लोकसभा में वक्फ बिल पास होने से पहले एक रात की कहानी

The story of one night before the Wakf Bill was passed in the Lok Sabha

लोकसभा में फिर दिखा ‘56’ का खेला

संजय सक्सेना

वक्फ बोर्ड के नियमों में बदलाव(संशोधन) पर लोकसभा ने मोहर लगा दी है। 56 वोटों के अंतर से लोकसभा में यह बिल पास हो गया। बिल के समर्थन में 288 और विरोध में 232 वोट पड़े। इस तरह से 56 वोटों से विपक्ष ‘मात’ खा गया। वैसे यह 56 का खेल पुराना है। विपक्ष हमेशा मोदी के 56 इंच के सीने की बात करता है,तो सत्ता पक्ष कह रहा है कि मोदी के 56 इंच के सीने का ही कमाल है जो यह बिल बिना किसी अवरोध के पास हो गया। राज्य सभा में भी यह बिल पेश हो चुका है। यहां भी कोई व्यवधान नहीं आयेगा। मोदी सरकार ने वक्फ बोर्ड बिल में जो बदलाव किये हैं उससे गरीब और पिछड़े जैसे पसमांदा मुसलमानों को फायदा मिलना तय है। वहीं वक्फ बोर्ड को अपनी बपौती समझने वाले मठाधीशों पर लगाम कसने के साथ-साथ इनके काले कारमानों की जांच भी कराई जा सकती है।

वक्फ संशोधन बिल लोकसभा से पास हो गया है,लेकिन यहां 01-02 अप्रैल 2025 की रात की भी चर्चा जरूरी है, जब बिल पेश होने से चंद घंटा पूर्व इस बिल में कुछ सबसे अहम बदलाव कर दिये गये थे। इन बदलावों के द्वारा सबसे अहम संशोधन यह शामिल लिया गया कि संरक्षित स्मारकों को वक्फ संपत्ति नहीं माना जाएगा। इस संशोधन के तहत अब तक जिन संरक्षित स्मारकों को वक्फ संपत्ति का दर्जा था, वह खत्म हो जाएगा। इसके अलावा किसी संरक्षित स्मारक को भविष्य में भी वक्फ में शामिल नहीं किया जाएगा। इसके लिए बिल के क्लॉज चार में बदलाव किया गया है। दरअसल कई राज्यों में करीब 200 ऐसे स्मारक पाए गए हैं, जो राज्य सरकार की एजेंसियों या फिर पुरातत्व संरक्षण विभाग द्वारा संरक्षित हैं, लेकिन उन्हें वक्फ की संपत्ति भी माना गया है। अब यह दर्जा समाप्त हो जाएगा। इस बिल से संरक्षित स्मारक पूरी तरह से सरकार के अधीन होंगे। वक्फ ने जिन पर दावा किया है कि उनमें दिल्ली का पुराना किला, कुतुब मीनार, सफदरजंग का मकबरा और हुमायूं का मकबरा शामिल हैं। उत्तर प्रदेश में जिला संभल की जामा मस्जिद शामिल है। अब वक्फ बोर्ड के यह सब दावे निरस्त हो सकते हैं।

दूसरे अहम बदलाव की बात करें तो यह आदिवासी समाज से जुड़ा था, जिसकी लोकसभा में सत्ता पक्ष के सदस्यों ने खूब वाहवाही की। बिल पेश होने की रात में जो संशोधन जोड़ा गया उसमें यह स्पष्ट किया गया कि किसी भी आदिवासी इलाके की जमीन को वक्फ संपत्ति घोषित नहीं किया जा सकेगा। बिल में प्रावधान किया गया है कि संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची के मुताबिक जिस भूमि को आदिवासी क्षेत्र घोषित किया गया है, वहां की किसी संपत्ति को वक्फ में शामिल नहीं किया जाएगा। सत्ता पक्ष का कहना है कि ऐसा इसलिए किया गया ताकि आदिवासी संस्कृति का संरक्षण किया जा सके और उनके हितों की रक्षा हो।

लोकसभा में बिल पेश किये जाने से कुछ घंटे पूर्व किये गये तीसरे बदलाव को भी बहुत खास माना जा रहा है जिसके अनुसार वक्फ बोर्ड के फैसलों की सरकारी स्तर पर स्क्रूटनी हो सकेगी। अब वक्फ बोर्ड की ओर से पारित किसी भी प्रस्ताव के लिए 45 दिन की समय सीमा होगी। यानी वक्फ के फैसले जस के तस तुरंत लागू नहीं होंगे। इसकी बजाय 45 दिन की एक अवधि होगी और इस दौरान जिलाधिकारी की ओर से उसकी समीक्षा की जाएगी। सरकार के सूत्रों का कहना है कि इन बदलावों को 01 अप्रैल की रात को ही बिल में शामिल किया गया और फिर बुधवार 02 अप्रैल की सुबह ही इसकी कॉपी संसद के सभी सदस्यों को दी गई। इसी को लेकर विपक्ष हंगामा खड़ा कर रहा था कि उसे पूरा बिल पढ़ने का समय ही नहीं मिला। कुल मिलाकर ऐन वक्त पर किये गये यह बदलाव वक्फ बिल कानून में मील का पत्थर साबित हो सकता है।