2026 की दहलीज पर: भारत की आर्थिक कहानी और वैश्विक भविष्य की तस्वीर

On the threshold of 2026: India's economic story and its global future

सुनील कुमार महला

साल 2025 से 2026 में कदम रखना केवल कैलेंडर का पन्ना पलटना भर नहीं है, बल्कि यह आत्ममूल्यांकन और नव-आरंभ का अवसर है। वास्तव में सच तो यह है कि यह समय उन सपनों और लक्ष्यों को फिर से साधने का है, जो बीते वर्ष परिस्थितियों, सीमाओं या संकोच के कारण अधूरे रह गए। साथ ही, यह आने वाली चुनौतियों को पहचानकर उनके लिए स्वयं को मानसिक, बौद्धिक और व्यवहारिक रूप से तैयार करने की प्रेरणा देता है। नया वर्ष हमें अतीत से सीख लेकर भविष्य की ओर आशा, संकल्प और सकारात्मक दृष्टि के साथ आगे बढ़ने का संदेश देता है। कोई भी साल पूरी तरह आदर्श नहीं होता, और 2025 भी इसका अपवाद नहीं रहा। हालांकि, उससे मिली सीख नए वर्ष में दिशा दिखा सकती है। बीता साल आर्थिक लिहाज़ से भारी उतार-चढ़ाव से भरा रहा।लंबी तेजी के बाद शेयर बाजार में सुस्ती आई, वहीं अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के दोबारा सत्ता में आने के साथ टैरिफ को लेकर सख्त रुख अपनाया गया। इन चुनौतियों के बीच भारत ने संतुलन और दृढ़ता का परिचय दिया। ट्रंप के दबाव के बावजूद रूस के साथ संबंधों को प्राथमिकता देकर भारत ने स्पष्ट किया कि उसकी विदेश नीति स्वतंत्र है। इसी अवधि में रूस, न्यूज़ीलैंड और ओमान के साथ महत्वपूर्ण समझौते भी हुए, जो भारत की कूटनीतिक सक्रियता और आत्मनिर्भर सोच को दर्शाते हैं।

जीएसटी सुधार और भारतीय अर्थव्यवस्था:-

जैसा कि पाठक जानते होंगे कि पिछले साल देश के भीतर जीएसटी 2.0 जैसे बड़े सुधार लागू किए गए, जिससे हमारे देश की अर्थव्यवस्था को अच्छी खासी मजबूती मिली। इसका असर यह रहा कि दूसरी तिमाही में भारत की आर्थिक वृद्धि 8.2% रही।साल के अंत तक भारत के जापान को पीछे छोड़कर लगभग 4.18 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का अनुमान उसकी तेज़ और निरंतर आर्थिक वृद्धि पर आधारित है। कहना ग़लत नहीं होगा कि मजबूत घरेलू मांग, बढ़ता मध्यम वर्ग, सरकारी पूंजीगत खर्च, बुनियादी ढांचे में निवेश और जीएसटी जैसे संरचनात्मक सुधारों ने आर्थिक गतिविधियों को गति दी है। साथ ही, वैश्विक सप्लाई चेन में बदलाव और भारत को वैकल्पिक उत्पादन केंद्र के रूप में मिल रहा भरोसा निवेश और निर्यात को बढ़ावा दे रहा है। इसके विपरीत, जापान की अर्थव्यवस्था धीमी वृद्धि, घटती आबादी और सीमित घरेलू मांग से जूझ रही है। इन सभी कारणों के चलते भारत की जीडीपी तेजी से बढ़ रही है और मौजूदा अनुमानों के अनुसार वह वर्ष के अंत तक जापान को पीछे छोड़कर वैश्विक आर्थिक रैंकिंग में चौथे स्थान पर पहुंच सकता है।इसके अलावा, अन्य देशों के साथ हुई व्यापार संधियाँ और अमेरिका के साथ होने वाला समझौता पूरा होने से आगे चलकर अर्थव्यवस्था की रफ्तार और तेज होने की उम्मीद है। दूसरे शब्दों में कहें तो वैश्विक स्तर पर आर्थिक चुनौतियों और अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था के मजबूत बने रहने की संभावना है। इसका मुख्य कारण देश के भीतर मजबूत मांग, महंगाई का नियंत्रण में रहना और सरकार तथा भारतीय रिज़र्व बैंक की संतुलित आर्थिक नीतियां हैं।

अर्थव्यवस्था के मामले में 2030 तक जर्मनी को पछाड़ देगा भारत:-

अनुमान है कि भारत 2030 तक जर्मनी को भी पछाड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन जाएगा। सरकार ने भरोसा जताया है कि मजबूत आर्थिक नींव के साथ, भारत की जीडीपी 2030 तक 7.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगी।आरबीआई की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के अनुसार, देश के अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक अच्छी स्थिति में हैं, उनके पास पर्याप्त पूंजी और नकदी भंडार है, खराब कर्ज में कमी आई है और उनका मुनाफा भी मजबूत बना हुआ है। यहां पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि केंद्रीय बैंक के दबाव परीक्षण से यह भी स्पष्ट हुआ है कि प्रतिकूल हालात में भी बैंक संभावित नुकसान सहन कर सकते हैं और उनकी पूंजी नियामकीय न्यूनतम स्तर से काफी ऊपर रहेगी। इसके अलावा म्यूचुअल फंड, समाशोधन निगम, गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां और बीमा क्षेत्र भी मजबूत स्थिति में हैं, जिनकी पूंजी पर्याप्त है और बहीखाते संतुलित हैं। हालांकि, निकट भविष्य में भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता से कुछ जोखिम बने हुए हैं, फिर भी कुल मिलाकर भारत की वित्तीय प्रणाली स्थिर और सुरक्षित बनी हुई है। हाल फिलहाल कहना चाहूंगा कि देश की अर्थव्यवस्था की तरह ही हमारे देश ने पिछले साल यानी कि वर्ष 2025 में सीमा से जुड़ी चुनौतियों का भी मजबूती से सामना किया। पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों के खिलाफ किया गया ‘ऑपरेशन सिंदूर’ इस बात का उदाहरण था कि भारत जरूरत पड़ने पर कड़ा कदम भी उठा सकता है और साथ ही संयम भी बरतता है। इससे भारत की सैन्य क्षमता और जिम्मेदार रवैये दोनों का संदेश गया। पड़ोसी देशों से रिश्तों की बात करें तो चीन के साथ लंबे समय से चला आ रहा तनाव कुछ हद तक कम हुआ। करीब पाँच साल बाद दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें शुरू हुईं और प्रधानमंत्री मोदी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में शामिल होने चीन गए। वहीं बांग्लादेश के हालात चिंता का कारण बने रहे। उम्मीद है कि फरवरी में होने वाले चुनावों के बाद वहां बनने वाली नई सरकार भारत के साथ अच्छे और स्थिर रिश्तों की अहमियत को समझेगी। साल भर देश में असहिष्णुता और धर्म-जाति के आधार पर भेदभाव से जुड़ी कई घटनाएँ सामने आईं। साल के अंत में क्रिसमस के दौरान कुछ जगहों पर हुई तोड़फोड़ की तस्वीरों ने देश की छवि को नुकसान पहुँचाया। इसके साथ ही भारी बारिश, भूस्खलन, वायु प्रदूषण और अरावली से जुड़े मामलों के कारण पर्यावरण पूरे साल एक बड़ा मुद्दा बना रहा। एसआइआर को लेकर भी राजनीतिक विवाद देखने को मिला। राहत की बात यह रही कि इन सभी विषयों पर जनता पहले से ज्यादा जागरूक और सजग नजर आई।

इस साल भारत से बड़ी उम्मीदें जुड़ी हैं:-

अंत में यही कहूंगा कि नये साल में यानी कि वर्ष 2026 में भारत से कई बड़ी उम्मीदें जुड़ी हैं। सबसे बड़ी आशा यह है कि देश तेज़ और स्थिर आर्थिक वृद्धि के साथ दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति और मजबूत करेगा, जिससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और आम लोगों की आय में सुधार आएगा। बुनियादी ढांचे, मैन्युफैक्चरिंग, स्टार्टअप और डिजिटल अर्थव्यवस्था में निरंतर निवेश से विकास को गति मिलने की उम्मीद है। साथ ही, शिक्षा, कौशल विकास और तकनीक-विशेषकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस(एआइ)के क्षेत्र में भारत वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान और मजबूत कर सकता है। सामाजिक मोर्चे पर उम्मीद है कि समावेशी विकास, सामाजिक सौहार्द और सुशासन पर ध्यान बढ़ेगा, जबकि पर्यावरण संरक्षण और जलवायु संतुलन के प्रयास भी मजबूत होंगे। कुल मिलाकर, 2026 से अपेक्षा है कि भारत विकास और स्थिरता के बीच संतुलन बनाते हुए नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने की दिशा में ठोस कदम बढ़ाएगा।