वासुदेव देवनानी
15 अगस्त 1947 को भारत को अंग्रेजी शासन से मिली स्वतंत्रता के पश्चात तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री लोह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने राज्यों के एकीकरण के कार्य को बखूबी से पूरा किया था। इसी क्रम में राजपूताना की विभिन्न रियासतों के विभिन्न चरणों में विलय से 30 मार्च 1949 को आधुनिक राजस्थान का गठन हुआ। 30 मार्च 1949 को हिन्दू नव वर्ष तिथि चैत्र प्रतिपदा थी इसलिए राजस्थान सरकार ने राजस्थान दिवस को तिथि अनुसार मनाने का निर्णय लिया है। इस वर्ष राजस्थान दिवस की तिथि 19 मार्च को है ।
राजस्थान का गठन केवल एक भौगोलिक या प्रशासनिक परिवर्तन नहीं था बल्कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना का एक महत्वपूर्ण क्षण था। बाईस छोटी-बड़ी रियासतों के एकीकरण से बने इस विशाल प्रदेश को लोकतांत्रिक दिशा देने का दायित्व जिस संस्था ने निभाया, वह है राजस्थान की विधानसभा। भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत राजस्थान विधानसभा की प्रथम विधानसभा का गठन 23 फरवरी 1952 को किया गया। राज्य विधानसभा के लिए पहले आम चुनाव 1952 में हुए और जिसमें 160 सदस्य चुने गए थे। राजस्थान विधानसभा की पहली ऐतिहासिक बैठक 29 मार्च 1952 को जयपुर के सवाई मानसिंह टाउन हॉल में आयोजित की गई। यह राज्य की विधायी व्यवस्था की औपचारिक शुरुआत थी जो आज भी राज्य के संसदीय इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय मानी जाती है। प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री टीकाराम पालीवाल बने और नरोत्तम लाल जोशी पहले विधानसभा अध्यक्ष चुने गए। कालांतर में राज्य पुनर्गठन एक्ट 1956 के तहत अजमेर राज्य के राजस्थान में विलय के बाद विधानसभा के सदस्यों की संख्या बढ़ी और समय-समय पर परिसीमन के बाद यह संख्या बढ़ते-बढ़ते वर्तमान 200 सदस्यों की संख्या तक पहुँची है। निकट भविष्य में जनगणना का कार्य पूर्ण होने के उपरान्त भारत सरकार द्वारा कराए जाने वाले परिसीमन के बाद यह संख्या और अधिक बढ़ने की संभावना है।
राजस्थान विधानसभा का अपना गौरवशाली इतिहास रहा है और राजस्थान की स्थापना के पिछले 77 वर्षों में राजस्थान विधानसभा ने अपने करीब 75 वर्षों की यात्रा में राज्य के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास में केंद्रीय भूमिका निभाई है। कानून निर्माण, जनहित के मुद्दों पर विचार विमर्श, प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करने में राज्य विधानसभा का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।
रियासतों से लोकतंत्र तक की ऐतिहासिक यात्रा
राजस्थान बनने से पहले राजपुताना कहा जाने वाला यह क्षेत्र अनेक रियासतों में विभाजित था। शासन व्यवस्था राजाओं और सामंतों के हाथों में थी, जहाँ आम जनता की भागीदारी सीमित थी। स्वतंत्रता के बाद जब इन रियासतों का एकीकरण हुआ और राजस्थान राज्य अस्तित्व में आया, तब भारतीय गणराज्य के अन्तर्गत राजस्थान में भी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था लागू हुई। राज्य में विधानसभा के गठन के साथ ही जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को नीति निर्माण में भागीदारी का अधिकार मिला। यह परिवर्तन राजस्थान के राजनीतिक इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ था। इससे शासन व्यवस्था अधिक जवाबदेह और जनोन्मुख बनी।
कानून निर्माण से सामाजिक बदलाव
राजस्थान विधानसभा का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कानून बनाना है। पिछले सात दशकों में राज्य विधानसभा ने अनेक ऐसे विधेयक पारित किए जिनसे राज्य के सामाजिक और आर्थिक ढांचे में व्यापक परिवर्तन आया है। इसके तहत मुख्य रूप से भूमि सुधार कानूनों ने सामंती व्यवस्था को समाप्त करने और किसानों को अधिकार दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इससे ग्रामीण समाज में सामाजिक समानता को बढ़ावा मिला है। इसके अतिरिक्त विधानसभा में शिक्षा के विस्तार, महिला सशक्तिकरण, अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकारों की रक्षा तथा सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करने के लिए भी कई महत्वपूर्ण कानून बनाए गए। इन कानूनों ने राजस्थान को एक प्रगतिशील और समावेशी समाज की दिशा में आगे बढ़ाया है। साथ ही इन निर्णयों ने राजस्थान को एक आधुनिक और प्रगतिशील राज्य बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
लोकतांत्रिक बहस का सशक्त मंच
राजस्थान विधानसभा लोकतांत्रिक संवाद और बहस का प्रमुख मंच है। यहाँ सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच होने वाली चर्चाएँ लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा को दर्शाती हैं। प्रश्नकाल, शून्यकाल, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव और विशेष चर्चाओं के माध्यम से विधायक सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं। यह प्रक्रिया लोकतंत्र की आत्मा मानी जाती है क्योंकि इसके माध्यम से जनता की आवाज सीधे शासन तक पहुँचती है।
समितियों की प्रभावी निगरानी व्यवस्था
विधानसभा की विभिन्न समितियाँ शासन व्यवस्था की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लोक लेखा समिति, प्राक्कलन समिति और आश्वासन समिति जैसी समितियाँ सरकार की योजनाओं, नीतियों और खर्चों की समीक्षा करती हैं।इन समितियों के माध्यम से प्रशासनिक कार्यों की गहन जांच होती है और शासन को अधिक पारदर्शी तथा जवाबदेह बनाया जाता है।
तकनीकी नवाचार और डिजिटल विधानसभा
समय के साथ राजस्थान विधानसभा ने आधुनिक तकनीक को अपनाकर अपने कामकाज को अधिक प्रभावी बनाया है। ई-विधान प्रणाली के माध्यम से दस्तावेजों को डिजिटल रूप में उपलब्ध कराया गया है, जिससे कागज के उपयोग में कमी आई है और कार्यप्रणाली अधिक व्यवस्थित हुई है। सदन की कार्यवाही का लाइव प्रसारण भी शुरू किया गया है, जिससे आम नागरिक सीधे विधानसभा की गतिविधियों को देख सकते हैं। इससे लोकतंत्र में पारदर्शिता और जनभागीदारी को बढ़ावा मिला है।
युवाओं को लोकतंत्र से जोड़ने की पहल
राजस्थान विधानसभा ने युवाओं और विद्यार्थियों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ने के लिए कई महत्वपूर्ण पहल की गई हैं। छात्र संसद, युवा संवाद और शैक्षणिक भ्रमण जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को विधानसभा की कार्यप्रणाली से परिचित कराया जा रहा है। इन पहलों का उद्देश्य युवाओं में लोकतंत्र के प्रति जागरूकता बढ़ाना और उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए प्रेरित करना है।
सामाजिक सरोकारों के कार्यक्रम
विधानसभा केवल विधायी गतिविधियों का केंद्र नहीं है,बल्कि यह सामाजिक सरोकारों को भी महत्व देती है। संविधान दिवस, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस और लोकतंत्र से जुड़े विशेष कार्यक्रमों का आयोजन कर समाज के विभिन्न वर्गों को लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। हाल के वर्षों में विधानसभा में कई नवाचार करने के गंभीर प्रयास किए गए हैं। इन प्रयासों से विधानसभा को अधिक जनोन्मुख और संवादपरक मंच बनाने की दिशा में नई पहलें शुरू हुई हैं।
पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा
लोकतंत्र की मजबूती पारदर्शिता और जवाबदेही पर निर्भर करती है। राजस्थान विधानसभा ने इस दिशा में भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। सदन की कार्यवाही का प्रसारण, दस्तावेजों की ऑनलाइन उपलब्धता और सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग शासन को अधिक खुला और पारदर्शी बनाता है। इससे आम नागरिकों को यह जानने का अवसर मिलता है कि उनके प्रतिनिधि सदन में किस प्रकार जनता के मुद्दों को उठा रहे हैं और राज्य के विकास से जुड़े निर्णय किस प्रकार लिए जा रहे हैं।
पिछले दो वर्षों में किए गए कई नवाचार
पिछले दो वर्षों में विधानसभा में कई नवाचार करने का प्रयास किया गया हैं। इन प्रयासों से विधानसभा को अधिक जनोन्मुख और संवादपरक मंच बनाने की दिशा में नई पहलें शुरू हुई हैं। विधानसभा में डिजिटल म्यूजियम की स्थापना की गई है जिसमें राजस्थान की स्थापना से पूर्व और पश्चात के सम्पूर्ण इतिहास को दर्शाया गया है। साथ ही राजनैतिक आख्यान संग्रहालय भी स्थापित किया गया है, जिसमें राजस्थान की स्थापना के अब तक के लोकतांत्रिक सफ़र को दर्शाया गया है। इसके तहत राजस्थान के सभी मुख्यमंत्रियों, विधानसभाध्यक्ष,प्रतिपक्ष के नेताओं के बारे में आधिकारिक जानकारी देने के साथ साथ उनकी आदमकद डमी/ बुत भी प्रदर्शित किये गए है। साथ ही विधानसभा के सदन की प्रतिकृति भी बनाई गई है। इस म्यूजियम को जन-दर्शन के लिए खोलने से अब तक पचास हजार से अधिक लोगों को विधानसभा देखने का अवसर मिला है अन्यथा आम लोगों के लिए विधानसभा में प्रवेश एक सपने जैसा ही था। विधानसभा को जन दर्शन के लिए खोलना लोकतंत्र के प्रति आमजन की आस्था का परिचायक बन गया है। विधानसभा में संविधान के सभी 22 चैप्टर की सचित्र गैलेरी, वन्दे मातरम की 150वीं जयन्ती पर वन्दे मातरम दीर्घा और कारगिल शौर्य वाटिका का निर्माण कराने के नवाचार भी किए गए है। विधानसभा का डिजिटलीकरण कर इसे पेपरलैस बनाने तथा समितियों की बैठकों में विधायकों के डिजिटल हस्ताक्षर आदि कई अन्य नवाचार किये गये है। विधानसभा के सदन को गुलाबी नगरी जयपुर की तर्ज पर गुलाबी कार्पेट से सुसज्जित किया गया है।विधानसभा की डायरी को अंग्रेजी वर्ष के पहले माह जनवरी के स्थान पर हिन्हू वर्ष चैत्र प्रतिपदा पर प्रकाशित करने की नई परम्परा शुरू की गई है। साथ ही इस वर्ष अंग्रेजी वर्ष 2026 के कलेंडर को वन्दे मातरम् की ऐतिहासिक यात्रा के घटनाक्रमों को समर्पित किया गया है।
प्रश्नों के शत प्रतिशत जवाब दिलाने का प्रयास
विधानसभा में एक भी प्रश्न का जवाब लम्बित नहीं रहें।इसके लिए पिछले दो वर्षों में गंभीर प्रयास किए गए है जिसके फलस्वरूप लंबित्व प्रश्नों के 97 प्रतिशत जवाब आए है। जनहित के मुद्दों को हल करने के लिए विधायकगण द्वारा लगाये जाने वाले प्रश्नों के शत प्रतिशत जवाब समय पर मंगवाये के प्रयास किए जा रहे है। पिछली विधानसभा में पाँच हज़ार प्रश्नों के जवाब लम्बित थे । उनके जवाब मँगवाने के साथ ही राज्य सरकार और वरिष्ठ अधिकारियों के सहयोग से विधायकग णों के प्रश्नों के जवाब मंगवाने के प्रतिशत को वर्तमान में 97 प्रतिशत तक पहुँचाया गया है तथा अब इसे बढ़ा कर शत प्रतिशत करने का लक्ष्य है ।
लोकतंत्र की सुदृढ़ परंपरा
राजस्थान के गठन के 77 वर्षों की लंबी यात्रा में राजस्थान विधानसभा ने अनेक राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन यहाँ लोकतांत्रिक मूल्यों को सदैव बनाए रखा गया है। यह संस्था समय के साथ बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालती रही है और लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में निरंतर कार्य करती रही है। राजस्थान के राजनीतिक इतिहास में विधानसभा एक ऐसी संस्था के रूप में स्थापित हुई है जिसने जनता और शासन के बीच विश्वास को मजबूत किया है। राज्य विधानसभा राजस्थान की लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रमुख केन्द्र और सशक्त आधार स्तंभ है, जिसने राज्य के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आजादी के बाद जब देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं का निर्माण हुआ, तब राजस्थान भी इस प्रक्रिया से गुजरा। विभिन्न रियासतों के एकीकरण के बाद 1952 में पहली बार राजस्थान विधानसभा का गठन हुआ और लोकतंत्र की इस संस्था ने जनता की आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति देने का काम शुरू किया।प्रारंभिक वर्षों में विधानसभा की कार्यवाही सीमित संसाधनों और पारंपरिक तरीकों से संचालित होती थी, लेकिन समय के साथ-साथ इसमें कई सुधार हुए। राजस्थान विधानसभा ने अनेक ऐतिहासिक विधेयकों को पारित किया, जिनसे राज्य में भूमि सुधार,शिक्षा, कृषि, सिंचाई, उद्योग और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव आए। सदन में होने वाली बहसों ने न केवल राज्य की नीतियों को दिशा दी, बल्कि लोकतांत्रिक परंपराओं को भी मजबूत किया।
विधानसभाध्यक्षों की भूमिका
विधानसभा की गरिमा बनाए रखने में समय-समय पर विभिन्न विधानसभाध्यक्षों ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अध्यक्ष का पद निष्पक्षता, अनुशासन और सदन की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने की जिम्मेदारी से जुड़ा होता है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मेरा प्रयास है कि राजस्थान विधानसभा को भारत की सर्वश्रेष्ठ विधानसभा में शुमार कराया जाए। इसी भावना के साथ विधानसभा में कई नवाचारों की शुरुआत की है, जिनकी चर्चा प्रदेश ही नहीं बल्कि देश की अन्य विधानसभाओं में भी हो रही है।विधानसभा को अधिक जनोन्मुखी और आधुनिक बनाने की दिशा में कई प्रयास किए गए हैं। सदन की कार्यवाही को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनाने के लिए डिजिटल तकनीक के उपयोग को बढ़ावा दिया। विधानसभा की कार्यवाही से जुड़े दस्तावेजों और सूचनाओं को ऑनलाइन उपलब्ध कराने की पहल ने पारदर्शिता को मजबूत किया है। इसके अलावा विधानसभा परिसर में सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़े कार्यक्रमों की शुरुआत भी एक उल्लेखनीय पहल मानी जा रही है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस जैसे अवसरों को विधानसभा में विशेष रूप से मनाना और महिला जनप्रतिनिधियों की भूमिका को रेखांकित करना इसी दिशा का एक उदाहरण है। इससे यह संदेश गया कि लोकतांत्रिक संस्थाएं केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक चेतना को भी प्रोत्साहित करती हैं।युवाओं और विद्यार्थियों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जोड़ने के लिए भी कई कार्यक्रम शुरू किए हैं। विभिन्न शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों को विधानसभा की कार्यवाही से परिचित कराने और उन्हें लोकतंत्र की कार्यप्रणाली समझाने के प्रयास किए जा रहे हैं। इससे नई पीढ़ी में लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ रही है। साथ ही, सदन में अनुशासन और स्वस्थ बहस की परंपरा को मजबूत करने पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। अध्यक्ष के रूप में मेरा यह प्रयास रहा है कि सभी दलों को अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिले और सदन की कार्यवाही गरिमामय ढंग से चले।
विधानसभा की रजत जयंती
आज जब राजस्थान अपने स्थापना के 77 वर्ष पूरे कर अपना रजत जयंती पूरा कर चुका है। इसी दौरान राजस्थान विधानसभा भी अपनी रजत जयंती वर्ष के प्रवेश कर रहा है। राजस्थान विधानसभा ने राज्य के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। पिछले 75 वर्षों में राजस्थान विधानसभा ने राज्य के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास में केंद्रीय भूमिका निभाई है। कानून निर्माण, संसदीय परंपराओं के विकास, जनहित के मुद्दों पर विचार विमर्श, प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करने में और तकनीकी नवाचारों को अपनाने के माध्यम से इस संस्था का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। आने वाले वर्षों में भी राजस्थान विधानसभा लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करते हुए राज्य के विकास और सुशासन की दिशा में मार्गदर्शक की भूमिका निभाती रहेगी ऐसी उम्मीद है।
भावी योजनाएं
इस वर्ष राजस्थान विधान सभा का अमृत महोत्सव पूरे उत्साह के साथ मनाने की योजना बनाई गई है। प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी से प्रेरणा लेकर भारत की आजादी के अमृत महोत्सव की तर्ज पर राजस्थान विधानसभा के अमृत काल का महोत्सव भी पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाया जायेगा। शीघ्र ही उसके चार -पांच बड़े कार्यक्रमों की रूपरेखा भी सामने लाई जाएगी। अमृत महोत्सव के लिए राज्य सरकार द्वारा राज्य बजट में राशि का प्रावधान किया गया है। इसी तरह संसद के संविधान भवन की तर्ज पर राजस्थान विधानसभा में एक सेन्ट्रल हॉल का निर्माण भी कराया जाएगा। राज्य सरकार ने बजट में इसके लिए 14 करोड रूपये की राशि भी पारित कर दी है। साथ ही विधानसभा के वर्तमान सदन की ऊपरी मंजिल पर स्थित विधानपरिषद के हाल का भी नवीनीकरण कर उसे युवा संसद तथा अन्य बड़े कार्यक्रमों में उपयोग लिया जाएगा। राज्य सरकार ने इसके लिए भी बजट प्रस्ताव को मंजूरी दी है । विधानसभा के डिजिटल म्यूजियम में राजस्थान के वर्चुअल टूर के प्रस्ताव को अमलीजामा पहनाने का कार्य भी किया जायेगा। साथ ही देश और प्रदेश के महापुरुषों और विशिष्ठ व्यक्तियों को पुष्पांजलि अर्पित करने उनके आदमकद तेल चित्र भी लगाए जायेगे। साथ ही विधानसभा परिसर में संसद की तर्ज पर प्रेरणा उद्यान बनवा कर उसके महापुरुषों और विशिष्ठ व्यक्तियों की मूर्तियां स्थापित कराने का भी प्रस्ताव है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने विधानसभा में नवाचारों के लिए बजट में कोई कमी नहीं रखने का आश्वासन भी दिया है।
कुल मिलाकर, राजस्थान विधानसभा का इतिहास लोकतांत्रिक विकास की एक महत्वपूर्ण यात्रा का प्रतीक है। वर्तमान समय में विधानसभा में किए जा रहे नवाचार इस संस्था को अधिक आधुनिक, पारदर्शी और जनोन्मुखी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहे हैं। इससे न केवल विधानसभा की कार्यक्षमता बढ़ रही है, बल्कि लोकतंत्र की जड़ें भी और अधिक मजबूत होंगी।
प्रदेश वासियों को मेरी ओर से राजस्थान के 77 वे स्थापना दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। जय जय राजस्थान !!
(लेखक वासुदेव देवनानी राजस्थान विधानसभा के माननीय अध्यक्ष है)





