
इंद्र वशिष्ठ
दिल्ली पुलिस का कमिश्नर इस बार एजीएमयूटी काडर के ही किसी आईपीएस को बनाया जाता है या दूसरे काडर के आईपीएस को। यह आने वाले दिनों में साफ़ हो जाएगा।
कमिश्नर कोई भी बने पर सही मायने में वह काबिल जरूर होना चाहिए। प्रोफेशनली स्ट्रांग या लडडू खाने वाला नहीं होना चाहिए।आजकल पुलिस में यदि कोई अफसर नाकाबिल, नालायक और बेईमान है, लेकिन जुगाड़/लडडू के दम पर लगातार महत्वपूर्ण/ मलाईदार पद पाता रहता है तो उसे सीधे सीधे बेईमान कहने की बजाए सभ्य भाषा में प्रोफेशनली स्ट्रांग कहने का रिवाज चलन में है। दूसरी ओर सही मायने में काबिल और ईमानदारी से कर्तव्य पालन करने वाले को बेचारा, शरीफ, कमज़ोर, नादान और मूर्ख तक कहा जाता है।
सत्ता के मन भाए, कमिश्नर बन पाए-
बेशक आईपीएस अपने को कितना ही काबिल समझते/मानते हों, लेकिन अगर सत्ता की कृपा आप पर नहीं है तो सारी काबलियत धरी की धरी रह जाती है वह सब बेकार साबित हो जाती है। काबलियत पर कृपा हावी हो जाती है। जो गृह मंत्री के मन भाया, वो ही कमिश्नर पद पाया।
आईपीएस के साथ अन्याय-
पहले गुजरात काडर के राकेश अस्थाना को और फिर तमिलनाडु काडर के संजय अरोरा को दिल्ली पुलिस का कमिश्नर बना कर प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने लगातार दो बार यह साबित कर दिया।
मोदी, शाह को एजीएमयूटी काडर में क्या एक भी ऐसा काबिल आईपीएस अफसर नहीं मिला, जिसे दिल्ली पुलिस का कमिश्नर बनाया जा सके। एजीएमयूटी काडर के आईपीएस अफसरों का हक मार कर उनके साथ अन्याय किया गया। वैसे भाजपा द्वारा पिछले 25 साल में तीन बार ऐसा किया गया।
पतन का कारण-
वैसे सीधे केंद्रीय गृह मंत्री के अंतर्गत/ संपर्क में रहने के कारण एजीएमयूटी काडर के आईपीएस अन्य काडर के आईपीएस से अपने को श्रेष्ठ समझने के भ्रम जीते हैं। इनका ये भ्रम टूटना भी जरूरी था। खुद को श्रेष्ठ और दूसरे काडर के आईपीएस को तुच्छ समझने का अहंकार भी इनके पतन का एक मूल कारण है।
नाकाबिल हैं तो नौकरी से भी निकालो-
सरकार की नजर में अगर एजीएमयूटी काडर के जो आईपीएस अफसर वरिष्ठ होते हुए और रिकॉर्ड आदि में भी सब कुछ साफ/ सही होते हुए भी कमिश्नर बनाने के काबिल नहीं होते, तो फिर वह पुलिस सेवा में भी क्यों हैं, सरकार उन्हें जबरन सेवा से रिटायर कर हटा क्यों नहीं देती ? ऐसे नाकाबिल अफसरों को स्पेशल कमिश्नर जैसे पदों पर रखना भी तो गलत ही है।
सत्ता के लठैत कमिश्नर ? –
दरअसल कमिश्नर के पद पर पहले एजीएमयूटी काडर के कुछ ऐसे नाकाबिल आईपीएस भी अफसर रह चुके हैं। जिन्होंने सत्ता के लठैत बन खाकी को खाक में मिला दिया। ऐसे तत्कालीन कमिश्नरों के कारण ही पुलिस में भ्रष्टाचार व्याप्त है। ये कमिश्नर अपराध और अपराधियों पर अंकुश लगाने में भी विफल रहे। पेशेवर रुप से नाकाबिल कमिश्नरों के कारण ही आईपीएस अफसर और मातहत पुलिसकर्मी भी निरंकुश हो जाते हैं। जिसका खामियाजा जनता को भुगतना पड़ता हैं। आज भी हालत यह है कि लूट, झपटमारी आदि अपराध की सही एफआईआर तक दर्ज नहीं की जाती है। अपराध कम दिखाने के लिए अपराध को दर्ज ना करने या हल्की धारा में दर्ज किए जाने की परंपरा जारी है। थानों में लोगों से पुलिस सीधे मुंह बात तक नहीं करती। एसएचओ, डीसीपी या अन्य वरिष्ठ अफसरों से मिलने के लिए भी पीड़ित व्यक्ति को सिफारिश तक करानी पड़ती है।
कमिश्नर कैसा हो ? –
गृहमंत्री अमित शाह को इस बार कम से कम ऐसा कमिश्नर तो लगाना ही चाहिए, जो अपराध और अपराधियों पर नियंत्रण करे और पुलिस में चरम पर पहुंच गए भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाए।
एफआईआर दर्ज न करना अपराध हो-
गृह मंत्री अमित शाह ने कुछ दिन पहले कहा कि कानून व्यवस्था मजबूत बनाने के लिए अपराधों का दर्ज होना ज़रूरी है, इसलिए एफआईआर दर्ज करने में किसी तरह की देरी नहीं होनी चाहिए।
गृह मंत्री अगर अपराधों को दर्ज कराने को लेकर वाकई गंभीर हैं, तो अपराधों को दर्ज न करने वाले पुलिस अफसर के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज किए जाने का कानून बनाया जाना चाहिए।
मिसाल बनाएं- गृहमंत्री को सबसे पहले दिल्ली में ही यह सुनिश्चित करना चाहिए, कि सभी अपराधों की सही और बिना देरी के एफआईआर दर्ज हो। दिल्ली में ऐसा कमाल करके वह देश भर की पुलिस के सामने मिसाल पेश कर सकते हैं।
आंकड़ों की बाजीगरी-
सच्चाई यह है कि अपराध को आंकड़ों की बाजीगरी के माध्यम से कम दिखाने के लिए पुलिस में बरसों से ही अपराध के सभी मामलों को सही दर्ज न करने या हल्की धारा में दर्ज करने की परंपरा है। लोगों को एफआईआर दर्ज कराने के लिए अदालत तक में गुहार लगानी पड़ती है। अपराध को दर्ज ना करके तो पुलिस एक तरह से अपराधियों की ही मदद करने का गुनाह ही करती है।
एक ही रास्ता-
अपराध और अपराधियों पर नियंत्रण करने का सिर्फ और सिर्फ एकमात्र रास्ता अपराध के सभी मामलों की सही एफआईआर दर्ज करना ही है। अभी तो हालत यह है कि मान लो अगर कोई लुटेरा पकड़ा गया, जिसने लूट/ स्नैचिंग/ झपटमारी की 100 वारदात करना कबूल किया है। लेकिन एफआईआर सिर्फ दस-बीस वारदात की ही दर्ज पाई गई।
इसलिए ऐसा कमिश्नर लगाया जाना चाहिए जो यह सुनिश्चित करें कि अपराध के सभी मामलों की सही एफआईआर दर्ज की जाए।
लोगों के साथ सीधे मुंह बात तक न करने के लिए बदनाम पुलिस के व्यवहार को सुधारने के लिए ठोस/प्रभावी कदम उठाए।
लोग घर और बाहर (सड़क) सुरक्षित महसूस करे। अपराधियों के मन में पुलिस का खौफ हो।
गृहमंत्री के पास कुंडली-
वैसे कमिश्नर पद के लिए जो भी दावेदार हैं वह कितने ईमानदार/ बेईमान, काबिल /नाकाबिल है। ये बात गृह मंत्री से तो बिल्कुल भी छिपी हुई नहीं होती। खुफ़िया तंत्र के माध्यम से आईपीएस की पूरी कुंडली गृह मंत्री के पास पहुंच ही जाती है।
लडडू खाएं हैं तो खिलाने भी पड़ेगें-
आपने दूसरों से लडडू खाए हैं, तो आपको खिलाने भी पड़ेंगे। आप दूसरे की बरात में गए हैं तो अपनी बरात में उसे ले जाना भी पड़ेगा। यह समाज का दस्तूर है और सब इससे बंधे हुए हैं। इसी तरह अगर आपने अपने मातहत से लडडू खाएं हैं तो मातहत को उसके मन मुताबिक मलाईदार/ महत्वपूर्ण पद रुपी लडडू देना भी पड़ेगा। बरसों बरस से ऐसा ही हो रहा है इसलिए भ्रष्टाचार पर अंकुश लगने की बजाए भ्रष्टाचार दिनों दिन फल फूल रहा है
कमिश्नर वही, जो लडडू न खाएं-
क्या भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए ही दिल्ली पुलिस में अरुणाचल, गोवा मिजोरम और केंद्र शासित प्रदेश (एजीएमयूटी )काडर की बजाए दूसरे के काडर के आईपीएस अफसर को कमिश्नर के पद पर लगाया जाता है ? दूसरे काडर के आईपीएस को कमिश्नर के पद पर तैनात किए जाने का एक तर्क (लडडू वाला) पुलिस में यह भी दिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि दूसरे काडर से आए आईपीएस ने क्योंकि दिल्ली पुलिस में किसी से लडडू नहीं खाए हुए होते, इस लिए वह बिना किसी राग-द्वेष, भय-लालच के निष्पक्षता, पारदर्शिता, ईमानदारी के साथ अपना काम कर सकता है।
लेकिन दूसरे काडर का आईपीएस तो बिल्कुल दूध का धुला हुआ ही होगा और अपने राज्य/काडर में उसने लडडू नहीं खाए होंगे, या कमिश्नर बनने के बाद वह लडडू नहीं खाएंगे इसकी क्या गारंटी है।
भ्रष्टाचार चरम पर- तमिलनाडु काडर से आए कमिश्नर संजय अरोरा के समय में तो पुलिस में भ्रष्टाचार चरम पर पहुँच गया। रिश्वतखोर पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी के पिछले साल के आंकड़ों से भी पता चलता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में तीन गुना वृद्धि हुई है।
आईपीएस जिम्मेदार- सच्चाई यह भी है संजय अरोरा और राकेश अस्थाना के कमिश्नर बनने से पहले तो इस पद एजीएमयूटी काडर के ही कमिश्नर रहे हैं। इस लिए भ्रष्टाचार जो आज चरम पर है। उसके लिए तत्कालीन कमिश्नर और कुछ आईपीएस अफसर ही असली जिम्मेदार है। इन अफसरों ने अगर ईमानदारी से अपने कर्तव्य का पालन किया होता तो भ्रष्टाचार का पेड़ इतना फलता फूलता नहीं। संजय अरोरा के समय में तो सिर्फ भ्रष्टाचार के फलों से लदे पेड़ से पके हुए फल गिरने के कुछ मामले ही सामने आए हैं। पेड़ तो अभी भी फलों से लदे हुए खड़े हैं।
आज भी सिर्फ कमिश्नर संजय अरोरा ही तो बाहरी काडर के हैं। डीसीपी से लेकर स्पेशल कमिश्नर तक के सभी पदों पर तो एजीएमयूटी काडर के आईपीएस ही है। इसलिए भ्रष्टाचार के लिए सिर्फ बाहरी काडर के कमिश्नर को ही अकेला दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
कुछ नहीं बदलेगा –
कमिश्नर पद की दौड़ में शामिल आईपीएस अफसर क्या कमिश्नर बनने के बाद अपराध के सभी मामलों की सही एफआईआर दर्ज कराएंगे ? क्या भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए ईमानदारी से ठोस कदम उठाएंगे ?
ऐसा बिल्कुल नहीं होगा। क्योंकि पुलिस में भ्रष्टाचार इतने चरम पर पहुंच गया है कि अगर किसी लडडू खाने वाले को कमिश्नर बनाया गया, तो हालात बद से बदतर ही हो जाएगी।
निरंकुश- आज हालात ये है कि कुछ वरिष्ठ आईपीएस अफसरों और डीसीपी आदि के कुछ पालतू/खास चौकी इंचार्ज अपने एसएचओ को, एसएचओ अपने एसीपी को कुछ नहीं समझते। ये पालतू अपनी पोस्टिंग खुद तय करते हैं। गृहमंत्री के निर्देश के बावजूद मकान बनाने वालों से पुलिस वालों की वसूली बदस्तूर जारी है।
उम्मीद- केवल साफ़ नीयत और ईमानदारी से कर्तव्य पालन करने वाले काबिल, निष्ठावान आईपीएस ही बुरी तरह सड़ चुके पुलिस सिस्टम में सुधार कर सकते हैं।
मिसाल- अपराध के सभी मामलों की सही एफआईआर दर्ज कराने के लिए सिर्फ एजीएमयूटी काडर के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर भीम सेन बस्सी और वी एन सिंह ने ही ईमानदारी से कोशिश की थी। उस दौरान के आंकड़ों से यह बात साफ साबित होती है। इन दोनों के अलावा बाकी कमिश्नर/ आईपीएस तो आंकड़ों की बाजीगरी से अपराध कम दिखाने की परंपरा का पालन करते रहे और कर रहे हैं।
कमज़ोर कमिश्नर –
कुछ आईपीएस अफसरों द्वारा संजय अरोरा की छवि एक ऐसे कमजोर/शरीफ/नाकारा कमिश्नर के रूप पेश की जाती है,जो धृतराष्ट्र बन कर पूरी तरह से अपने एसओ/डीसीपी मनीषी चंद्र पर आंख मूंद कर निर्भर हैं।
लेकिन इस तरह की छवि बनाने वाले आईपीएस को पहले अपने गिरेबान में भी झांक लेना चाहिए। शायद ही ऐसा कोई आईपीएस होगा, जिसने अपने निजी हितों/ कार्यों / सीक्रेट टारगेट के लिए खास पुलिसकर्मियों को नहीं रखा हुआ।
मातहत के वश में आईपीएस-
रिटायर होते ही जबरदस्त चर्चा में आए स्पेशल कमिश्नर रणवीर सिंह कृष्णियां के मातहत रहे इंस्पेक्टर विकास, तत्कालीन स्पेशल कमिश्नर (कानून एवं व्यवस्था) दबंग दीपक मिश्रा के मुंह लगे अजय और सख्त माने जाने वाले तत्कालीन कमिश्नर युद्ध बीर सिंह डडवाल के मातहत रहे महाना को ये आईपीएस क्या इतनी जल्दी भूल गए। उपरोक्त आईपीएस तो कमज़ोर नहीं थे फिर किस निजी स्वार्थ या किन विशेष खूबियों के कारण ये अपने एसओ/ पीए आदि के वश में हो गए। ये तो सिर्फ कुछ उदाहरण हैं वरना ऐसे अफसरों और उनके मुंह लगो की अंतहीन फेहरिस्त है।
मुंह लगा ही मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ेगा –
वैसे ऐसी छवि बनने देने के लिए कमिश्नर और वह आईपीएस खुद ही जिम्मेदार होते हैं वह न जाने अपने किस निजी स्वार्थ/राज के कारण एसओ/पीए या अपने मुंह लगे किसी अन्य मातहत को इतनी छूट दे देते हैं कि मातहत अपनी हैसियत/हद भूल कर खुद को ही कमिश्नर/ आईपीएस समझने लग जाते है। हैसियत भूल कर व्यवहार करने वाला मातहत ही अपने आका आईपीएस की बदनामी का कारण बनता है।
सबके अपने अपने पालतू –
पुलिस में सबको पता होता है कि किस अफसर से उसका कौन मुंह लगा मातहत काम करवा सकता है।
ज्यादातर आईपीएस/दानिप्स अफसर जब दिल्ली पुलिस में प्रोबेशन पर आते है। तभी से वह अपने साथ ऐसे विशेष खूबियों वाले पुलिसकर्मियों को जोड़ लेते है या पुलिसकर्मी उनके साथ जुड़ जाते हैं। आईपीएस अपनी पूरी नौकरी के दौरान उसे साथ जोड़े रखते हैं। अगर आईपीएस अधिकारी का दिल्ली से बाहर तबादला हो गया है तब भी वह मातहत दिल्ली में उसके घर परिवार की सेवा में रहते हैं।
कोई नादान नहीं हैं – कोई भी कमिश्नर और आईपीएस अफसर इतना कमज़ोर/शरीफ/नादान/ मूर्ख तो बिल्कुल नहीं होता कि वह अपना निजी फायदा नुकसान सोचे समझे बिना, सिर्फ अपने मातहत के कहने भर पर ही किसी को एसीपी, एसएचओ, चौकी इंचार्ज या अन्य महत्वपूर्ण और मलाई दार माने जाने वाले पद पर लगा या हटा दे।
कमिश्नर बनाने का एक ही पैमाना-
पिछले लगभग पैंतीस साल में इस पत्रकार ने देखा कि ज्यादातर मामलों में कमिश्नर का पद पाने का सिर्फ और सिर्फ एक ही पैमाना है सत्ताधारी दल की कृपा। वह आईपीएस काबिल और ईमानदार है या नहीं, सत्ता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता (लेकिन जनता को फर्क पड़ता है)। इसलिए जिसे मन चाहे उसे कमिश्नर बना देते हैं। सत्ता में चाहे किसी दल की सरकार हो पैमाना एक ही रहता है। सब अपने चहेते/वफ़ादार को ही कमिश्नर बनाते हैं। जो चालाक अफसर हैं वह यह जानते हैं और अपने लक्ष्य को पाने के लिए बरसों पहले से ही अपने आकाओं की शरण में पहुंच जाते हैं। आखिर एक दिन तपस्या का मनचाहा फल मिल ही जाता है।
विवादों के कारण सुर्खियों में रहे राकेश अस्थाना मोदी और शाह के मन भाए / खासमखास थे सिर्फ इसलिए उन्हें रिटायरमेंट से ठीक चार दिन पहले सेवा विस्तार देकर दिल्ली पुलिस का कमिश्नर बनाया गया। राकेश अस्थाना ने पुलिस कंट्रोल रूम यानी पीसीआर यूनिट को ही खत्म कर दिया। पीसीआर वैन और उसके स्टाफ़ को थानो और जिलों में लगा दिया।
तमिलनाडु काडर के संजय अरोरा ने कमिश्नर बनने के बाद पुराने पीसीआर सिस्टम को फिर से बहाल कर राकेश अस्थाना की काबलियत पर ही सवालिया निशान लगा दिया।
गृह मंत्री मिसाल बनाएं –
गृहमंत्री अमित शाह ने लगातार दो बार दूसरे काडर के आईपीएस को कमिश्नर बना कर एक तरह से उनका हक छीन लिया। यह ठीक नहीं है क्योंकि इससे यह संदेश जाता है कि एजीएमयूटी काडर के आईपीएस तो कमिश्नर बनने के काबिल ही नहीं है। जो कि पूरी तरह सच नहीं है।
लाख कमियों के बावजूद भी एजीएमयूटी काडर में पहले भी बहुत ही काबिल, शानदार और मिसाल देने लायक आईपीएस अफसर भी रह चुके हैं। जिनकी पेशेवर काबलियत और बहादुरी का यह पत्रकार भी दशकों से चश्मदीद गवाह रहा हैं। इस काडर में अब भी काबिल अफसरों की कमी नहीं है। हरेक काडर के आईपीएस का सपना/ लक्ष्य अपनी पुलिस फोर्स का मुखिया बनने का होता है।
इसके पहले भी भाजपा के शासन काल में उत्तर प्रदेश काडर के अजय राज शर्मा को दिल्ली पुलिस कमिश्नर के पद पर तैनात किया गया था। हालांकि दबंग अजय राज शर्मा को अब तक का सबसे काबिल और सफल कमिश्नर माना जाता है।
वैसे दूसरे काडर का आईपीएस ही काबिल और ईमानदार होगा और एजीएमयूटी काडर के सारे नाकाबिल/निकम्मे और बेईमान है यह भी पूरी तरह सच नहीं है। यह भी सच है कि लडडू न खाने वाले तो विरले ही होते हैं।
गृहमंत्री द्वारा दूसरे काडर से अपने किसी खास आईपीएस को लाकर कमिश्नर बना देना तो बहुत आसान काम है। ये काम तो राजनीतिक दल बरसों से करते ही आए है।
लेकिन गृह मंत्री की काबलियत तो इस बात से पता चलेगी, कि वह एजीएमयूटी काडर में से ही किसी काबिल आईपीएस को कमिश्नर बनाए। इसके बाद गृह मंत्री अपनी निगरानी में उस कमिश्नर से ही पुलिस में आमूल चूल सुधार करवा कर मिसाल बनाए।
गृह मंत्री जिम्मेदार –
दिल्ली पुलिस सीधे सीधे गृहमंत्री के अन्तर्गत ही है। ऐसे में अगर एजीएमयूटी काडर में से उन्हें एक भी आईपीएस कमिश्नर पद के योग्य नहीं लगता है तो इस हालात के लिए वह भी जिम्मेदार है। इससे उनकी काबलियत और भूमिका पर भी सवालिया निशान लग जाता है।
क्योंकि जैसे जब कोई बच्चा बिगड़ जाता है तो उसके माता पिता को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है। यही कहा जाता है बच्चे पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया या जरूरत से ज्यादा लाड प्यार करके उसे बिगाड़ दिया।
इस लिए गृह मंत्री अगर वाकई दिल्ली पुलिस में सुधार करना चाहते हैं तो उन्हें आईपीएस अफसरों की गतिविधियों पर तो खास ध्यान देना चाहिए।
कमिश्नर और आईपीएस अफसर अगर सही नीयत और ईमानदारी से काम करें तो थाना स्तर तक भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सकता है।
ईमानदार हो तो ईमानदारी नज़र आना ज़रूरी है –
कुछ ऐसे अफसर भी होते है जिन्होंने अपनी ईमानदारी या कह लो कि ,बेईमानी के लिए एक सीमा/परिभाषा/ लक्ष्मण रेखा तय कर रखी है। सीमा में रह कर लडडू खाने वाले खुद अपने मुंह से अपने ईमानदार होने का ढिंढोरा पीटते रहते हैं।
जबकि जो वाकई ईमानदार होता है उसे ढिंढोरा पीटने की जरूरत नहीं होती। वैसे आईपीएस ईमानदार है तो ईमानदारी नजर आना ज़रूरी है।
इस पत्रकार ने तीन दशक से ज्यादा के समय में ऐसे अनेक आईपीएस को बहुत नजदीक से देखा है। लेकिन आज तक ऐसा कोई अफसर नहीं मिला, जो ईमानदारी की कसौटी पर पूरा खरा उतर सके।
कसौटी- सिर्फ रिश्वत लेना ही भ्रष्टाचार/बेईमानी नहीं होता। पुलिस अफसर ने अगर अपने कर्तव्य का पालन ईमानदारी से नहीं किया, जिस व्यक्ति का जो अधिकार है वह उसे नहीं दिया, अपराध के मामले को दर्ज ही नहीं किया, किसी के खिलाफ झूठा मामला दर्ज करना, किसी बेकसूर को फंसाना/ गिरफ्तार करना, अपराधियों से सांठगांठ करने वाले मातहत पुलिसकर्मी को बचाना आदि तो भ्रष्टाचार ही नहीं बल्कि संगीन अपराध भी है। आईपीएस अफसरों द्वारा घरेलू/पारिवारिक काम के लिए पुलिसकर्मियों को रखना। सरकारी कारों का जमकर परिवार के लिए इस्तेमाल करना भी भ्रष्टाचार/ बेईमानी ही होता है। रिटायर्ड आईपीएस अफसरों द्वारा भी पुलिस की कार/ ड्राइवर/ रसोईया आदि रखने के मामले समय समय सामने आते रहते हैं।
लडडू खाने खिलाने का सिलसिला-
कुछ आईपीएस जब एसीपी के पद से अपनी शुरुआत करते है तभी से वह लडडू खाना शुरू कर देते है। यह सिलसिला उनके स्पेशल कमिश्नर बनने तक जारी रहता है। इस दौरान लडडू खिलाने वालों को लगातार मलाई दार पद मिलते रहते है यही नहीं उनके खिलाफ आई गंभीर भ्रष्टाचार या अपराधी से मिलीभगत की शिकायतों पर लडडू खाने वाले अफसर कोई कार्रवाई न करके अपने लडडू धर्म का पालन करते हैं।
ईमानदारी की कसम ताक पर रखी-
अफ़सोस यह देख कर होता है कि अपनी मेहनत से आईपीएस बनने वाला लालच के कारण खुद को कितना गिरा देता है।
इसी तरह जो आईपीएस जीवन भर मनचाहा पद पाने के लिए सत्ता के सामने दंडवत रहता है उसकी तपस्या का मुख्य लक्ष्य होता है कमिश्नर पद पाना। जिसको वह मोक्ष पाने के बराबर मानता है।
लेकिन माया महाठगिनी है हमेशा मनचाहे पद पाते रहने वाले की इच्छाएं भी बार बार सिर उठाती रहती हैं। ज्यादातर आईपीएस की इच्छा होती है कि रिटायरमेंट के बाद उन्हें गवर्नर, यूपीएससी सदस्य या अन्य कोई ऐसा सरकारी पद मिल जाए ताकि आजीवन सरकारी सुख सुविधा भोगते रहे। सत्ता यानी राजनेताओं की कृपा के बिना उनकी ये इच्छा पूरी नहीं हो सकती। इसलिए वह अपने इष्ट नेताओं की अराधना तपस्या में ही लगे रहते हैं।
मोह माया के चक्कर में वह इतना उलझ जाते है कि ईमानदारी से कर्तव्य पालन करने की अपनी उस शपथ को भी ताक पर रख कर दलदल में उतर जाते हैं जो उन्होंने आईपीएस बनने के समय ली थी।