स्वदेश कुमार
समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव आजकल अपने हर बयान और प्रतिक्रिया की वजह से सुर्खियों में बने हुए हैं। राजनीतिक हलकों में यह बात आम हो गई है कि वे अब हर मुद्दे पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के लिए बेचैन नजर आते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि वे किसी भी घटना या विषय को लेकर अपनी मनगढ़त कहानियां बनाने लगते हैं, जिनका असलियत से ज्यादा राजनीतिक प्रभाव होता है। उनकी बयानबाजी में दिलचस्पी तो बहुत है, लेकिन यह भी देखा जाता है कि उनके हर शब्द के पीछे उनकी राजनीति की प्रतिबद्धता साफ झलकती है।अखिलेश यादव का राजनीतिक संवाद अब अधिकतर समाज के कमजोर तबकों दलित, पिछड़ा वर्ग और मुसलमान समुदाय को सक्रिय और प्रबल करने के इरादे से भड़का देने पर केन्द्रित हो गया है। उनकी पार्टी की परंपरा और चुनावी रणनीति के अनुसार ये समूह ही उनका मुख्य वोट बैंक रहे हैं। परंतु, कुछ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अखिलेश की इस झुकाव ने कभी-कभी सांप्रदायिक और वर्गीय तनाव को हवा दी है, जिससे सामाजिक समरसता प्रभावित होने की आशंका रहने लगी है। हाल के दिनों में समाज में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि अखिलेश यादव को अपने पिता, मुलायम सिंह यादव से अपने राजनीतिक आचरण में कुछ बदलाव सीखना चाहिए। मुलायम सिंह यादव का व्यक्तित्व और नेतृत्व शैली देश में काफी अलग तरह की मानी जाती है। वे अधिकतर शांत, संयमित और सोच-समझकर बोलने के पक्षधर रहे हैं। उनकी राजनैतिक सफलता का एक बड़ा कारण यही माना जाता है कि वे बिना ज्यादा शोर-शराबे के, स्थिति को भांपकर अपने कदम उठाते थे।
मूलतः, मुलायम सिंह यादव की रणनीति थी कि वह विवादों में कम उतरते, विवादित सवालों को धोरे-धोरे हल करते और अपने दृष्टिकोण को बिना बहुत ज्यादा उग्रता या विरोधाभास के प्रस्तुत करते। उनके संवादों में संतुलन और सहिष्णुता की झलक साफ दिखाई देती थी। वे जनता और पार्टी के बीच संतुलित आदान-प्रदान पर भरोसा रखते थे, जिससे उनकी छवि एक अनुभवी और दूरदर्शी नेता के रूप में स्थापित हुई। इसके विपरीत, अखिलेश यादव के राजनीतिक व्यक्तित्व में आजकल तीव्रता और तेजी ज्यादा नजर आती है। वे सार्वजनिक मंचों पर और मीडिया के सामने अक्सर तीखे भाषण देते हैं, जो विवादित व्यवहार का रूप ले लेते हैं। उनका संवाद शैली अब ज्यादा आक्रामक हो गई है, जिसका उद्देश्य शायद अपनी पार्टी की धारणा को तेज और सक्रिय बनाए रखना है। लेकिन कई बार इसकी वजह से वे अपनी राजनीतिक प्रसार रणनीति में उलझन में दिखते हैं और आलोचना का सामना करते हैं।मुलायम सिंह यादव के राजनीति में संयम और समझदारी की प्रथा को देखकर यह कहना गलत न होगा कि अखिलेश यादव को अपने राजनीतिक सफर पर अधिक धैर्य और संतुलन अपनाने की जरूरत है। राजनीति केवल त्वरित प्रतिक्रिया देने का नाम नहीं है, बल्कि गहन सोच-समझकर सही रणनीति बनाकर आगे बढ़ने का भी काम है। मुलायम सिंह की तरह, जो बिना ज्यादा आवाज़ उठाए राजनीति में अपनी पकड़ बनाए हुए थे, अखिलेश को भी अपनी बातों में वो गहराई और स्थिरता लानी होगी जो समृद्ध राजनीतिक नेतृत्व के लिए आवश्यक है। अखिलेश यादव की राजनीतिक यात्रा में बहुत अच्छे और उत्साहजनक क्षण आए हैं, पर यह भी सच है कि वे आज की तेजी से बदलती राजनीति में अपनी छवि को लेकर बहुत संवेदनशील स्थिति में हैं। जब वे दलित, पिछड़े और मुस्लिम समुदाय को अपने भाषणों के जरिए सक्रिय करते हैं, तो इससे अपेक्षित वोट बैंक को भी मजबूत किया जाता है, परंतु इसके साथ ही सामाजिक सामंजस्य पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। इसके विपरीत, मुलायम सिंह यादव ने हमेशा बड़े पैमाने पर सामाजिक एकता पर जोर दिया और राजनीति को समरसता के माध्यम के रूप में देखा।
इन दोनों राजनीतिक हस्तियों की तुलना में यह बात भी उभरकर सामने आती है कि मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक जीवन में ज्यादा दबदबा और सहूलियत से काम लिया। वे अक्सर विवादों से बचते हुए अपना काम करते रहे। उनकी भाषा में गरिमा और वज़न था, जिसका उनके समर्थक और विपक्षी दोनों सम्मान करते थे। दूसरी तरफ अखिलेश यादव की भाषा ज़्यादा तीव्र और भावुक है, जो कई बार राजनीतिक विरोधियों तक को लाभ पहुंचाती है। अखिलेश के कुछ समर्थक कहते हैं कि उन्हें अपनी बात और फैसले प्रभावी ढंग से पहुंचाने के लिए ज़ोरदार और समसामयिक बयानबाजी करनी पड़ती है। वे कहते हैं कि बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में ऐसे तेज वक्तव्य जरूरी होते हैं जो पार्टी को चुनावी मोर्चे पर सक्रिय बनाए रखेंगे। पर आलोचक इस तर्क से सहमत नहीं हैं और मानते हैं कि ये बयान तनाव और अस्थिरता को बढ़ावा देते हैं, जिससे पार्टी की छवि कमजोर हो सकती है। मुलायम सिंह यादव ने सपा की बुनियाद को मजबूत कर इसे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक स्थाई शक्ति बनाया। उन्होंने इसे संगठन के स्तर पर मजबूत किया और अपने आंतरिक मतभेदों को धीरे-धीरे सही तरीके से सुलझाया। वे चालाक और दूरदर्शी नेता थे जिन्होंने अपना राजनीतिक माहौल समझकर निर्णय लिए। वहीं, अखिलेश यादव की भूमिका अधिकतर सार्वजनिक मंचों पर सक्रियता से जुड़ी है, जो संगठनात्मक मजबूती के लिए हमेशा मुफीद नहीं रहती।
इससे यह लगता है कि अखिलेश यादव को अपने पिता से राजनीति के आदर और संयम की सीख लेनी चाहिए। यह सीख उन्हें न केवल बयानबाजी में सुधार लाने में मदद करेगी बल्कि उनकी पार्टी को भी एक मजबूत और स्थिर स्थिति में लाएगी। राजनीति में भावुकता और तेज़बाजी कभी कभी खतरे की घंटी साबित होती है, जबकि संयमित और सोच-समझकर किया गया नेतृत्व पार्टी को लंबी अवधि का लाभ देता है। अखिलेश यादव को अपनी भाषा और कार्यशैली में संतुलन स्थापित करना होगा, जो न तो उनकी पार्टी के वोट बैंक को निराश करे और न ही समाज में विभाजन पैदा करे। अगर वे अपने राजनीतिक जन्मदाता मुलायम सिंह की तरह सोच-समझकर चलते हैं और अपने शब्दों को सौम्यता से चुनते हैं, तो निश्चित रूप से उनकी राजनीति में नई जान आ सकती है।अंततः यह कहा जा सकता है कि दोनों पीढ़ियों के नेताओं के बीच का ये फर्क उनके व्यक्तित्व, परिस्थिति और समय के अनुसार आया है। पर किसी भी परिस्थिति में संयम, सहिष्णुता और दूरदर्शिता वह मूल्य हैं जो राजनीति में स्थिरता और सफलता का मूल आधार होते हैं। अखिलेश यादव को चाहिए कि वे अपने पिता से इन गुणों को ग्रहण करें और पार्टी तथा समाज के लिए एक समंजस पूर्ण और सकारात्मक भूमिका निभाएं।





