लापरवाही के भयंकर परिणाम

ओम प्रकाश उनियाल

लापरवाही के परिणामों को भुगतने के बावजूद भी सजग न होना, उस पर अमल न करना या उससे सबक न लेना इंसान की सबसे बड़ी मूर्खता कही जा सकती है। लापरवाही कैसी भी हो, न जाने कितनी जिंदगियां निगल जाती है। मतलब साफ है कि इंसान को इतना घमंड है कि खुद को ईश्वर से भी ऊपर समझने लगा है। जब भी लापरवाही के कारण ऐसी भयानक व ह्रदय-विदारक घटना घटती है तो अक्सर लोगों के मुंह से यही सुना जाता है कि, ‘ये तो ईश्वर की माया है। जो भाग्य में लिखा है होना ही है।’ या ‘जो चला गया अब क्या कर सकते हैं?’ कुल मिलाकर जिसकी लापरवाही के कारण घटना घटी है दोष उस पर नहीं बल्कि भगवान पर मढ़ दिया जाता है। जो कि अदृश्य है। इससे वास्तविक दोषी समाज की निगाहों में निर्दोष बन जाता है। यही हाल हमारी कानून-व्यवस्था व तंत्र का है। जो कि इतना लचर है कि दोषी को जिस प्रकार का दंड मिलना चाहिए वह नहीं मिलता। जांच पर जांच में मामला कब ढीला पड़ जाता है या दबकर रह जाता है पता तक नहीं चलता। इंसान को इतनी सोचने-समझने की शक्ति तो रखनी ही चाहिए कि किसी भी तरह की लापरवाही उसके स्वयं एवं औरों के लिए घातक हो सकती है। पर, अफसोस अपने आप को बुद्धिमान समझने वाला मनुष्य हमेशा ही अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ता आ रहा है। हाल ही में उत्तराखंड के चमोली में एक ऐसी दर्दनाक घटना घटी है जिसमें लापरवाही साफ झलकती है। सीवर ट्रीटमेंट प्लांट में बिजली का करंट दौड़ने से सोलह लोगों की मौके पर तड़प-तड़प कर मौत हो गयी। कुछ घायल हुए। ऐसी ही एक नहीं अनेकों दर्दनाक घटनाएं जगह-जगह घटती रही हैं। इस प्रकार के हादसे अपने पीछे एक ही सवाल छोड़ जाते हैं कि आखिर इंसान कब चेतेगा?