डॉ विजय गर्ग
आज के समय में छोटे बच्चों को महंगे और भव्य स्कूलों में भेजना एक फैशन बन गया है। यह एक ऐसा चलन है, जो शिक्षा से ज़्यादा दिखावे और सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़ गया है। कई माता-पिता मानते हैं कि जितना महंगा स्कूल, उतनी अच्छी शिक्षा; पर यह हमेशा सच नहीं होता। असलियत यह है कि इन स्कूलों में दाखिला करवाना अक्सर बच्चों की आवश्यकता से ज़्यादा, माता-पिता की सामाजिक छवि का हिस्सा बन चुका है.
महंगे स्कूल: ज़रूरत या दिखावा?
बच्चों की उम्र तीन से पाँच साल—जब वे खेल, कहानियों और सरल गतिविधियों से सीखते हैं—तभी उन्हें ऐसे स्कूलों में डाला जाता है जहाँ फ़ीस हजारों नहीं, लाखों में होती है। वातानुकूलित क्लासरूम, स्मार्ट बोर्ड, विदेशी खिलौने, अंतरराष्ट्रीय टैग—ये सब सुनने में आकर्षक ज़रूर लगते हैं, परंतु क्या इतने छोटे बच्चों को इन सबकी वास्तव में ज़रूरत होती है?
शिक्षाविदों का कहना है कि इस उम्र में बच्चे वातावरण से, बातचीत से और भावनात्मक सुरक्षा से ज्यादा सीखते हैं, न कि महंगी सुविधाओं से। परंतु माता-पिता के लिए यह एक “स्टेटस सिंबल” बन चुका है कि उनका बच्चा किस स्कूल में पढ़ता है।
दबाव में फँसे माता-पिता
समाज में बढ़ती तुलना की संस्कृति (comparison culture) ने माता-पिता पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है। पड़ोसी, रिश्तेदार या सोशल मीडिया पर दिखने वाली “परफेक्ट पैरेंटिंग” को देखकर लोग सोचने लगते हैं कि महंगा स्कूल ही श्रेष्ठ है।
कई बार माता-पिता अपनी आय से भी ज्यादा खर्च कर देते हैं ताकि वे दूसरों के सामने “कमतर” न दिखें।
क्या खो रहा है बचपन?
जब बच्चे को महंगे ढांचे के बीच डाला जाता है, पर उनकी प्राकृतिक ज़रूरतें—खेलना, खुला वातावरण, स्वतंत्र अनुभव—अनदेखी हो जाती हैं, तब असली बचपन कहीं पीछे छूट जाता है।
छोटे बच्चे को भावनात्मक जुड़ाव, धैर्य, और धीरे-धीरे सीखने का अवसर चाहिए—यह किसी भी साधारण किंडरगार्टन में मिल सकता है। किंडरगार्टन का मूल्य उसकी फीस से नहीं, बल्कि उसकी देखभाल और शिक्षण के तरीके से तय होता है।
शिक्षा की गुणवत्ता का मूल्यांकन कैसे हो?
- स्कूल महंगा हो या सामान्य, कुछ मूलभूत बातें ही शिक्षा को श्रेष्ठ बनाती हैं—
- बच्चों को सुरक्षित और प्रेमपूर्ण वातावरण मिले
- शिक्षक धैर्यवान और प्रशिक्षित हों
- सीखने की प्रक्रिया खेल आधारित और अनुभव आधारित हो
- हर बच्चे की व्यक्तिगत गति का सम्मान किया जाए
- माता-पिता और शिक्षक के बीच सहयोग में पारदर्शिता हो
- ये बातें महंगी फीस पर नहीं, संस्थान की नीयत और दृष्टिकोण पर निर्भर करती हैं।
दिखावे की बजाय समझदारी आवश्यक
समय आ गया है कि माता-पिता यह समझें कि शिक्षा एक निवेश है, पर उसका मूल्य सुविधाओं से नहीं, अनुभव और सीखने से तय होता है।
दिखावे की इस दौड़ में कहीं न कहीं बच्चों की वास्तविक आवश्यकताएँ पीछे छूट रही हैं।
अगर माता-पिता समझदारी से स्कूल चुनें, न कि सामाजिक दबाव में आकर, तो बच्चे का विकास अधिक संतुलित और स्वाभाविक होगा।
निष्कर्ष
महंगे स्कूलों में भेजना अब “ट्रेंड” है, पर यह हर बच्चे के लिए लाभकारी नहीं।
सच्ची शिक्षा वहीं है जहाँ बच्चा खुश हो, सुरक्षित महसूस करे और अपने ढंग से सीखने का अवसर पाए।
अंततः, स्कूल का नाम नहीं—शिक्षा का वातावरण और शिक्षक की निष्ठा ही भविष्य बनाते हैं।





