योगी आदित्यनाथ: पीढ़ियों की भक्ति और राष्ट्रभक्ति का वह नेतृत्व, जो कह रहा है—अब नहीं सहेंगे गुलामी के निशान
रीना एन सिंह
भारत केवल भूमि का टुकड़ा नहीं बल्कि हजारों वर्षों की दैवीय चेतना, गौरव, सभ्यता और आस्था का विराट प्रतीक है, जहाँ हर कण में देवत्व की ऊर्जा धड़कती है, इतिहास इस बात की चर्चा नहीं करता की कौन सा राज्य या राजा सबसे धनवान था, बल्कि इतिहास उसे स्वर्ण अक्षरों मे अंकित करता है की किस राजा ने अपनी संस्कृति , देश और धर्म की रक्षा के लिए क्या क्या किया ? कितनी लड़ाइयां लड़ी और कितना बलिदान और त्याग दिया। जो मानव संस्कृति अपने इतिहास को संजो कर नहीं रखती वह समुदाय और संस्कृति भविष्य से मिट जाती है। हमारे देश की इसी पवित्र धरती पर विदेशी आक्रमणकारियों ने तलवार और अत्याचार के बल पर मंदिर नष्ट किए, संस्कृति को कुचलने की कोशिश की ताकि हमारा समूल नष्ट हो जाये और हमारी पराजय के ऊपर अपने अहंकार का झंडा गाड़ने के हमारे मुख्य धार्मिक स्थलों पर तथाकथित “मस्जिदें” खड़ी कीं, जो किसी उपासना के स्थल नहीं बल्कि खुल्लम-खुल्ला विजय-स्मारक थे। बाबरी, शाही ईदगाह और ज्ञानवापी जैसे स्थल इस बात के जीवंत साक्ष्य हैं कि कैसे आक्रमणकारी यह संदेश देना चाहते थे कि उन्होंने हिंदू आत्मा को झुका दिया है। 1528 में मीर बाकी द्वारा राम जन्मभूमि पर रामलला के मंदिर को ध्वस्त कर बनाई गई संरचना नमाज़ की जगह नहीं थी, बल्कि हिंदू समाज के खिलाफ सैनिक विजय की घोषणा थी। यह घाव पाँच सौ वर्षों तक हमारे हृदय में धधकता रहा, लेकिन सनातन समाज कभी थका नहीं, कभी टूटा नहीं, उसके संत, साधु, राजपूत, मराठा, नागा साधु हर युग में धर्म की रक्षा के लिए खड़े रहे और इसी सत्याग्रह का प्रथम निर्णायक पड़ाव तब आया जब राम मंदिर पुनः उसी स्थान पर भव्य रूप में स्थापित हुआ और यह संकेत मिला कि अब इतिहास करवट ले चुका है और गुलामी के स्मारक टिक नहीं पाएंगे।इसी क्रम में मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि पर बना शाही ईदगाह का घाव और भी गहरा है। जहाँ देवकी-वासुदेव ने जन्म दिया, जहाँ कंस का अत्याचार समाप्त हुआ, उसी पवित्र स्थान पर औरंगज़ेब ने मंदिर गिरवाकर मस्जिद बनवाई यह इबादत की जगह नहीं, हिंदुओं को मनोवैज्ञानिक रूप से तोड़ने की रणनीति थी, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियाँ अपने ही देवताओं के जन्मस्थल पर पराई सत्ता का निशान देखें। यही रणनीति काशी में भी अपनाई गई, जहाँ विश्वनाथ जो भारत की आत्मा का केंद्र है को नष्ट कर ज्ञानवापी मस्जिद की दीवारें खड़ी की गईं, ताकि औरंगज़ेब यह घोषणा कर सके कि “काशी भी मेरी तलवार की पहुँच में थी।” लेकिन सत्य कभी दबता नहीं, और आज वही सत्य सामने है ज्ञानवापी में शिवलिंग अवस्थित है; यह प्रमाण किसी तर्क या बहस से परे है कि वहाँ पहले क्या था।यह संघर्ष अकेले किसी न्यायालय या आंदोलन का संघर्ष नहीं था; यह 550 वर्षों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही धधकती आस्था का संघर्ष था, जिसे तीन पीढ़ियों की गोरखनाथ परंपरा ने भारत के चेतन मानस में जीवित रखा। महंत दिग्विजयनाथ ने ब्रिटिश शासन और मुस्लिम लीग दोनों के विरुद्ध हिंदू चेतना का ध्वज उठाया; वे गोरखनाथ पीठ से राष्ट्रवाद, हिंदू स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की आवाज को संगठित रूप से स्थापित करने वाले प्रथम महंत थे जिन्होंने हिंदू समाज को यह याद दिलाया कि बाबरी और अन्य अपहृत स्थलों का मुद्दा केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व का प्रश्न है। उनके बाद महंत अवेद्यनाथ ने इस संघर्ष को एक संगठित जनांदोलन में परिवर्तित किया; राम जन्मभूमि आंदोलन को उन्होंने निर्णायक वैचारिक आधार दिया और हिंदू समाज को यह बताया कि सत्य और प्राचीन धरोहरों की पुनर्स्थापना केवल अदालतों की लड़ाई नहीं बल्कि जन-जागरण की पुकार है। वे राम जन्मभूमि आंदोलन के आध्यात्मिक स्तंभ थे जिन्होंने एक पीढ़ी को गुलामी के प्रतीकों को पहचानने की दृष्टि दी,और आज इस परंपरा का तीसरा और सबसे प्रखर स्वर महंत योगी आदित्यनाथ के रूप में सामने है, जो तप, त्याग, अनुशासन और अदम्य राष्ट्रवादी साहस के आधुनिक प्रतीक बनकर खड़े हुए हैं। योगी वह नेतृत्व हैं जो हिंदुत्व को केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि प्रशासनिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और वैचारिक शक्ति में परिवर्तित करते हैं। वे आक्रमणकारियों के सत्य को छिपाते नहीं, तुष्टीकरण की राजनीति से समझौता नहीं करते, अपराधियों के सामने न झुकने वाले और सनातन की प्रतिष्ठा के लिए निडरता से खड़े होने वाले नेता हैं। जब भारत आज अपने इतिहास से जुड़े झूठे नैरेटिव को हटाने, गुलामी के निशानों को मिटाने और सांस्कृतिक पुनरुत्थान की ओर बढ़ रहा है, तब देश एक ऐसे नेतृत्व की तलाश में है जो बिना भय के सत्य को कह सके, जो इतिहास को विकृतियों से मुक्त कर सके, जो समाज में हिंदू आत्मविश्वास को पुनर्जीवित कर सके और इस युग में ऐसा चेहरा योगी आदित्यनाथ ही हैं, जिनमें तीन पीढ़ियों की तपस्वी परंपरा, राष्ट्रवादी चेतना और हिन्दू गौरव एक साथ साकार होता है। पूरे राष्ट्र का मानस आज समझ रहा है कि यदि राम मंदिर पुनरुत्थान का युग संभव हुआ, यदि कृष्ण जन्मभूमि और ज्ञानवापी जैसे सत्य आज पुनः प्रकट हो रहे हैं, तो यह इसलिए कि भारत की आत्मा फिर से जाग उठी है और इस पुनर्जागरण को एक स्थिर, सशक्त और तपस्वी नेतृत्व की आवश्यकता है।इसलिए आज भारत का भविष्य केवल आर्थिक विकास का मुद्दा नहीं बल्कि सांस्कृतिक पुनर्स्थापना का संकल्प बन चुका है, क्यूंकि आर्थिक रूप से संपन्न तो हम सदा थे परन्तु समय के साथ जैसे जैसे हमारी धार्मिक संस्कृति पर आघात हुआ सबसे पहले हम आर्थिक रूप से कमज़ोर हो गए क्यूंकि हमला हमारी जड़ों पर हुआ , हमारा धर्म हमारी संस्कृति ही हमारी नींव है | 21वीं सदी भारत की सनातनी पहचान की वापसी की सदी है और इस महान यात्रा का नेतृत्व उसी के हाथ मे होना चाहिए जो न डरता है, न झुकता है, न बिकता है जो राष्ट्र को केवल शासन नहीं, बल्कि दिशा देता है। महंत दिग्विजयनाथ की ज्वाला, महंत अवेद्यनाथ का संकल्प और योगी आदित्यनाथ की प्रखरता मिलकर आज पूरे भारत को पुकार रही है कि गुलामी के प्रतीक ढहेंगे, सत्य प्रकट होगा, मंदिर पुनर्स्थापित होंगे और भारत अदम्य हिंदुत्व के साथ खड़ा होगा और आर्थिक रूप से सशक्त होगा क्योंकि इस जागरण का सेनापति वही है जिसके नेतृत्व में राष्ट्र स्वयं को सुरक्षित, गौरवान्वित और पुनर्जीवित महसूस करता है, और वह नाम है: योगी आदित्यनाथ।





