अशोक भाटिया
सच्चा साहस किसी राजनीतिक विचारधारा या वोट बैंक के समीकरणों का मोहताज नहीं होता। हाल ही में फ्लाईदुबई की उड़ान FZ1073 में ओमान के सह-पायलट द्वारा किए गए जानलेवा हमले के बावजूद, भारतीय जांबाज कप्तान स्मित मच्छार ने अदम्य वीरता दिखाते हुए 174 यात्रियों की जान बचाई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का मान बढ़ाने वाली इस ऐतिहासिक शौर्य गाथा पर देश के मुख्यधारा के विपक्ष ने एक रहस्यमयी चुप्पी साधे रखी है। इस पूरे गतिरोध की जड़ में जो सबसे बड़ा और गंभीर आरोप उभर कर सामने आ रहा है, वह है तुष्टिकरण और वोट बैंक की कथित राजनीति।
जब राष्ट्रीय गौरव के क्षणों को भी दलगत हितों के संकीर्ण चश्मे से देखा जाने लगे, तो यह हमारे लोकतांत्रिक विमर्श के गिरते स्तर और वैचारिक संकीर्णता को रेखांकित करता है।इस पूरे गतिरोध के केंद्र में जो सबसे बड़ा और अकाट्य सच उभर कर सामने आ रहा है, वह यह है कि विपक्ष की इस हिचकिचाहट के पीछे हमलावर की धार्मिक और राष्ट्रीय पहचान एक बड़ा और निर्णायक कारक रही है। जब कॉकपिट में जानलेवा हमला करने वाला सह-पायलट एक विशेष अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखता हो, तो भारतीय राजनीति का एक धड़ा तुष्टिकरण के अपने पुराने और घिसे-पिटे ढर्रे पर लौट आता है। भाजपा प्रवक्ताओं और सत्ता पक्ष के नेताओं ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर सीधा हमला बोलते हुए यह आरोप लगाया है कि केवल अपने पारंपरिक वोट बैंक के खिसकने के डर से विपक्ष इस आतंकवादी प्रवृत्ति वाली घटना और पायलट के शौर्य पर कुछ भी बोलने से बच रहा है। यह भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना और त्रासदी है कि जहाँ सामान्य दिनों में अपराधियों और कट्टरपंथियों का कोई धर्म न होने की दुहाई दी जाती है, वहीं एक जांबाज राष्ट्रनायक की सराहना करने के पैमाने भी वोट बैंक के नफ़े-नुकसान से तय होने लगते हैं। अल्पसंख्यक समुदाय के एक वर्ग की संभावित नाराजगी के डर से राष्ट्र के असली नायक की उपेक्षा करना यह साबित करता है कि विपक्ष के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा, गौरव और न्याय से ऊपर अपने चुनावी समीकरणों को सुरक्षित रखना है। एक जांबाज कप्तान जिसने लहूलुहान होकर भी देश का मान बढ़ाया, उसे केवल इसलिए देश के सभी राजनीतिक दलों से एकमुश्त सराहना नहीं मिली क्योंकि उसका मुकाबला करने वाला व्यक्ति एक विशेष पृष्ठभूमि से था। यह चयनात्मक चुप्पी (Selective Silence) केवल एक राजनीतिक भूल नहीं है, बल्कि देश की सामूहिक चेतना और सुरक्षा बलों के मनोबल के साथ एक गहरा विश्वासघात है।
विपक्ष की इस असहजता का दूसरा और अधिक सांस्कृतिक पहलू कैप्टन स्मित मच्छार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच अस्पताल से हुई वीडियो कॉल की बातचीत से जुड़ा है। इस बातचीत के दौरान जब कैप्टन ने यह साझा किया कि उस अत्यंत भयानक और जानलेवा संकट के क्षणों में वे मन ही मन ‘हनुमान चालीसा’ का पाठ कर रहे थे और इसी आत्मबल ने उन्हें विमान पर नियंत्रण बनाए रखने की शक्ति दी, तो इस मुद्दे ने एक पूरी तरह से नया मोड़ ले लिया। जैसे ही किसी घटना में सनातन आस्था, धार्मिक विश्वास और प्रधानमंत्री की सीधी संलिप्तता का समावेश होता है, वैसे ही देश का विपक्ष रक्षात्मक मुद्रा में आ जाता है। वर्तमान राजनीतिक वातावरण में विपक्ष ने भाजपा के ‘हिंदू गौरव’ के आख्यान का मुकाबला करने के लिए खुद को एक ऐसे धर्मनिरपेक्ष ढांचे में कैद कर लिया है, जहां वे बहुसंख्यक समुदाय की आस्था के सार्वजनिक प्रकटीकरण से दूरी बनाना ही अपनी राजनीतिक भलाई समझते हैं। उन्हें यह डर सताने लगा कि यदि वे कैप्टन स्मित की सराहना करेंगे, तो वे अनजाने में भाजपा के उस राष्ट्रवाद और धार्मिक विमर्श को मजबूत कर देंगे जिसे वे लगातार चुनौती देने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन विपक्ष यह समझने में पूरी तरह विफल रहा कि हनुमान चालीसा का पाठ करना कप्तान की व्यक्तिगत आस्था और संकट के समय का आत्मबल था, न कि कोई राजनीतिक बयानबाजी। व्यक्तिगत आस्था को राजनीतिक शत्रुता के तराजू पर तौलना विपक्ष की वैचारिक कमजोरी को दर्शाता है।
इसके अलावा, भारतीय राजनीति में प्रतिद्वंद्विता का स्तर अब इस हद तक व्यक्तिगत और कटु हो चुका है कि ‘पवित्र तटस्थता’ या ‘साझा राष्ट्रीय गौरव’ की अवधारणाएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं। आज के दौर में यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी व्यक्ति, खिलाड़ी, सैनिक या वैज्ञानिक की सराहना करते हैं, तो विपक्ष स्वचालित रूप से उस नायक से दूरी बना लेता है। प्रधानमंत्री के प्रति अत्यधिक विरोध की भावना ने विपक्ष की तार्किक क्षमता को इस कदर प्रभावित किया है कि वे देश के वास्तविक नायकों को भी सत्ता पक्ष का ‘प्रचार तंत्र’ समझने की भूल कर बैठते हैं। वरिष्ठ पत्रकारों और विश्लेषकों ने इस बात को बार-बार रेखांकित किया है कि विपक्ष को यह लगने लगा है कि इस मुद्दे पर खुलकर सामने आने से भाजपा को इसका सीधा चुनावी या राजनीतिक लाभ मिल सकता है। परिणाम यह हुआ कि जिस जांबाज कप्तान की बहादुरी पर पूरे देश को झूमना चाहिए था, उस पर संसद से लेकर सड़क तक एक विभाजनकारी रेखा खींच दी गई। नायक किसी दल के नहीं होते, वे राष्ट्र की संपत्ति होते हैं; लेकिन जब राजनीति इतनी संकीर्ण हो जाए कि नायक की सराहना करने से पहले यह देखा जाए कि उसकी पीठ पर हाथ किसका है, तो समाज का नैतिक ताना-बाना कमजोर होने लगता है।
यह विवाद तब और अधिक गहरा गया जब विपक्ष के कुछ प्रमुख नेताओं द्वारा इस गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए अन्य अनुचित तुलनाएं की जाने लगीं। भाजपा ने विपक्ष को इस बात पर भी आड़े हाथों लिया कि जहां वे देश के लिए अपनी जान की बाजी लगाने वाले एक असली कप्तान स्मित मच्छार पर पूरी तरह मौन रहे, वहीं खेल जगत के कप्तानों या अन्य मनोरंजन अभिनेताओं पर उनकी त्वरित प्रतिक्रियाएं आती रहती हैं। यह प्राथमिकता का विरोधाभास देश की जनता को भी साफ दिखाई देता है। जब जनता यह देखती है कि उनके वास्तविक जीवन के नायक, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का झंडा बुलंद कर रहे हैं और मौत के मुंह से सैकड़ों लोगों को निकाल कर ला रहे हैं, उन्हें राजनीतिक कारणों से उपेक्षित किया जा रहा है, तो राजनीतिक दलों के प्रति आम नागरिक का विश्वास और कम हो जाता है। राष्ट्रवाद और देशप्रेम कोई ऐसी वस्तु नहीं हैं जिन्हें केवल चुनाव के समय भुनाया जाए। यह एक सतत प्रक्रिया है जिसमें देश के हर नागरिक और विशेषकर जनप्रतिनिधियों को अपनी संकीर्णताओं से ऊपर उठकर राष्ट्र के नायकों के सम्मान में खड़ा होना पड़ता है।
अंततः, विपक्ष का यह रवैया उनकी अपनी राजनीतिक जमीन के लिए भी आत्मघाती साबित हो रहा है। देश की बहुसंख्यक जनता, जो सोशल मीडिया और सूचना क्रांति के इस दौर में हर छोटी-बड़ी गतिविधि पर पैनी नजर रखती है, वह इस प्रकार के चयनात्मक मौन को बहुत अच्छी तरह समझती है। जब विपक्ष वास्तविक मुद्दों और राष्ट्रीय गौरव के क्षणों में देश की सामूहिक भावना के साथ सुर में सुर मिलाने से कतराता है, तो वह अनजाने में सत्ता पक्ष को राष्ट्रवाद के मुद्दे पर एकाधिकार सौंप देता है। भाजपा को यह कहने का पूरा अवसर मिल जाता है कि विपक्ष देश के वीरों का सम्मान करना नहीं जानता और उनका राष्ट्रवाद केवल वोट बैंक की सीमाओं तक ही सीमित है। यदि विपक्ष को वास्तव में सत्ता पक्ष के नैरेटिव का मुकाबला करना है, तो उन्हें देश के नायकों को अपनाने का साहस दिखाना होगा। कैप्टन स्मित मच्छार की तारीफ करने से विपक्ष छोटा नहीं होता, बल्कि उनकी लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय परिपक्वता और अधिक सुदृढ़ होती। समय आ गया है कि हमारी राजनीति दलगत सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय गौरव के मुद्दों पर एक सुर में बोलना सीखे, क्योंकि जब देश का नायक जीतता है, तो पूरी व्यवस्था की जीत होती है, और जब राजनीति के कारण उस नायक को अनदेखा किया जाता है, तो पराजय पूरे राष्ट्र की होती है।





