पाकिस्तान में मुनीर को असीम सैनिक शक्तियों पर भारत की नजर

India eyes unlimited military powers to Munir in Pakistan

संजय सक्सेना

पाकिस्तान की शरीफ सरकार ने हाल ही में एक अहम कदम उठाते हुए अपने संविधान में ऐसा संशोधन किया है, जिससे सेनाध्यक्ष मुनीर को अपार शक्तियाँ मिल गई हैं। अब उन्हें न केवल देश की सैन्य ताकत का सर्वोच्च अधिकार प्राप्त हो गया है, बल्कि उनके हाथ में परमाणु हथियारों के नियंत्रण का भी पूरा अधिकार दे दिया गया है। इतना ही नहीं, इस संशोधन के तहत अब मुनीर के खिलाफ किसी भी अदालत में मुकदमा भी नहीं चलाया जा सकेगा। यह कदम न केवल पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति का अहम बदलाव है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा और शांति के लिए भी गंभीर चिंता का विषय है।पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में सैन्य और सिविल नेतृत्व के बीच हमेशा टकराव और संतुलन की स्थिति बनी रहती है। सेना का असर कभी-कभी इतना बढ़ जाता है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है। शरीफ सरकार के इस संशोधन ने सैन्य प्रमुख को जो शक्तियाँ दी हैं, उससे स्पष्ट होता है कि सेना का नियंत्रण अब उस स्तर पर पहुंच गया है जहाँ उसकी शक्तियों पर किसी भी तरह की जांच-पड़ताल या नियंत्रण संभव नहीं है। ऐसे निर्णय से देश के लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो सकती हैं और सैन्य तानाशाही को बढ़ावा मिल सकता है।

इस नए संशोधन के चलते मुनीर का पद केवल एक सैन्य प्रमुख का रहना नहीं रह गया है, बल्कि एक असंवैधानिक स्थिति बन गया है जिसमें वे पारंपरिक संवैधानिक सीमाओं से ऊपर उठ गए हैं। परमाणु हथियारों का नियंत्रण संपूर्ण सैन्य शक्ति का केंद्रीय विषय है, और जब यह दायित्व एक व्यक्ति के हाथ में पूरी तरह केंद्रित हो जाता है तो सुरक्षा जोखिमों का खतरा बढ़ जाता है। इससे पड़ोसी देशों के साथ तनाव में वृद्धि हो सकती है और क्षेत्रीय शांति संकट में पड़ सकती है।मुनीर के खिलाफ मुकदमे न चलने की व्यवस्था ने यह संकेत दिया है कि अब सैन्य प्रमुख पर कोई कानूनी नियंत्रण या जवाबदेही नहीं रहेगी। यह लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ एक बड़ी चोट है, क्योंकि सत्ता का दुरुपयोग होने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं, और फिर विरोध करने वाले या सवाल उठाने वाले प्रतिनिधि दबाए जा सकते हैं। इसके साथ ही सैनिक नेतृत्व के निर्णयों पर किसी भी तरह की सार्वजनिक या न्यायिक समीक्षा बंद हो जाएगी, जो अधिकारों का दुरुपयोग बढ़ा सकती है।

भारत समेत आसपास के कई देशों के लिए यह कदम गंभीर खतरा है। भारत और पाकिस्तान के बीच पहले से ही कई तनाव और विवाद चल रहे हैं, और ऐसे समय में जब पाकिस्तान की सेना के पास इतनी शक्तियाँ केंद्रीकृत हो रही हैं, भारत की सुरक्षा नीति को भी कड़ा और सतर्क होना पड़ेगा। भारत को अपनी सीमाओं की सुरक्षा के साथ-साथ रणनीतिक रूप से भी ज्यादा सजग रहना होगा ताकि किसी भी अप्रत्याशित घटना से निपटा जा सके।इतिहास में जब भी किसी देश में सैनिकों को विशेष अधिकार दिए गए हैं तो वहां लोकतंत्र और नागरिकों की स्वतंत्रता प्रभावित हुई है। पाकिस्तान की यह स्थिति भी विश्व समुदाय और क्षेत्रीय देशों के लिए दुखदायी है। इस संशोधन की आलोचना देश के अंदर भी हो रही है, जहाँ कई राजनीतिक दल और नागरिक इस कदम को असंवैधानिक और खतरनाक मानते हैं।

सरकार ने यह दावा किया है कि ये कदम राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं, लेकिन आलोचक इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में डालने वाला और लोकतंत्र का गला घोंटने वाला निर्णय मानते हैं। जब सेनाध्यक्ष को कोई कानूनी जवाबदेही नहीं होगी, तो सत्ता का प्रयोग किस हद तक बढ़ सकता है, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। इस मौजूदा स्थिति में आवश्यक है कि पाकिस्तान के नागरिक, पत्रकार और राजनीतिक दल अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट हों और देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए आवाज उठाएं। साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भी इस मामले पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए ताकि क्षेत्रीय स्थिरता बनी रहे और असंतुलन न आए। बहरहाल, पूरे प्रकरण से यह स्पष्ट होता है कि सैनिक शक्तियों का बढ़ना सिर्फ पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरे दक्षिण एशिया की सुरक्षा और स्थिरता पर असर डालेगा। इसलिए सभी संबंधित देशों को मिलकर कूटनीतिक प्रयास तेज करने होंगे ताकि क्षेत्र में शांति और भरोसा कायम रह सके।