सुनील कुमार महला
हर वर्ष 1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस के रूप में मनाया जाता है। दरअसल,यह दिवस एचआईवी (ह्यूमन इम्यूमिनोडेफेसिऐंसी वायरस) यानी कि मानव रोग प्रतिरोधक क्षमता वायरस/एड्स के बारे में आम लोगों में जागरूकता फैलाने, उनमें व्याप्त विभिन्न गलत धारणाएँ दूर करने और संक्रमित लोगों के प्रति सम्मान व समर्थन का संदेश देने के क्रम में मनाया जाता है।एड्स मतलब एक्वायर्ड इम्यून डेफिसिएंसी सिंड्रोम।यह एचआईवी के कारण होने वाली एक पुरानी, जानलेवा बीमारी है, जो प्रतिरक्षा तंत्र को संक्रमित करती है, सीडी-4 कोशिकाओं (श्वेत रक्त कोशिकाएं, जो प्रतिरक्षा तंत्र के लिये महत्त्वपूर्ण हैं) को प्रभावित करती है। यह असुरक्षित यौन संबंध, संक्रमित रक्त और सुइयों को साझा करने से फैलता है। वास्तव में इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को सुरक्षित जीवनशैली अपनाने, समय पर जांच कराने और उपलब्ध उपचारों की जानकारी देना है, ताकि इसके संक्रमण को रोका जा सके और मरीज बेहतर व खुशहाल जीवन जी सकें। यहां पाठकों को बताता चलूं कि वर्ष 2024 की थीम – ‘सही राह अपनाना: मेरा स्वास्थ्य, मेरा अधिकार!’ रखी गई थी तथा इस वर्ष 2025 की थीम ‘ओवरकमिंग डिस्-रप्सन, ट्रांसफोर्मिंग द एड्स रेस्पॉन्स’ रखी गई है, जिसका मतलब है-‘बाधाओं और असमानताओं को दूर करके एड्स-नियंत्रण की पूरी व्यवस्था को और मजबूत व आधुनिक बनाना।’ कहना ग़लत नहीं होगा कि विश्व एड्स दिवस का मुख्य संदेश यही है कि यदि हम सब मिलकर जागरूक रहें, विज्ञान की नई प्रगतियों का उपयोग करें, भेदभाव खत्म करें और इंसानियत के साथ एक-दूसरे का साथ दें, तो एड्स को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।सीधे शब्दों में कहें तो एड्स से लड़ाई सिर्फ दवाओं से नहीं, बल्कि जागरूकता, समानता और मानवीय सहयोग से जीती जा सकती है। बहरहाल, विश्व एड्स दिवस के अवसर पर (1 दिसंबर) विश्व और भारत दोनों के संदर्भ में यदि हम ताज़ा आंकड़ों की बात करें तो पाठकों को बताता चलूं कि पूरे विश्व में 2024 तक, लगभग 40.8 करोड़ (40.8 मिलियन) लोग एचाईवी से संक्रमित थे तथा साल 2024 में नए संक्रमण के रूप में लगभग 1.3 मिलियन मामले दर्ज हुए।वहीं, 2024 में एड्स-संबंधित मौतें लगभग 6,30,000 थीं। गौरतलब है कि आज तक, महामारी की शुरुआत से लेकर अब तक कुल 91.4 मिलियन लोग एचाईवी से संक्रमित हुए हैं, और लगभग 44.1 मिलियन लोग एड्स के कारण मृत्यु को प्राप्त हो चुके हैं। हालांकि, नई संक्रमणों और मौतों की दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है तथा 2010 से 2024 के बीच नई संक्रमणें 40% कम हुईं हैं। यदि हम यहां पर भारत की स्थिति की बात करें तो भारत में लगभग 2.5 मिलियन (25 लाख) लोग एचआईवी के साथ जीवित हैं तथा साल 2010 के बाद से, नए एचआईवी संक्रमणों में लगभग 44% की गिरावट आई है, जो कि वैश्विक गिरावट (39%) से बेहतर है। 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वयस्क एचआईवी दर लगभग 0.2% तथा सालाना नए मामलों की संख्या भारत में लगभग 66,400 (66.4 हज़ार) है। बहरहाल, कहना ग़लत नहीं होगा कि विश्व स्तर पर एचआईवी/एड्स अभी भी एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या है। सच तो यह है कि दुनिया में एड्स से मरने वालों और नए संक्रमणों की संख्या पहले की तुलना में काफी कम हुई है, लेकिन बीमारी अभी भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। अब तक करोड़ों लोग एचआईवी से संक्रमित हो चुके हैं और लाखों जानें जा चुकी हैं। भारत ने पिछले 10-15 सालों में इस बीमारी को नियंत्रित करने में अच्छी प्रगति की है। जहां एक तरफ नए मामलों में बड़ी कमी आई है, वहीं दूसरी तरफ आज बहुत से लोगों को इलाज मिल रहा है। फिर भी, बीमारी को पूरी तरह खत्म करने के लिए जागरूकता, समय पर जांच, नियमित इलाज और समाज में मौजूद भेदभाव को खत्म करना बहुत ज़रूरी है,तभी यह सामाजिक कलंक मिट सकता है। बहरहाल,यह ठीक है कि एड्स आज भी एक गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य चुनौती है, लेकिन इसका भय उतना नहीं रह गया है जितना कि दो-तीन दशक पहले था। वास्तव में,इस डर का सबसे बड़ा कारण जानकारी की कमी, सामाजिक कलंक और गलत धारणाएँ थीं, जैसे कि एचआईवी छूने, साथ बैठने या भोजन साझा करने से फैलता है। विज्ञान की प्रगति ने इन मिथकों को तोड़ा है। अब एचआईवी का इलाज संभव है। एंटी-रेट्रोवायरल दवाएँ (एआरटी मेडिसिन्स) वायरस को नियंत्रित रखती हैं, और समय पर इलाज से व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है। हालांकि, पिछले कुछ सालों में विज्ञान ने एचआईवी की जांच, रोकथाम और इलाज में काफी प्रगति की है, लेकिन छिपा संक्रमण, सामाजिक कलंक और जागरूकता की कमी इसे अब भी बड़ी चुनौती बनाए हुए हैं। शहरों में असुरक्षित यौन संबंध, नशे के इंजेक्शन और युवाओं की जोखिमपूर्ण आदतें संक्रमण फैलने के नए कारण बन रही हैं। वहीं ग्रामीण इलाकों में जांच सुविधाएँ और एआरटी इलाज की सीमित पहुँच के कारण कई लोगों को समय पर उपचार नहीं मिल पाता है। आज एड्स (एचआईवी/एड्स) को लेकर जो सबसे बड़ा डर है, वह खुद बीमारी से नहीं, बल्कि समाज की गलत धारणाओं, भेदभाव, तिरस्कार और उपेक्षा से पैदा होता है। लोग बीमारी से कम और समाज के नकारात्मक रवैये से ज़्यादा डरते हैं। इसलिए असली चुनौती बीमारी नहीं, बल्कि लोगों की सोच बदलना है। दूसरे शब्दों में कहें तो एचआईवी से पीड़ित लोग अक्सर समाज में तिरस्कार, दूरी और अपमान का सामना करते हैं, और यह दर्द बीमारी से भी ज़्यादा गहरा होता है। इसलिए एड्स के खिलाफ लड़ाई केवल दवाओं या इलाज से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए लोगों में जागरूकता, संवेदनशीलता और बराबरी का व्यवहार जरूरी है। जब समाज समझदार और स्वीकार करने वाला हो जाता है, तभी इस बीमारी से जुड़ा डर कम होता है और एड्स-मुक्त भविष्य का रास्ता खुलता है। एड्स से बचा जा सकता है। बचाव ही सबसे बड़ी सुरक्षा है। व्यक्तिगत स्तर पर सुरक्षित यौन संबंध रखना, कंडोम का सही उपयोग, समय-समय पर एचआईवी टेस्ट कराना, इंजेक्शन या ब्लेड साझा न करना और किसी भी तरह के भेदभाव से दूर रहना सबसे जरूरी है। एचआईवी पॉजिटिव पाए जाने पर चिकित्सक की सहायता/सलाह से तुरंत एंटी-रेट्रोवायरल थेरेपी शुरू करना संक्रमण की गंभीरता को काफी हद तक नियंत्रित कर सकता है। समाज को यह समझना चाहिए कि एड्स छूने, साथ बैठने, खिलाने-पिलाने या सामान्य संपर्क से नहीं फैलता। गलतफहमियों को दूर कर संवेदनशीलता और मानवता दिखाना हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है।अंत में यही कहूंगा कि सरकार, समाज और स्कूल को यह चाहिए कि वे मिलकर जागरूकता फैलाएँ। मुफ्त और गोपनीय एचआईवी टेस्ट की सुविधा प्रदान करें, और दवाएँ हर जगह आसानी से उपलब्ध कराएँ-खासकर गाँवों में। जो लोग ज्यादा जोखिम में होते हैं, जैसे ट्रांसजेंडर लोग, सेक्स वर्कर्स, नशा करने वाले इंजेक्शन यूजर्स और प्रवासी मजदूर, उनके लिए अलग से मदद और सुरक्षा कार्यक्रम चलाना जरूरी है। वास्तव में सच तो यह है कि एड्स को नियंत्रित करना केवल चिकित्सा का विषय नहीं है, बल्कि यह जागरूकता, जिम्मेदारी और सामूहिक प्रयास का परिणाम है।यह भी कि जानकारी, संवेदनशीलता और निरंतर सहयोग-एड्स नियंत्रण की सबसे मजबूत कुंजी हैं।अगर व्यक्ति, समाज और सरकार, सभी सामूहिक रूप से तथा जिम्मेदारी से काम करें, तो एड्स को काफी हद तक रोका जा सकता है और भविष्य में इसे खत्म करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा सकता है।





