कहानी: तीज का झूला और माई का आशीर्वाद

Story: Teej's swing and Maai's blessings

डॉ. सत्यवान ‘सौरभ’

सावन की रिमझिम बारिश, खेतों की हरियाली, पीपल के पेड़ पर पड़े झूले, और औरतों के गीतों की गूंज — ये सब मिलकर तीज को सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक भावनात्मक अनुभव बना देते हैं। हर औरत के जीवन में तीज की एक अपनी कहानी होती है — कुछ के लिए यह श्रृंगार का पर्व है, कुछ के लिए यादों का झूला, और कुछ के लिए एक मौका अपनी अस्मिता को फिर से पहचानने का।

यह कहानी एक ऐसी ही स्त्री की है — राधा, जो परंपराओं के बीच अपनी आवाज़ को तलाशती है। यह कहानी सिर्फ तीज मनाने की नहीं, बल्कि मां-बेटी के रिश्ते, ससुराल की रूढ़ियों और एक स्त्री की आत्मसम्मान की भी है।

गांव के पूरब छोर पर एक पीपल का पेड़ था — बहुत पुराना, बहुत विशाल। सावन की पहली बूंद गिरते ही उस पर झूले बंध जाते थे। गांव की औरतें लाल-हरे रंग की साड़ियों में सजकर झूला झूलतीं, गीत गातीं —
“झूला पड़ा पीपल के नीचे, साजन आयो सपना रीचे…”

राधा की मां, शारदा देवी, हर साल इसी पेड़ के नीचे झूला डालती थीं। कभी राधा अपनी सहेलियों संग घंटों झूला झूलती थी। सावन के गीले दिन, गुझियों की मिठास, और माँ के हाथों की मेंहदी — राधा की बचपन की तीजें इनकी गोद में पली थीं।

पर अब वो सब बीते कल की बात थी।

राधा का ब्याह तीन साल पहले शहर के एक खाते-पीते परिवार में हुआ था। पति सुलझा हुआ था, पर सास-ससुर पुराने विचारों के थे। बहू को मायके भेजना उन्हें ठीक नहीं लगता। उन्हें लगता कि लड़की मायके जाकर बिगड़ जाती है।

तीन सालों में राधा को तीज पर मायके आने की इजाजत नहीं मिली थी।

शारदा देवी हर साल तीज के करीब आते ही अपने आंगन में झूला डाल देतीं। एक बार फिर इस साल भी सावन आया। गांव की औरतें पीले-हरे रंग की साड़ियाँ पहनकर शृंगार कर रही थीं। झूले पर गीतों की गूंज थी। लेकिन शारदा देवी के आंगन में सिर्फ सन्नाटा था।

शाम को उन्होंने तांबे की थाली में गुझिया सजाई, घेवर पर मलाई डाली, और एक छोटी कटोरी में सिंदूर रखा।
“इस बार राधा ज़रूर आएगी,” उन्होंने खुद से कहा।

पर कोई डाक नहीं आई। कोई संदेश, कोई फोन नहीं।

हर साल की तरह इस साल भी आंखें दरवाजे की ओर सूनी रहीं।

राधा का मन बेचैन था। सास ने सुबह ही कहा था –
“तीज का व्रत करना है तो करो, लेकिन मायके जाने का नाम मत लेना। हम कोई गंवार नहीं हैं कि हर साल बेटी को भेज दें। ससुराल में ही साज-श्रृंगार करो।”

राधा ने चुपचाप अपनी साड़ी तह की, मेंहदी की डिब्बी उठाई और छत पर चली गई। लेकिन छत से दिखते आसमान में मां की झुकी आंखें और पीपल का झूला ही नजर आता रहा।

आखिर राधा ने निर्णय लिया।

सास-ससुर से बिना कहे, पति को एक चिट्ठी छोड़कर, राधा अपने गांव के लिए निकल पड़ी। एक पुरानी साड़ी में, कंधे पर छोटा सा बैग लिए। कोई जेवर नहीं, कोई दिखावा नहीं — सिर्फ दिल में एक तमन्ना: माँ की गोद में तीज मनाने की।

बस बदलते हुए, खेतों से गुज़रते हुए, राधा ने कई और औरतों को देखा — कुछ पति के साथ, कुछ सहेलियों के संग। सबके चेहरे पर सावन की मुस्कान थी, पर राधा की मुस्कान थोड़ी डरी हुई थी – जैसे डर को ही मात देने चली हो।

गांव पहुंचते ही राधा के कदम सीधे पीपल की ओर चले। पर वहां न कोई झूला था, न कोई हंसी।

“माई!” – जैसे ही आवाज आई, शारदा देवी चौके से बाहर दौड़ीं।

कुछ पलों तक मां-बेटी बस एक-दूसरे को देखती रहीं। और फिर शारदा देवी ने राधा को सीने से लगा लिया।
“बिटिया… तू आ गई?”

राधा की आंखों से आंसू बहने लगे — वो आंसू जो तीन तीजों से थमे हुए थे।

राधा ने आंगन को फिर से सजाया। मां ने पीपल के पेड़ के नीचे झूला बांधा। राधा ने झूला झूला, गीत गाए, गुझिया खाई, और सिन्दूर से मांग भरी।

माँ ने कलाई पर राखी की तरह हरी चूड़ियाँ पहनाई और कहा —
“तेरे आने से मेरी तीज पूरी हुई। बेटियाँ त्योहार लेकर आती हैं, और तू तो अपने साथ मेरी सांसें भी ले आई।”

राधा ने पहली बार महसूस किया कि तीज का असली श्रृंगार माँ के आंचल से होता है।

तीज की रात राधा ने माँ से कहा,
“माँ, क्या मैं वापस जाऊं? क्या ये गलत था?”

शारदा देवी ने राधा का माथा चूमते हुए कहा —
“बिटिया, तीज सिर्फ पति की लंबी उम्र का व्रत नहीं है। ये एक स्त्री के भाव, उसके रिश्ते, और उसकी पहचान का उत्सव है। अगर एक औरत अपनी खुशी के लिए कदम बढ़ाए, तो वो गलत नहीं — वो साहस होता है।”

“तू लौट जा, लेकिन सिर झुकाकर नहीं, सिर उठाकर। तुझे जो समझना है, वो तुझे समझाएगा। और अगर न समझे, तो तू खुद को मत खोना।”

तीज की अगली सुबह राधा ने माँ को गले लगाकर विदा ली। इस बार हाथ में सिर्फ झोला नहीं था, मन में आत्मविश्वास भी था।

गांव की पगडंडी पर चलते हुए राधा ने पीपल के पेड़ को देखा। झूला हवा में हिल रहा था — जैसे उसे आशीर्वाद दे रहा हो।

तीज अब राधा के लिए सिर्फ व्रत का दिन नहीं था। यह एक संकल्प बन चुका था — खुद को समझने, माँ से मिलने, और अपनी बात कहने का।

यह कहानी हर उस औरत की है जो तीज पर सिर्फ श्रृंगार नहीं, स्वाभिमान भी पहनती है।

सीख और संदेश
तीज एक स्त्री के भीतर के प्रेम, त्याग और साहस का पर्व है।

हर लड़की को अपना मन और अपनी इच्छाएं अभिव्यक्त करने का अधिकार है।

मां की गोद, बेटी की हिम्मत, और समाज की समझ — ये तीनों मिलें तो हर तीज सचमुच पावन हो।