सावित्रीबाई फुले: शिक्षा, समानता और सामाजिक क्रांति की अग्रदूत

Savitribai Phule: Pioneer of education, equality and social revolution

सुनील कुमार महला

सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षिका, 19 वीं सदी की प्रमुख समाज सुधारक और कवयित्री थीं। कहना ग़लत नहीं होगा कि उन्होंने महिला शिक्षा और सशक्तीकरण की दिशा में तथा जाति एवं लिंग आधारित भेदभाव को समाप्त करने में पथप्रदर्शक का कार्य किया और वे अपने आप में नारी सशक्तीकरण की एक मिसाल मानी जाती हैं। उनका जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के नायगांव (जिला सतारा) में हुआ था। पाठकों को बताता चलूं कि उनकी माताजी का नाम श्रीमती लक्ष्मीबाई तथा पिता का नाम श्री खन्दोजी नेवसे पाटिल था तथा उनका विवाह 1841 में महान समाज सुधारक महात्मा ज्योतिराव फुले(ज्योतिबा फुले) से हुआ था और उन्होंने उनके साथ मिलकर स्त्री शिक्षा और सामाजिक समानता की नींव रखी। यहां पाठकों को यह भी बताता चलूं कि ज्योतिबा फुले थॉमस पाइन की पुस्तक ‘द राइट्स ऑफ मैन’ से प्रभावित थे और उनका यह मानना ​​था कि सामाजिक बुराइयों का मुकाबला करने का एकमात्र तरीका महिलाओं व निम्न वर्ग के लोगों को शिक्षा प्रदान करना था। वर्ष 1840 में जब बाल विवाह एक सामान्य बात थी, उस समय मात्र 10 साल की उम्र में ही सावित्रीबाई फुले का विवाह ज्योतिराव फुले, जिन्हें ज्योतिबा फुले के नाम से भी जाना जाता है, से कर दिया गया था, जो कि स्वयं उस समय मात्र 13 वर्ष के थे। बाद के समय में इस विवाहित जोड़े ने बाल विवाह(कम उम्र में विवाह) का विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह की भी वकालत की।पाठकों को बताता चलूं कि महात्मा ज्योतिराव को महिलाओं और पिछड़े वर्गों को शिक्षित करने के उनके प्रयासों और कार्यों के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। विकीपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार ‘ज्योतिराव, जो बाद में ज्योतिबा के नाम से भी जाने गए सावित्रीबाई फुले के संरक्षक, गुरु और समर्थक थे। यहां पाठकों को यह भी बताता चलूं कि 11 मई, 1888 को महाराष्ट्र के सामाजिक कार्यकर्त्ता विट्ठलराव कृष्णजी वांडेकर द्वारा उन्हें(ज्योतिबा फुले को) ‘महात्मा’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था। यहां उल्लेखनीय है कि वर्ष 1852 तक फुले ने तीन स्कूलों की स्थापना की थी, लेकिन 1857 के विद्रोह के बाद धन की कमी के कारण वर्ष 1858 तक ये स्कूल बंद हो गए थे।ज्योतिराव ने ब्राह्मणों और अन्य उच्च जातियों की रुढ़िवादी मान्यताओं का घोर विरोध किया और उन्हें ‘पाखंडी’ करार दिया।कई लोगों का यह भी मानना है कि यह ज्योतिबा फुले ही थे, जिन्होंने सबसे पहले ‘दलित’ शब्द का इस्तेमाल उन उत्पीड़ित जनता के चित्रण के लिये किया था, जिन्हें अक्सर ‘वर्ण व्यवस्था’ से बाहर रखा जाता था। बहरहाल, ऊपर इस आलेख में चर्चा कर चुका हूं कि सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षिका और महान समाज सुधारक थीं, जिन्होंने उस समय शिक्षा का अलख जगाया जब लड़कियों को पढ़ाना पाप माना जाता था। उन्होंने अपने जीवन में अपमान, विरोध और कठिनाइयों का सामना करते हुए भी महिला शिक्षा और दलित-वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष किया। ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर उन्होंने बालिकाओं और शोषित वर्गों के लिए विद्यालय स्थापित किए और समाज में समानता की भावना को मजबूत किया। वे केवल शिक्षिका ही नहीं, बल्कि कवयित्री और प्रखर विचारक भी थीं, जिनकी रचनाएँ सामाजिक चेतना को जाग्रत करती हैं। सावित्रीबाई फुले का संपूर्ण जीवन साहस, करुणा और सामाजिक परिवर्तन की अमर प्रेरणा है। वास्तव में उन्होंने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से जीया, जिसका उद्देश्य था विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और महिलाओ को शिक्षित बनाना।’ उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता था। दूसरे शब्दों में कहें तो सावित्रीबाई एक सशक्त कवयित्री भी थीं। उनकी प्रमुख कृतियाँ ‘काव्यफुले’ और ‘बावन काशी सुबोध रत्नाकर’ हैं, जिनमें सामाजिक चेतना, शिक्षा और समानता का संदेश मिलता है। यहां यह भी गौरतलब है कि 5 सितंबर 1848 में पुणे में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं के साथ उन्होंने महिलाओं के लिए उस समय एक विद्यालय की स्थापना की, जिस समय लड़कियों की शिक्षा पर पाबंदी थी। उस समय एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्मा फुले पाँच नये विद्यालय खोलने में सफल हुए।श्रीमती फुले पहले किसान स्कूल की संस्थापक थीं तथा यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है कि उन्होंने बहुत पहले 1848 में पुणे में देश का पहला बालिका विद्यालय शुरू करके लड़कियों के लिए एक प्रकार से शिक्षा की नींव रखी। वास्तव में यह वह समय था जब लड़कियों और दलितों की शिक्षा का समाज में कड़ा विरोध होता था। कहते हैं कि जब वे पढ़ाने जाती थीं तो लोगों द्वारा उनका अपमान किया जाता था, गालियाँ और उन पर पत्थर तक फेंके जाते थे, फिर भी उन्होंने शिक्षा का मार्ग नहीं छोड़ा। यह भी जानकारी मिलती है कि वे रास्ते में एक अतिरिक्त साड़ी लेकर चलती थीं, ताकि उन पर गंदगी फेंके जाने पर वे उसे बदल सकें और स्कूल जा सकें। वास्तव में यह उनके अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प का प्रतीक कहा जा सकता है। जैसा कि इस आलेख में ऊपर भी चर्चा कर चुका हूं कि अपने समय में उन्होंने छुआछूत, जाति-भेद, बाल विवाह और सती प्रथा के खिलाफ आवाज़ उठाई। विधवाओं के पुनर्विवाह और गर्भवती विधवाओं के संरक्षण के लिए उन्होंने आश्रय गृह (बालहत्या प्रतिबंधक गृह) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे शोषितों, महिलाओं और दलितों के अधिकारों की सशक्त पक्षधर थीं।वर्ष 1852 में सावित्रीबाई ने महिलाओं के अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिये ‘महिला सेवा मंडल’ की शुरुआत की।सावित्रीबाई ने एक महिला सभा का आह्वान किया, जहाँ सभी जातियों के सदस्यों का स्वागत किया गया और सभी से एक साथ मंच पर बैठने की अपेक्षा की गई।उन्होंने वर्ष 1854 में ‘काव्या फुले’ और वर्ष 1892 में ‘बावन काशी सुबोध रत्नाकर’ का प्रकाशन किया। उनका काव्य-संग्रह ‘काव्या फुले’ सामाजिक चेतना से ओत-प्रोत रचनाओं का महत्वपूर्ण संकलन है। इस कृति में उन्होंने स्त्रियों की दुर्दशा, शिक्षा के महत्व, जातिगत भेदभाव, अंधविश्वास और सामाजिक अन्याय जैसे विषयों को सरल किंतु प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत किया है। ‘काव्या फुले’ की कविताएँ लोगों को सोचने, प्रश्न करने और समानता की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। इनमें करुणा, विद्रोह और सुधार की स्पष्ट भावना दिखाई देती है, जिससे यह कृति उस समय के शोषित-वंचित समाज की सशक्त आवाज़ बन गई। इसके अलावा वर्ष 1892 में प्रकाशित ‘बावन काशी सुबोध रत्नाकर’ सावित्रीबाई फुले की एक और महत्वपूर्ण साहित्यिक रचना मानी जाती है। इस कृति में बावन सुभाषितों या शिक्षाप्रद पद्यों के माध्यम से उन्होंने नैतिकता, सदाचार, शिक्षा, मानवीय मूल्यों और सामाजिक सुधार के विचारों को प्रस्तुत किया। यह ग्रंथ सरल और सुबोध भाषा में लिखा गया है ताकि सामान्य जन, विशेषकर महिलाएँ और वंचित वर्ग, इसे आसानी से समझ सकें। ‘बावन काशी सुबोध रत्नाकर’ का उद्देश्य लोगों को आत्मचिंतन, विवेक और सही आचरण की ओर प्रेरित करना था। इस रचना के माध्यम से सावित्रीबाई फुले ने यह स्पष्ट किया कि शिक्षा केवल अक्षर-ज्ञान नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और मानवीय गरिमा की स्थापना का माध्यम है। अपनी कविता ‘गो, गेट एजुकेशन’ में वह उत्पीड़ित समुदायों से शिक्षा प्राप्त करने और उत्पीड़न की जंजीरों से मुक्त होने का आग्रह करती हैं। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन करते हुए बाल विवाह के खिलाफ एक साथ अभियान चलाया।

वर्ष 1873 में महात्मा ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले ने समाज में व्याप्त ब्राह्मणवादी वर्चस्व, जातिगत भेदभाव और दहेज प्रथा के विरुद्ध एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए पहला ‘सत्यशोधक विवाह’ प्रारंभ कराया। दूसरे शब्दों में कहें तो सत्यशोधक समाज (द ट्रुथ-सीकर्स सोसाइटी) की स्थापना 24 सितंबर, 1873 को ज्योतिराव-सावित्रीबाई और अन्य समान विचारधारा वाले लोगों द्वारा की गई थी।इस विवाह की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें न तो दहेज लिया जाता था, और न ही किसी ब्राह्मण पुजारी की आवश्यकता पड़ती थी और न ही वेद–मंत्रों अथवा जटिल कर्मकांडों का पालन किया जाता था। सच तो यह है कि विवाह को एक सामाजिक समझौते के रूप में देखा गया, न कि धार्मिक कर्मकांड के रूप में।इस सत्यशोधक विवाह का उद्देश्य था-स्त्री–पुरुष समानता, सरलता और सामाजिक न्याय। इसमें दोनों पक्षों द्वारा समान शपथ ली जाती थी कि वे एक-दूसरे का सम्मान करेंगे, स्त्री को दासी नहीं बल्कि समान अधिकारों वाली साथी मानेंगे और जाति-आधारित भेदभाव का पालन नहीं करेंगे। यह विवाह व्यवस्था उस समय के समाज के लिए क्रांतिकारी विचार थी, क्योंकि इससे न केवल दहेज जैसी कुप्रथाओं पर चोट हुई, बल्कि ब्राह्मणवादी धार्मिक एकाधिकार को भी खुली चुनौती मिली।इस पहल ने विवाह संस्था को मानवीय, नैतिक और समानतावादी मूल्यों से जोड़ने का कार्य किया और आगे चलकर समाज सुधार आंदोलनों के लिए एक मजबूत वैचारिक आधार बना। सत्यशोधक विवाह आज भी सामाजिक सुधार और समानता की दिशा में फुले दंपति की दूरदर्शिता का सशक्त उदाहरण माना जाता है। इतना ही नहीं,वर्ष 1848 में फुले ने पूना में लड़कियों, शूद्रों एवं अति-शूद्रों के लिये एक स्कूल शुरू किया तथा 1850 के दशक में फुले दंपत्ति ने दो शैक्षिक ट्रस्टों की शुरुआत की- नेटिव फीमेल स्कूल (पुणे) और ‘द सोसाइटी फॉर प्रोमोटिंग द एजुकेशन ऑफ महार’- जिसके तहत कई स्कूल शामिल थे।

वर्ष 1853 में उन्होंने गर्भवती विधवाओं के लिये सुरक्षित प्रसव हेतु और सामाजिक मानदंडों के कारण शिशुहत्या की प्रथा को समाप्त करने के लिये एक देखभाल केंद्र खोला। दूसरे शब्दों में कहें तो विधवाओं और बलात्कार पीड़ित महिलाओं के लिए उन्होंने पहला बालहत्या-निरोधक गृह खोला।गौरतलब है कि बालहत्या प्रतिबंधक गृह (शिशु हत्या निवारण गृह) उनके ही घर में शुरू हुआ। यह एक कटु सत्य है कि फुले ने समाज में सामाजिक परिवर्तनों की वकालत की तथा प्रचलित परंपराओं के खिलाफ कदम उठाया, जिनमें आर्थिक विवाह, अंतर-जातीय विवाह, बाल विवाह का उन्मूलन और विधवा पुनर्विवाह शामिल हैं। साथ ही सत्य शोधक समाज की स्थापना निम्न जाति, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति को शिक्षा देने तथा समाज की शोषक परंपरा से अवगत कराने के उद्देश्य से की गई थी।

पाठकों को बताता चलूं कि सावित्रीबाई फुले केवल भारत की पहली महिला शिक्षिका ही नहीं थीं, बल्कि वे प्रशिक्षित अध्यापिका भी थीं। उन्होंने पुणे और अहमदनगर में शिक्षक प्रशिक्षण लिया था, जो उस दौर में महिलाओं के लिए लगभग असंभव माना जाता था।वे पाठ्य-पुस्तकों की लेखिका भी थीं तथा उन्होंने बच्चों के लिए स्वयं पाठ्य सामग्री और कविताएँ लिखीं, ताकि शिक्षा सरल और व्यवहारिक बन सके। उनकी काव्य-कृतियाँ शिक्षा को सामाजिक बदलाव से जोड़ती थीं। इतना ही नहीं, फुले दंपत्ति ने अपने घर में दलित और वंचित वर्ग के बच्चों को आश्रय और शिक्षा दी, जिससे समाज में समानता का संदेश गया। जब दलितों को सार्वजनिक कुओं से पानी लेने नहीं दिया जाता था, तब सावित्रीबाई ने अपने घर का कुआँ सभी के लिए खोल दिया।वे सत्यशोधक समाज की अग्रणी नेता थीं। वे केवल सदस्य मात्र नहीं थीं, बल्कि सत्यशोधक समाज की सक्रिय वैचारिक मार्गदर्शक थीं और महिलाओं को संगठन से जोड़ने में उनकी अहम भूमिका थी। जानकारी मिलती है कि प्लेग पीड़ितों की सेवा करते हुए उनका निधन हो गया था। 1897 में पुणे में प्लेग फैला, तब सावित्रीबाई स्वयं रोगियों को कंधे पर उठाकर अस्पताल ले जाती थीं। इसी सेवा के दौरान वे संक्रमित हुईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हुआ,वे सचमुच सेवा में शहीद हुईं। कहना ग़लत नहीं होगा कि उन्होंने आधुनिक नारीवाद की आधारशिला रखी। वास्तव में, सावित्रीबाई फुले का नारीवाद केवल अधिकारों की बात नहीं करता था, बल्कि शिक्षा, आत्मसम्मान और सामाजिक बराबरी को केंद्र में रखता था, जो आज भी प्रासंगिक है। आज सावित्रीबाई फुले को भारतीय शिक्षा और महिला सशक्तिकरण की अग्रदूत के रूप में श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। अंत में निष्कर्ष के तौर पर यह बात कही जा सकती है कि सावित्रीबाई फुले का जीवन भारतीय समाज में समानता, शिक्षा और मानवता की स्थापना का प्रेरक उदाहरण है। उन्होंने उस दौर में महिला शिक्षा की मशाल जलाई, जब पढ़ना-लिखना महिलाओं के लिए पाप माना जाता था। सामाजिक बहिष्कार, अपमान और हिंसा सहते हुए भी उन्होंने लड़कियों, दलितों और वंचित वर्गों के लिए शिक्षा के द्वार खोले। विधवा पुनर्विवाह, बाल-विवाह विरोध, जातिगत भेदभाव के उन्मूलन और नारी सम्मान के लिए उनका संघर्ष समाज को नई चेतना देता है।

सावित्रीबाई फुले केवल पहली महिला शिक्षिका ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, साहस और करुणा की अमर प्रतीक हैं, जिनका योगदान आज भी एक समतामूलक और शिक्षित समाज के निर्माण की दिशा दिखाता है।