सुनील कुमार महला
हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न चौधरी चरण सिंह का यह मानना था कि ‘भारत की आत्मा गाँवों में और गाँवों की आत्मा किसानों में बसती है।’ चौधरी चरण सिंह जी यह बात बिल्कुल सत्य है, क्यों कि भारत विश्व का एक बड़ा कृषि प्रधान देश है और यहां की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर ही निर्भर और आधारित है। यह भी कह सकते हैं भारतीय अर्थव्यवस्था भी एक कृषि आधारित अर्थव्यवस्था ही है। बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि 23 दिसंबर को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री(पांचवें प्रधानमंत्री)चौधरी चरण सिंह की जयंती है और इसे हमारे देश में राष्ट्रीय किसान दिवस के रूप में मनाया जाता है और इस दिवस को औपचारिक रूप से मनाने की शुरुआत 2001 में हुई थी। वास्तव में, चौधरी चरण सिंह किसानों के सच्चे हितैषी माने जाते हैं। उल्लेखनीय है कि वर्ष 1902 में नूरपुर, मेरठ, उत्तर प्रदेश में जन्मे, चौधरी चरण सिंह एक भारतीय राजनीतिज्ञ और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने भारत के पाँचवें प्रधानमंत्री (1979-80) के रूप में कार्य किया। उन्होंने दो बार उप-प्रधानमंत्री (जनवरी-जुलाई 1979) और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में भी कार्य किया। इतना ही नहीं, उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा में छपरौली (वर्ष 1937, 1946, 1952, 1962, 1967) और बाद में बागपत के सांसद के रूप में प्रतिनिधित्व भी किया।कहना ग़लत नहीं होगा कि भारत रत्न चौधरी चरण सिंह जी ने किसानों को हकदार बनाया, दलितों-पिछड़ों को जमीन का मालिक बनाया और स्वाभिमान से जीने का हक दिया। गांधीवादी विचारधारा के चौधरी चरण सिंह ने विदेशी विचारों पर आधारित सहकारी खेती के सिद्धांत का इसलिए तीखा विरोध किया, क्योंकि उनका मानना था कि भारत का किसान अपनी ज़मीन से भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक रूप से जुड़ा है। ज़मीन का सामूहिक स्वामित्व किसान की मेहनत, जिम्मेदारी और आत्मसम्मान को कमजोर करता है। उनके अनुसार छोटा किसान अपनी निजी भूमि पर ही सबसे अधिक उत्पादक और स्वतंत्र होता है। उन्होंने नमक सत्याग्रह में भाग लेकर औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ प्रतिरोध दर्ज किया। यह उनके भीतर बसे राष्ट्रवाद और सामाजिक न्याय के भाव को दर्शाता है। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने सत्ता को साधन नहीं, बल्कि किसानों के उत्थान का माध्यम माना।उनका सबसे क्रांतिकारी योगदान जमींदारी प्रथा का उन्मूलन था। इस ऐतिहासिक कदम से पहली बार किसान केवल खेत जोतने वाला नहीं, बल्कि जमीन का वास्तविक मालिक बना। इससे ग्रामीण समाज में शक्ति-संतुलन बदला और शोषण की सदियों पुरानी व्यवस्था टूटी।चौधरी साहब की विशेषता यह थी कि वे किसी भी राजनीतिक या वैचारिक दबाव में नहीं झुके। चाहे समाजवादी खेमा हो या विदेशी मॉडल अपनाने का आग्रह-उन्होंने हमेशा भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप नीतियों की वकालत की। पाठकों को बताता चलूं कि किसानों को प्रशासनिक स्तर पर ताकत देने के लिए उन्होंने लेखपाल पद का सृजन किया। इससे किसान को पहली बार सरकारी तंत्र में सीधी पहुंच मिली और भूमि अभिलेख, अधिकार और न्याय की प्रक्रिया सरल हुई।इस प्रकार चौधरी चरण सिंह केवल नेता नहीं थे, बल्कि किसानों के आत्मसम्मान, स्वामित्व और स्वावलंबन के प्रतीक थे। सच तो यह है कि किसानों के लिए चौधरी चरण सिंह ने बहुत कुछ किया, और चूंकि वे स्वयं एक किसान परिवार से थे, उनकी नीतियाँ भी ज़मीनी थीं। उनका यह मानना था कि औद्योगिक विकास से पहले हमारे देश की कृषि सशक्त होनी चाहिए। कृषि सशक्त होगी तो हमारे देश की अर्थव्यवस्था सशक्त होगी और हमारे देश की अर्थव्यवस्था सशक्त होगी तो हम सभी सशक्त होंगे। उनकी नीतियाँ आज भी यह संदेश देती हैं कि भारत की प्रगति का रास्ता खेत और किसान से होकर ही गुजरता है। बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि 1965 में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय ‘जवान, जय किसान’ का एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायक नारा दिया था। कहना ग़लत नहीं होगा कि देश की सीमाओं की रक्षा करने वाला जवान और देश का पेट भरने वाला किसान-दोनों ही राष्ट्र की असली ताकत हैं। जवान देश को सुरक्षा देता है, तो किसान अन्न देता है; दोनों के बिना देश सुरक्षित और समृद्ध नहीं हो सकता। लाल बहादुर शास्त्री जी की भांति ही चौधरी चरण सिंह जी का यह मानना था कि किसान ही देश की असली ताकत हैं। दूसरे शब्दों में कहना ग़लत नहीं होगा कि उन्होंने अपने विचारों और नीतियों में किसानों के हितों को सर्वोपरि रखा। उनका मानना था कि भारत की अर्थव्यवस्था की असली नींव किसान हैं। जब तक किसान खुशहाल नहीं होगा, तब तक देश का विकास अधूरा रहेगा। उन्होंने कहा कि भारत जैसे कृषि-प्रधान देश में खेती को नजरअंदाज कर उद्योगों पर अत्यधिक जोर देना गलत है। कृषि मजबूत होगी तभी उद्योग भी टिक पाएंगे।वे स्पष्ट रूप से कहते थे कि किसान सबसे ज्यादा मेहनत करता है, लेकिन उसे अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता। बिचौलियों और गलत नीतियों से किसान का शोषण होता है। वे भूमि सुधारों के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि जो किसान जमीन जोतता है, वही उसका असली मालिक होना चाहिए।उन्होंने चेतावनी दी थी कि गांवों और किसानों की उपेक्षा सामाजिक असंतोष और आर्थिक असंतुलन को जन्म देगी।उनका विचार था कि किसान को कर्ज, बीज, सिंचाई और बाजार की सही सुविधाएं मिलें, ताकि वह आत्मनिर्भर बन सके और सम्मानजनक जीवन जी सके।संक्षेप में कहें तो चौधरी चरण सिंह किसानों को केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माता मानते थे और चाहते थे कि नीति-निर्धारण के केंद्र में किसान हो। ये चौधरी चरण सिंह थे जिन्होंने हमारे देश में भूमि सुधार और छोटे किसानों के हित में कई फैसले लिए। उल्लेखनीय है कि उन्होंने विकेंद्रीकरण, ज़मीनी स्तर पर शासन और स्थानीय आर्थिक स्वायत्तता को बढ़ावा दिया । उन्होंने ऋण राहत विधेयक, 1939 का प्रारूप तैयार किया, जिससे किसानों को साहूकारों से मुक्ति मिली तथा जोत सीमा आरोपण अधिनियम, 1960 में भूमि की अधिकतम सीमा को कम करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इतना ही नहीं, उन्होंने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की वकालत की, भूमिहीनों को लाभ पहुँचाने के लिये चकबंदी अधिनियम (1953) तथा उत्तरप्रदेश जमींदारी और भूमि सुधार अधिनियम (1952) पेश किये तथा कृषि-बाज़ार बुनियादी ढाँचे का निर्माण करते हुए कृषि उपज (ग्रेडिंग और मार्केटिंग) अधिनियम (1938) का प्रस्ताव रखा।ग्रामीण विकास विभाग को मंत्रालय का दर्जा दिया तथा नाबार्ड की स्थापना में भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई । दूसरे शब्दों में कहें तो वर्तमान की पहलें जैसे-किसानों की आय दोगुनी करना, एमएसएमई प्रोत्साहन, पंचायती राज और नैतिक प्रशासन उनके दूरदर्शी विचारों से प्रेरित हैं। बहरहाल, किसान सिर्फ अन्नदाता ही नहीं है, बल्कि वे पर्यावरण और पारिस्थितिकी के रक्षक भी हैं और हमारे देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ भी किसान ही हैं।सरल शब्दों में कहें तो खेती भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का मूल है। हाल फिलहाल, यदि हम यहां पर किसान दिवस के उद्देश्यों की बात करें तो इस दिवस का मुख्य उद्देश्य हमारे देश के किसानों के विभिन्न अधिकारों, उनकी विभिन्न समस्याओं और उनके योगदान को राष्ट्रीय विमर्श में लाना, भारतीय कृषि को अधिक लाभकारी, सम्मानजनक और टिकाऊ पेशा बनाना,नई पीढ़ी को खेती या कृषि कार्यों से जोड़ना तथा नीतियों में किसान-केंद्रित सोच को मजबूत करना है। पाठकों को बताता चलूं कि साल 2024 में थीम ‘एक समृद्ध राष्ट्र के लिए अन्नदाताओं को सशक्त बनाना’ रखी गई थी, जिसका उद्देश्य किसानों को संसाधन, अवसर और सतत कृषि के लिए समर्थन देने पर केंद्रित था। वास्तव में,किसान का सम्मान ही देश का सम्मान है। यदि हमारे देश के खेत सुरक्षित होंगे, तभी हमारे देश का भविष्य भी सुरक्षित होगा,यही किसान दिवस का असली संदेश है। बहरहाल, आज भी भारत में किसानों के सम्मुख अनेक प्रकार की समस्याएं हैं। दरअसल,भारत में किसानों की प्रमुख समस्याएँ आर्थिक असुरक्षा, प्राकृतिक जोखिम(जैसा कि भारतीय कृषि मानसून का जुआ कहलाती है) और नीतिगत चुनौतियों से जुड़ी हुई हैं। बढ़ती उत्पादन लागत के बावजूद फसलों के उचित दाम नहीं मिल पाते, जिससे किसानों की आय अस्थिर रहती है। कर्ज़ का बोझ भी एक बड़ी समस्या है, क्योंकि फसल खराब होने या बाजार में कीमत गिरने पर किसान ऋण चुकाने में असमर्थ हो जाते हैं। कृषि आज भी काफी हद तक मानसून पर निर्भर है, जैसा कि ऊपर इस आलेख में चर्चा कर चुका हूं, और जलवायु परिवर्तन के कारण सूखा, बाढ़ व ओलावृष्टि जैसी आपदाएँ खेती को लगातार नुकसान पहुँचा रही हैं। सिंचाई सुविधाओं की कमी, छोटे और बँटे हुए खेत, बिचौलियों का दबदबा, भंडारण व प्रसंस्करण की अपर्याप्त व्यवस्था तथा फसल बीमा और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में खामियाँ किसानों की समस्याओं को और गहरा करती हैं। इन सबके परिणामस्वरूप किसानों में असुरक्षा, तनाव और खेती से मोहभंग बढ़ रहा है, जो देश की कृषि व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है। पाठकों को बताता चलूं कि भारत में अधिकांश किसान सीमांत और छोटे किसान हैं, जिनकी जोत 2 हेक्टेयर से भी कम है। हालांकि, आज सरकार किसानों के लिए कई स्तरों पर काम कर रही है। किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत सालाना 6,000 रुपये सीधे उनके खाते में दिए जा रहे हैं, वहीं किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से कम ब्याज पर कृषि ऋण भी किसानों को उपलब्ध कराया जा रहा है। फसलों को प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू है, जिससे नुकसान की भरपाई हो सके। खेती की लागत कम करने के लिए उर्वरकों पर सब्सिडी, मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड के जरिए मिट्टी की जांच, और आधुनिक कृषि तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन, सिंचाई परियोजनाओं, भंडारण व कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाओं के विस्तार पर भी ध्यान दे रही है, ताकि किसानों को बेहतर बाजार और सही दाम मिल सके। इसके अलावा किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के माध्यम से किसानों को संगठित कर उनकी सौदेबाजी की ताकत बढ़ाई जा रही है। कुल मिलाकर सरकार का फोकस किसानों की आय, सुरक्षा, तकनीक और बाजार तक पहुंच को मजबूत करने पर है। निस्संदेह आज सरकार द्वारा किसानों के लिए अनेक योजनाएँ और सुविधाएँ चलाई जा रही हैं, फिर भी ज़मीनी स्तर पर किसानों की समस्याएँ पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई हैं। इसका कारण यह है कि कृषि केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि मौसम, बाज़ार, संसाधनों और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से गहराई से जुड़ा हुआ क्षेत्र है। अंत में यही कहूंगा कि किसान ही हमारे देश और अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ हैं, क्योंकि खाद्य सुरक्षा, रोज़गार और औद्योगिक विकास प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर ही निर्भर हैं। इसलिए किसानों को केवल सहायता का पात्र नहीं, बल्कि विकास का साझेदार मानना आवश्यक है। किसानों को प्रगतिशील, आत्मनिर्भर और खुशहाल बनाने के लिए आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक खेती, उचित मूल्य, सशक्त भंडारण-विपणन व्यवस्था और समय पर ऋण जैसी व्यवस्थाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा। हमें यह याद रखना चाहिए कि आर्थिक रूप से मजबूत किसान ही सशक्त राष्ट्र की नींव रख सकता है। किसानों की समस्याओं का समाधान किसी एक उपाय से नहीं, बल्कि नीति, तकनीक, बाज़ार और सामाजिक स्तर पर समन्वित व दीर्घकालिक रणनीतियों से संभव है। इसमें लागत के अनुरूप एमएसपी का प्रभावी क्रियान्वयन, फसल विविधीकरण, बेहतर सिंचाई व जल प्रबंधन, कृषि तकनीक व प्रशिक्षण का विस्तार, बाज़ार तक सीधी पहुँच, भंडारण-प्रसंस्करण सुविधाएँ, सरल व भरोसेमंद फसल बीमा तथा सस्ती ऋण व्यवस्था शामिल हैं। साथ ही, ग्रामीण बुनियादी ढाँचा, शिक्षा-स्वास्थ्य और सामाजिक-मानसिक समर्थन भी किसानों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इन सभी उपायों के समन्वित क्रियान्वयन से ही किसानों का भविष्य सुरक्षित और उज्ज्वल बनाया जा सकता है।





