प्रमोद भार्गव
इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि चंद कथित बौद्धिक वायु प्रदूषण के विरुद्ध प्रशासन से अनुमति लेकर प्रदर्शन करें और फिर एकाएक प्रदर्शन को हिंसा में बदल दें। ये प्रदर्षनकारी 18 नवंबर को सुरक्षाबलों द्वारा मारे गए कुख्यात नक्सली माडवी हिडमा के समर्थन में उतर आए। इन्होंने ‘माडवी हिडमा अमर रहे‘ और ‘हर घर से चारू निकलेगा‘ जैसे नारे लगाए। पुलिस ने जब इन्हें नारे लगाने से रोका तो पेपर स्प्रे छिड़कते हुए हिसंक हो गए। आखिरकार पुलिस ने कठोर कार्यवाही करते हुए 15 से ज्यादा लोगों को हिरासत में ले लिया। ये अर्बन माओवादी इस बात से खफा थे कि आखिर क्रूर हिंसा के प्रतीक बने हिडमा को क्यों मार गिराया ? छत्तीसगढ़ और आंध्रप्रदेश की सीमा पर हुई मुठभेड़ में हिडमा के साथ अन्य 7 नक्सली भी मार दिए गए थे। हिडमा की मौत के बाद नक्सली कैडर में हड़कंप है। सुरक्षाबलों की आक्रामकता के चलते छत्तीसगढ़ में नक्सली बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण कर रहे हैं। बीते दो-तीन दिनों में बस्तर जिले में सक्रिय 2 करोड़ 8 लाख के इनामी 69 नक्सलियों ने हथियार डाल दिए हैं। इनमें पुरुशों के साथ महिलाएं भी षामिल हैं। गृहमंत्री अमित षाह लगातार कह रहे हैं कि मार्च 2026 तक देष से माओवाद का समूल सफाया कर दिया जाएगा। इस कारण वामपंथी वैचारिकता से जुड़े अर्बन माओवादी बौखला गए हैं। दिल्ली में प्रदूशण के बहाने हिडमा और चारू के पक्ष में की गई नारेबाजी इसी मानसिकता की प्रतीक है।
माओवादी अर्से से देष में एक ऐसी जहरीली विचारधारा रही है, जिसे नगरीय बौद्धिकों का समर्थन मिलता रहा है। ये बौद्धिक नक्सली संगठनों को आदिवासी समाज का हितचिंतक मानते हैं, जबकि जो आदिवासी नक्सलियों के विरोध में रहे, उन्हें इनकी हिंसक क्रूरता का षिकार होना पड़ा है। बावजूद देश के वामपंथी दलों को कभी भी सुरक्षाबलों का नक्सलियों के खिलाफ चलाया जा रहा सफाये का अभियान पसंद नहीं आया। इससे पहले छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ के जंगल में सुरक्षा बलों के नक्सल विरोधी अभियान को बड़ी सफलता तब मिली थी, जब डेढ़ करोड़ के इनामी बसव राजू समेत 27 माओवादियों को मार गिराया था। यह कुख्यात दरिंदा होने के साथ गुरिल्ला लड़ाका था। माओवादी पार्टी का इसे पर्याय माना जाता था। इसका नक्सली सफर 1985 से शुरू हुआ था। इसने वारंगल के क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई की थी। षहरों में बैठे ऐसे ही षिक्षित इस कथित क्रांति के नाम पर सैंकड़ों बेकसूरों को मौत के घाट उतारने में लगे हैं। अकेला हिडमा 150 लोगों को मार चुका है। बावजूद वाम-विचार इन्हें बौद्धिक खुराक देने में लगा है।
नक्सली हिंसा लंबे समय से देश के अनेक प्रांतों में आंतरिक मुसीबत बनी हुई है। वामपंथी माओवादी उग्रवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा माना जाता है। लेकिन अब केंद्र सरकार द्वारा षिकंजा कसे जाने पर चाहे जहां रक्तपात की नदियां बहाने वाले इस उग्रवाद पर लगभग नियंत्रण किया जा चुका है। जबकि डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री रहते हुए 2010 में इन विकास विरोधी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए कठोर नीति अपनाने पर जोर दिया गया तो कांग्रेस की महामहिम सोनिया गांधी द्वारा नियंत्रित राश्ट्रीय सलाहकार परिशद् (एनएसी) ने इस तरह के कठोर प्रस्ताव को पर विरोध जताते हुए इसे मानवता के विरुद्ध कार्यवाही बताया। अंततः कठोर नीति की संहिताएं हाषिए पर डाल दी गईं। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि ये षहरी अर्बन नक्सलियों को आदिवासियों का शुभचिंतक मानने का नैरेटिव गढ़ते रहने के साथ पुलिस और सुरक्षाबलों की कार्यवाही को अन्याय बताते रहे हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि छत्तीसगढ़ में नक्सली तंत्र कमजोर हुआ है, लेकिन उसकी षक्ति अभी षेश है। अब तक पुलिस व गुप्तचर एजेंसियां इनका सुराग लगाने में नाकाम होती रही थीं, लेकिन नक्सलियों पर षिकंजा कसने के बाद से सूचनाएं मिलने लगी हैं। इसी का नतीजा है कि सैन्यबल इन्हें निषाना बनाने में लगातार कामयाब हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ के ज्यादातर नक्सली आदिवासी हैं। इनका कार्यक्षेत्र वह आदिवासी बहुल इलाके हैं, जिनमें ये खुद आकर नक्सली बने हैं। इसलिए इनका सुराग सुरक्षाबलों को लगा पाना मुष्किल होता है। लेकिन ये इसी आदिवासी तंत्र से बने मुखबिरों से सूचनाएं आसानी से हासिल कर लेते हैं। दुर्गम जंगली क्षेत्रों के मार्गों में छिपने के स्थलों और जल स्रोतों से भी ये खूब परिचित हैं। इसलिए ये और इनकी शक्ति लंबे समय से यहीं के खाद-पानी से पोषित होती रही है। हालांकि अब इन हमलों में कमी आई है। दरअसल इन वनवासियों में अर्बन माओवादी नक्सलियों ने यह भ्रम फैला दिया था कि सरकार उनके जंगल, जमीन और जल-स्रोत उद्योगपतियों को सौंपकर उन्हें बेदखल करने में लगी है, इसलिए यह सिलसिला जब तक थमता नहीं है, विरोध की मुहिम जारी रहनी चाहिए। सरकार इस समस्या के निदान के लिए बातचीत के लिए भी आगे आई, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। एक उपाय यह भी हुआ था कि जो नक्सली आदिवासी समर्पण कर मुख्यधारा में आ गए थे, उन्हें बंदूकें देकर नक्सलियों के विरुद्ध खड़ा करने की रणनीति भी अपनाई गई थी। इस उपाय में खून.खराबा तो बहुत हुआ, लेकिन समस्या बनी रही। परंतु अब आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने से लेकर विकास योजनाएं भी इस क्षेत्र में बढ़ा दी गई हैं, जिससे पूरा क्षेत्र नक्सल मुक्त हो जाए।
मुठभेड़ में मारे गए हिड़मा का बस्तर के जंगली क्षेत्र में बोलबाला रहा है। वह सरकार और सुरक्षाबलों को लगातार चुनौती दे रहा था, जबकि राज्य एवं केंद्र सरकार के पास मोदी सरकार से पहले रणनीति और दृढ़ इच्छा शक्ति होती तो इस समस्या का समाधान बहुत पहले हो चुका होता ? अब हिड़मा के मारे जाने के बाद नक्सली समस्या के हल की गुंजाइश बढ़ गई है। हिडमा वही नक्सली सरगना था, जिसने 2013 में कांग्रेस के एक दल पर बड़ा हमला बोलकर लगभग उसका सफाया कर दिया था। दरअसल कांग्रेस नेता महेन्द्र कर्मा ने नक्सलियों के विरुद्ध ‘सलवा जुडूम‘ को 2005 में खड़ा किया था। स्थानीय गोंडी भाषा में इसे ‘शांति मार्च‘ कहा जाता है। यह आंदोलन मुख्य रूप से स्थानीय आदिवासी युवाओं को विशेष पुलिस प्रशिक्षण देकर चलाया गया था। इससे प्रभावित होकर बीजापुर जिले के कुर्तु विकासखण्ड के आदिवासी ग्राम अंबेली के लोग नक्सलियों के खिलाफ खड़े होने लगे थे। नतीजतन नक्सलियों की महेंद्र कर्मा से दुश्मनी ठन गई थी। परिणाम स्वरूप हिडमा ने महेंद्र कर्मा के साथ पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल, कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष नंदकुमार पटेल और हरिप्रसाद समेत एक दर्जन नेताओं को मार गिराया था। इससे पता चलता है कि इन खूंखार नक्सलियों पर अहिंसा और शांति से नियंत्रण नहीं पाया जा सकता है। क्योंकि इनको उकसाने, धन, खाद-पानी और हथियार मुहैया कराने वाले शहरी नक्सली तो सुरक्षित स्थलों पर बैठे हुए अपना खेल खेल रहे हैं।
दरअसल, देश में शहरी बुद्धिजीवियों का एक तबका ऐसा है, जो माओवादी हिंसा को सही ठहराकर संवैधानिक लोकतंत्र को मुखर चुनौती देकर नक्सलियों का हिमायती बना हुआ है। जब ऐसे ही राष्ट्रघाती बुद्धिजीवी पुख्ता सबूतों के आधार पर गिरफ्तार किए गए तो बौद्धिकों और वकीलों के एक गुट ने देश के सर्वोच्च न्यायालय को भी प्रभाव में लेने की कोशिश की थी और गिरफ्तारियों को गलत ठहराया था। माओवादी किसी भी प्रकार की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पसंद नहीं करते हैं। इसलिए जो भी उनके खिलाफ जाता है, उसकी बोलती बंद कर दी जाती है। लेकिन अब हिडमा जैसे चरमपंथी की मौत के बाद तय है, कि गृहमंत्री अमित शाह ने इनके खात्मे की जो भविष्यवाणी की है,वह पूरी होगी।





