यह है देश में चल रही ‘स्पेशल रेल गाड़ियों ‘ के संचालन की सच्चाई

This is the truth about the operation of 'special trains' running in the country

तनवीर जाफ़री

गत दिनों अपने किसी निजी कार्यवश अचानक बिहार जाने का कार्यक्रम बन गया। प्रायः शहीद या सरयू यमुना एक्सप्रेस से पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार मेरा दरभंगा आना जाना होता है परन्तु इस बार चूँकि मात्र एक सप्ताह पूर्व ही दरभंगा जाने की तिथि निर्धारित हुई इसलिये शहीद या सरयू यमुना एक्सप्रेस में आरक्षण न मिल पाने के चलते आने जाने हेतु अन्य विकल्प तलाश करने पड़े। ऐसे ही वैकल्पिक ट्रेन थी अमृतसर – जयनगर ‘स्पेशल ट्रेन’ यानी 04652 । इस ट्रेन के अमृतसर से अंबाला पहुंचने का निर्धारित समय दोपहर 2 बजकर 50 मिनट था और दरभंगा पहुंचने का निर्धारित समय अगले दिन शाम 5.30 बजे था। अर्थात पूरी यात्रा लगभग 26 घंटे 30 में तय होनी थी। परन्तु यह ट्रेन अगले दिन शाम 5.30 बजे दरभंगा पहुँचने के बजाये तीसरे दिन सुबह लगभग 8.30 बजे पहुंची। यानी यह ‘स्पेशल ट्रेन’ 04652 लगभग 15 घंटे की देरी से दरभंगा पहुंची। इतना ही नहीं जहाँ दूसरी मेल एक्सप्रेस ट्रेन्स का अंबाला-दरभंगा का ए सी थ्री का किराया लगभग 1500 रुपये है वहीं इस तथाकथित ‘स्पेशल ट्रेन’ के नाम पर यात्रियों से किराया भी क़रीब 2000 / रूपये वसूल किये गये।

इसी तरह वापसी के लिये भी जिस ट्रेन में ए सी थ्री श्रेणी में आरक्षण मिल सका वह भी दरभंगा-नई दिल्ली स्पेशल ट्रेन 02569 थी। इसका भी दरभंगा से छूटने का निर्धारित समय सुबह 6 बजकर 30 मिनट था परन्तु यह वहां से प्रातः 9 बजकर 40 मिनट पर यानी तीन घंटा दस मिंट के विलंब से रवाना हुई। और अपने निर्धारित समय यानी अगले दिन सुबह 4 बजे नई दिल्ली पहुँचने वाली यह स्पेशल ट्रेन लगभग 1. 30 बजे दोपहर अर्थात क़रीब दस घंटे की देरी से नई दिल्ली स्टेशन पहुँच सकी। इसका भी ए सी थ्री श्रेणी का किराया 1900 रूपये था जबकि अन्य सामान्य मेल एक्सप्रेस ट्रेन्स में 1500 के आस पास होता है। इस लेट लतीफ़ी के परिणाम स्वरूप कितने यात्रियों को किन किन परेशानियों का सामना करना पड़ा रेल विभाग को इससे कोई लेना देना नहीं। रास्ते में ट्रेन में खाने पीने व वाशरूम में जल आपूर्ति संबंधी कैसी कैसी परेशानियों का सामना यात्रियों ने किया रेल विभाग से इसका भी कोई वास्ता नहीं। रेल विभाग को तो यात्रियों की जेब से ‘स्पेशल ट्रेन’ के नाम पर ठगे गए फ़ालतू किराये भर से ही मतलब है।

इस समय आपको देश के कई भाग से इसी तरह की अनेक ट्रेन स्पेशल ट्रेन या क्लोन ट्रेन के नाम से चलती दिखाई दे जाएँगी। प्राप्त जानकारी के अनुसार इनमें अधिकांश स्पेशल या क्लोन ट्रेन इसी तरह घंटों नहीं बल्कि दिन के हिसाब से लेट चल रही हैं। जानकारी जुटाने पर पता चला कि यह वही ट्रेन्स हैं जिन्हें पिछले दिनों त्योहारों के दौरान स्पेशल ट्रेन या क्लोन ट्रेन के नाम से चलाया गया था। परंतु चूंकि इसका किराया अन्य ट्रेन्स की तुलना में काफ़ी अधिक है और यात्रियों की संख्या अधिक होने के चलते यह ट्रेन्स त्यौहार ख़त्म होने के बावजूद अभी भी यात्रियों की भारी भीड़ ढो रही हैं इसलिये रेल विभाग भी इसे अपनी कमाऊ योजना समझकर त्यौहार ख़त्म होने के बावजूद अभी भी चला रहा है।अब चूँकि इस तरह की स्पेशल या क्लोन रुपी ट्रेन्स सप्ताह में 3 या चार दिन ही चलती हैं इसलिये इनके एक या दो दिन लेट हो जाने पर भी रेल विभाग को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। हाँ यात्रियों को जो परेशानियां उठानी पड़ती है उसका रेल विभाग या सरकार से कोई वास्ता ही नहीं। किसी यात्री की अस्पताल में डॉक्टर से महीनों पहले ली गयी अपॉइंटमेंट निरस्त हो जाती है जिससे उसकी जान व सेहत प्रभावित होती है। किसी की परीक्षा छूट जाती है किसी को नौकरी ज्वाइन करनी होती है किसी को शादी ब्याह में शामिल होना होता है। गोया लोगों की तरह तरह की व्यस्तताओं पर रेल विभसग की लेट लतीफ़ी पानी फेर देती है। जब स्पेशल या क्लोन ट्रेन के नाम पर संचालित रेलगाड़ियों की यह स्थिति है तो सामान्य ट्रेन्स की हालत का अंदाज़ा भी आसानी से लगाया जा सकता है। ख़ासकर बिहार की ओर जाने वाली गाड़ियां तो लगभग हमेशा ही विलंब व अति विलंब से ही चलती हैं। सुबह की ट्रेन शाम व शाम को पहुँचने वाली ट्रेन का अगले दिन सुबह अपने गंतव्य तक पहुंचना तो गोया आम बात हो चुकी है।

सच तो यह है कि सरकार की प्राथमिकताओं में पहले से चल रही सामान्य /एक्सप्रेस व मेल ट्रेन्स को निर्धारित समय सारिणी के अनुसार संचालित करना नहीं बल्कि वंदे भारत ट्रेन्स की संख्या बढ़ाना है। वंदे भारत ट्रेन्स संचालित करने के पीछे भी यही कहानी है कि इसमें अन्य ट्रेन्स की तुलना में किराया काफ़ी अधिक है जिसे साधारण व्यक्ति ख़ासकर 5 किलो मुफ़्त राशन पर जीने को मजबूर व 10 हज़ार रूपये लेकर वोट डालने वाली महिलायें तो कम से कम सहन नहीं कर सकतीं। सरकार की दूसरी प्राथमिकता देश के चुनिंदा रेल स्टेशन को चमकाने व उनका रंग रोग़न करने की है। भले ही इन स्टेशन पर भिखारी कुत्ते गाय सांड आदि क्यों न डेरा जमाये हों। देश के अधिकांश रेलवे स्टेशन दशकों से नशेड़ियों व अपराधियों की शरण स्थली बने हुये हैं। आज भी देश के अनेक स्टेशन पर लूट चोरी ,जेब कतरी,ज़हर खुरानी,अवैध यात्री,रिश्वत ख़ोरी आदि अपराध धड़ल्ले से अंजाम दिए जाते हैं। शर्मनाक तो यह है कि देश के तमाम रेल स्टेशन पर बाक़ायदा रेल विभाग की ओर से लाउडस्पीकर से जेब कतरों से सावधान रहने,ज़हर खुरानी से बचने व अपने सामन की सुरक्षा करने जैसी घोषणायें बार बार की जाती हैं। परन्तु सरकार के पास यात्रियों को सुरक्षित व आरामदायक यात्रा मुहैया कराने की न तो कोई योजना है और शायद न ही यह उसकी भावी योजनाओं का हिस्सा प्रतीत होती है। बल्कि सरकार तो बुलेट ट्रेन चलाने की योजना पर काम कर रही है। शायद बिहार जैसे राज्यों से आने वाले ताज़ातरीन चुनाव परिणामों के बाद सरकार इस निष्कर्ष पर भी पहुँच चुकी है कि यू पी व बिहार जैसे घनी आबादी वाले राज्यों की जनता जब मुफ़्त राशन व नक़द पैसों के बदले वोट दे ही देती है तो उसे निर्धारित समय सारिणी के अनुसार ट्रेन संचालन जैसे विषय से क्या लेना देना ? और जिस जागरूक व शिक्षित वर्ग के रेल यात्री ट्रेन्स की लेटलतीफ़ी या ट्रेन संचालन की अन्य त्रुटियों से प्रभावित होते भी हैं या इसे महसूस करते हैं उनकी संख्या ‘लाभार्थी मतदाताओं ‘ से तो आख़िर कम ही है ? जो भी हो परन्तु कुल मिलाकर यही है देश में चल रही ‘स्पेशल रेल गाड़ियों ‘ के संचालन की सच्चाई।