते को अंतिम रूप दिया गया।इसके अतिरिक्त, दोनों देशों ने महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में सहयोग के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे दुर्लभ खनिज आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों और हरित ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिए रीढ़ की हड्डी हैं। भारत ने जी७ क्रिटिकल मिनरल्स एक्शन प्लान का भी समर्थन किया है। इस प्रकार, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण, ग्रिड आधुनिकीकरण और हाइड्रोजन तकनीक में कनाडा की विशेषज्ञता और भारत का विशाल बाजार दोनों देशों के लिए एक ‘विन-विन’ स्थिति का निर्माण करते हैं।

भारत और कनाडा के संबंधों का सबसे जीवंत और संवेदनशील पहलू दोनों देशों के बीच पीपुल-टू-पीपुल संपर्क है। वर्तमान में कनाडा में २० लाख से अधिक भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जो वहां की अर्थव्यवस्था, राजनीति और सामाजिक ताने-बाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। कनाडाई शिक्षा प्रणाली भारतीय छात्रों के लिए सबसे पसंदीदा स्थलों में से एक रही है। २०२४-२५ के आंकड़ों के अनुसार, कनाडा के सेवा निर्यात का एक बहुत बड़ा हिस्सा शिक्षा से जुड़े भारतीय छात्रों के माध्यम से आता है।विदेश मंत्री स्तर की इस हालिया वार्ता में दोनों देशों ने प्रवासन और गतिशीलता को सुव्यवस्थित करने पर विशेष बल दिया है। पिछले कुछ समय में वीजा और स्थायी निवास प्रक्रियाओं में आई सुस्ती को दूर करने के लिए कूटनीतिक मिशनों में कर्मचारियों की संख्या को फिर से बढ़ाने पर सहमति बनी है। भारतीय छात्रों और पेशेवरों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भारत की प्राथमिकता रही है, और कनाडाई विदेश मंत्री अनीता आनंद—जो स्वयं भारतीय मूल की हैं—ने इस मोर्चे पर व्यावहारिक कदम उठाने का आश्वासन दिया है।

सुरक्षा और रणनीतिक मोर्चे पर, भारत और कनाडा दोनों ही एक मुक्त, खुले, समावेशी और नियम-आधारित भारत-प्रशांत क्षेत्र के समर्थक हैं। वैश्विक मंच पर चीन की बढ़ती आक्रामकता और आपूर्ति श्रृंखलाओं के व्यवधान को देखते हुए, दोनों लोकतांत्रिक देशों का एक साथ आना वैश्विक संतुलन के लिए आवश्यक है।अतीत के कड़वे अनुभवों से सीखते हुए दोनों पक्षों ने सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी ग्रिड पर खुफिया जानकारियों के आदान-प्रदान को मजबूत करने का निर्णय लिया है। कनाडा की धरती का भारत विरोधी तत्वों द्वारा कूटनीतिक दुरुपयोग भारत के लिए हमेशा से एक रेड-लाइन रहा है। हालांकि, हाल ही में रॉयल कनाडाई माउंटेड पुलिस और नई कनाडाई सरकार द्वारा अपनाए गए संतुलित रवैये ने नई दिल्ली को यह विश्वास दिलाया है कि ओटावा अब अपनी आंतरिक सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को लेकर अधिक गंभीर है। दक्षिण अफ्रीका में आगामी जी२० शिखर सम्मेलन के दौरान होने वाली संभावित द्विपक्षीय बैठक इस रणनीतिक साझेदारी को और अधिक वैचारिक स्पष्टता प्रदान करेगी।

जयशंकर और आनंद की इस ऐतिहासिक बैठक और उसके बाद दोनों देशों द्वारा जारी किया गया संयुक्त रोडमैप यह स्पष्ट करता है कि भारत और कनाडा के संबंध अब परिपक्वता के एक नए दौर में प्रवेश कर चुके हैं। इतिहास गवाह है कि राजनयिक संबंधों में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन एक कुशल राष्ट्र वही है जो क्षणिक विवादों को अपने दीर्घकालिक विकास की राह में बाधा न बनने दे।आगामी दिसंबर २०२६ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संभावित कनाडा यात्रा इस कूटनीतिक पुनरुद्धार की पराकाष्ठा होगी। २०१५ की यात्रा ने जहां एक मजबूत ढांचा तैयार किया था, वहीं २०२६ की यह आगामी यात्रा इसे क्रियान्वयन के धरातल पर उतारेगी। व्यापार, स्वच्छ ऊर्जा, तकनीकी सुरक्षा और शिक्षा के साझा पहियों पर सवार होकर भारत और कनाडा की यह नई कूटनीतिक यात्रा वास्तव में दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को एक अभूतपूर्व और स्थायी ऊंचाई पर ले जाने के लिए पूरी तरह तैयार है। वैश्विक पटल पर यह बदलाव केवल दो देशों का मिलन नहीं, बल्कि दो महान लोकतंत्रों की व्यावहारिक सूझबूझ की एक बड़ी विजय है।